Feb
01
2012
महाभारत का युद्ध क्यों हुआ? इस सवाल के जवाब में कई दृष्टिकोण होंगे और जिसके समर्थन में अपने-अपने पक्ष रखे जा सकते हैं। कौरवों का स्वार्थ तो दुर्योधन का घमंड, शकुनि मामा की कुटिलता या धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह आदि-आदि कारण गिनाये जा सकते हैं। तर्क-कुतर्क तो और भी हो सकते हैं लेकिन भीष्म पितामह की चुप्पी शायद प्रमुख कारण माना जाना चाहिए। वो ज्ञानी थे, शक्तिशाली थे, वीर थे, गुणी थे। निष्पक्ष होकर न्यायप्रियता के साथ-साथ वे सदा सच एवं धर्म का साथ देंगे, ऐसी उम्मीद ही नहीं, विश्वास भी किया जाता था। लेकिन हस्तिनापुर के राजसिंहासन के प्रति वचनबद्धता ने उन्हें कुछ न करने के लिए मजबूर किया। ऐसा कहा जाता है। मगर क्या यह उचित था? बिल्कुल नहीं। द्रौपदी चीरहरण के वक्त वो चुप रहे, क्या इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार किया जा सकता है? नहीं। अनैतिक और गलत के साथ खड़ा होना ही अपने आप में सबसे बड़ा अधर्म कहा जाता है लेकिन उन्होंने तो कौरवों के पक्ष से युद्ध में सक्रियता से हिस्सा भी लिया। ऐसे में क्या वो पाप के बराबर से भागीदार नहीं? बिल्कुल हैं। उलटा उन्हें तो प्रमुख दोषी के रूप में खड़ा किया जाना चाहिए। और उसका कारण है। अगर कोई अनजान या अक्षम ऐसा करे तो उसे संदेह का लाभ दिया जा सकता है। मगर भीष्म तो जीवन व समाज के समस्त मूल्य व तथ्य से भलीभांति परिचित थे। अगर वो सत्य व नीति के पक्ष में अड़ जाते तो महाभारत के युद्ध की संभावना लगभग नगण्य हो जाती। कहने को तो नियति को कौन रोक सकता है, कहकर छुटकारा पाया जा सकता है, लेकिन महाभारत का विनाशकारी युद्ध आगे की कई पीढ़ियों को सबक दे गया कि बड़े-बुजुर्गों की एक भूल कितनी भयावह हो सकती है। अकेले भीष्म पितामह ही क्यों, द्रोणाचार्य एवं विदुर जैसे ज्ञानी की निष्क्रियता को भी इसी क्रम में रखकर देखा जाना चाहिए। ध्यान से देखें तो कहीं-कहीं ये सभी राजसिंहासन नहीं शासक के पक्ष में खड़े नजर आते हैं। ये अपनी वफादारी सत्ता की जगह अवाम के साथ जोड़ते तो उन्हें सही निर्णय लेने में आसानी होती। सवाल उठता है कि क्या ये महापुरुष भी बड़े परिप्रेक्ष्य में रखकर देशहित के सही मायने नहीं समझ पाये? अगर नहीं तो फिर ऐसे में आम आदमी से क्या उम्मीद की जा सकती है? बहरहाल, इन बुद्धिजीवियों के गलत निर्णय का खमियाजा आमजन को भोगना पड़ा। जो जाने-अनजाने ही शक पैदा करता है कि कहीं ये महान हस्तियां हस्तिनापुर के हित से अधिक सत्ताधारी का हित साधने में तो नहीं लग गयी थीं? यह भी तो हो सकता है कि सत्ता-सुख के चक्कर में पड़कर विरोध न कर पायीं हों? सच तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी स्वार्थी व अत्याचारियों का साथ, सवाल के साथ-साथ आश्चर्य भी पैदा करता है!
आज की परिस्थितियां तो अधिक विकट हैं। भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे ज्ञानी और शूरवीर वरिष्ठजन तो हैं नहीं, ऊपर से दुर्योधन और शकुनि की संख्याएं तेजी से बढ़ रही हैं और साथ ही स्वार्थ अपने चरम पर है। अमूमन ऐसी स्थितियां निर्मित हो जाती हैं, जहां महाविनाश की संभावना बनी रहती है। ऐसे में चिंता स्वाभाविक है। मुश्किल इस बात कि है कि अब कृष्ण भी उपस्थित नहीं। जिनके दिशा-निर्देश में अर्जुन धर्म की जीत और फिर राम-राज्य की स्थापना करने में सफल हो पाये थे। ‘गीता’ की सरल मगर सच्ची बातों से युगों-युगों तक आमजन भी लाभान्वित होता रहा है। मगर अब इसकी अनदेखी शुरू हो चुकी है। इसके भावार्थ से अब हम कोसों दूर हैं। वर्तमान काल में सच्ची और कड़वी बात सुनाने वाला दिखाई नहीं पड़ता। उलटा आज के अधिकांश बुद्धिजीवियों में ज्ञान की जगह अहम् कूट-कूटकर भरा हुआ है। वो कहीं अधिक स्वकेंद्रित हो चुका है। कहीं-कहीं वो विचारधाराओं से जुड़ा प्रतीत जरूर होता है, लेकिन उसे फिर कुछ और दिखाई नहीं देता। वो खुले दिमाग से कुछ समझना ही नहीं चाहता। ऐसे में उसकी उपयोगिता तो समाप्त हो ही चुकी है, बल्कि उसका पक्षपातपूर्ण रवैया घातक होता जा रहा है। अब उसकी निष्पक्षता संदेहास्पद नहीं रही, वो खुलेआम देखी जा सकती है, जो सत्ता और धन के प्रति वफादारी निभाते हुए आसानी से प्रकट भी हो जाती है।
उदाहरण के रूप में टीवी पर विभिन्न मुद्दों पर आने वाली बहसों को देखें। बड़ी आसानी से कोई भी यह कह सकता है कि कौन-सा वक्ता किसके साथ जुड़ा या खड़ा हुआ है। कौन पक्ष में बोल रहा है कौन विपक्ष में? यूं तो कहने के लिए कोई भी बहस एकतरफा न हो जाये, इसीलिए सभी पक्षों से संबंधित वक्ताओं को बुलाया जाता है। मगर साथ ही कुछ विद्वान बुलाये जाते हैं। और उम्मीद की जाती है कि वे कम से कम निष्पक्ष होंगे और बहस को सार्थक बनाते हुए उचित निष्कर्ष की ओर ले जायेंगे। एक वाकया याद आता है। एक बहस के दौरान एक पक्ष के वक्ता ने यह कहकर माहौल में गर्माहट पैदा कर दी कि वार्ता में उपस्थित एक विद्वान आजकल तो किसी लाभ के पद पर विराजमान हैं। कहने का साफ मतलब था कि वे लाभान्वित किये गये हैं। इतना ही कहना था कि उसके बाद उपरोक्त विद्वान अचानक आक्रामक हो गये। मगर यह उनकी झेंप थी जो गुस्से में प्रकट होने लगी थी। वरना वे तब तक बड़ी सौम्यता से शांत-चित्त होकर अपने विचार प्रकट कर रहे थे। असल में उनकी चतुराई पकड़ी गयी थी और उनके पक्षपातपूर्ण विचार का कारण उजागर हो चुका था।
उपरोक्त उदाहरण स्वयं में एक नये किस्म की बहस को जन्म देता है। जो वाद-विवाद का कारण बन सकता है। प्रश्न उठता है कि क्या विद्वानों, संपादकों, चिंतकों का भी पक्ष होता है? नहीं, उन्हें तो निष्पक्ष होना चाहिए। मगर आजकल वे मुद्दों पर सही राय देने की जगह कई बार अपने शुभचिंतकों का हित देखते हैं। इससे बचने के लिए ही शायद शास्त्रों में कहा भी गया है कि आचार्यों, गुरुओं व दार्शनिकों को राजसत्ता व भौतिक सुख-सुविधाओं से दूर रहना चाहिए। मगर आज तो यह वर्ग इसमें डूब रहा है। वर्तमान काल में मीडिया का अहम रोल है। मगर यहां तो सामान्य एंकर भी अपने प्रश्न व पूछने की शैली से कई बार यह प्रदर्शित कर जाते हैं कि वो किसका पक्ष ले रहे हैं। यह परिस्थिति नये किस्म के भ्रम को जन्म देती है। सत्ता के लिए अंधी प्रतिस्पर्धा पैदा करती है। और दर्शकों को गुमराह करती है। होना तो यह चाहिए कि बहस में आने वाले लोग मुद्दे के हिसाब से अपना-अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करें। ऐसी परिस्थिति में नीति व अनीति के बीच पहचान आसान हो जाती है। लेकिन आज का बुद्धिमान अपने हित को ध्यान में रखकर बोलता है। वो भी पूरी दृढ़ता के साथ। फिर वो अपनी बातों को न्यायोचित भी ठहराता है। कई बार सिर्फ इसलिए विरोध करता है क्योंकि वो दूसरे पक्ष का मत है, फिर चाहे वो सही ही क्यों न हो। कभी-कभी वो हंसी का पात्र भी बन जाता है मगर फिर भी वह कुछ और सोचना और समझना ही नहीं चाहता। उसने अपने दरवाजे बंद कर रखे हैं। यही नहीं, वो अपने पक्ष के लिए तमाम तर्क-कुतर्क भी प्रस्तुत करता है। शब्दों के साथ खेलते हुए झूठ को सच बना डालता है। इस प्रक्रिया में जाने-अनजाने ही वो अपने विरोधी-पक्ष को दुश्मन मान बैठता है। ऐसा कई बार देखा गया है कि कुछ एक मतों को बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ इसलिए स्वीकार नहीं करता क्योंकि वो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते। ऐसे में उसकी ईमानदारी संदिग्ध होना स्वाभाविक है। परिणामस्वरूप वार्ताकार तो अपना हित साध लेता है मगर अवाम को नुकसान पहुंचा जाता है। यहां यह मान लेना कि आमजन सब समझता है, ठीक नहीं होगा। सत्य तो यह है कि भोली-भाली जनता इन बातों में कई बार आ जाती है। और शायद इसीलिए एक तरफ सत्ता बरकरार रहती है तो दूसरी तरफ अवाम की मुश्किलें हमेशा बनी रहती है। शक्तिशाली जानता है कि परिस्थितियों की यथास्थिति कैसे बनायी रखी जा सकती है और वो अपने दांव खेलता रहता है।
शकुनि ने सत्ता प्राप्ति की हर चाल को राजनीति कहकर महिमामंडित किया था। आज का तमाम शक्तिशाली वर्ग उनका अनुयायी बनता नजर आता है। सवाल उठता है कि क्या आज के पितामह भीष्म-प्रतिज्ञा तोड़ेंगे? क्या कृष्ण एक बार फिर अवतार लेंगे? अगर नहीं तो इस कलियुग को कौन पार लगायेगा? आज का अर्जुन क्या यूं ही भ्रमित रहेगा? बहरहाल, और कुछ नहीं तो कम से कम संजय ही सच का बखान कर अंधे धृतराष्ट्र की आंखें खोले, वरना सर्वनाश सुनिश्चित है।
मनोज सिंह
Jan
23
2012
पिछले दिनों दूध की शुद्धता को लेकर मीडिया में अच्छी-खासी चर्चा हुई थी। यकीनन इसने कई घरों में सनसनी फैलायी होगी। बच्चे तो अमूमन दूध पीने से बचने के चक्कर में रहते हैं। उन्हें अब एक अच्छा बहाना मिल गया होगा और वे खुश हुए होंगे। लेकिन जबरन दूध पिलाने वाले मां-बाप को इस खबर से धक्का लगा होगा। ऐसे कई परिवार और व्यक्ति मिल जायेंगे जो दूध पीने को स्वस्थ जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं एवं साथ ही इसे बड़े गर्व के साथ चार लोगों को बताने की सदा कोशिश में रहते हैं। दिन में कम से कम एक गिलास दूध पीने वाले कई मिल जायेंगे। उनकी इस दैनिक आदत पर अब क्या असर होगा? शोध का विषय होना चाहिए। बहरहाल, मैं दूध से बचता रहा हूं, लेकिन खोये की बनी मिठाइयां और दही मेरे प्रिय व्यंजन की सूची में ऊपर के पायदान पर आते हैं। उपरोक्त खबर के बाद यह सवाल मन में आना शुरू हो चुका है कि कहीं मैं दूध-दही की जगह जहर तो नहीं खा रहा।
बचपन को याद करता हूं तो दूध आम घरों में सीमित मात्रा में ही उपलब्ध हुआ करता था। साइकिल पर चलने वाले दूध वालों की समाज में अपनी विशिष्ट पहचान थी। दूध में पानी मिलाने की बात अमूमन की जाती थी। और यह दूध वाले के साथ नोकझोंक का एक सूत्र होता था। उत्तर भारत में विशेषकर पंजाब और आसपास के क्षेत्र में तो दूध-दही और पनीर का प्रचलन था मगर देश के अन्य हिस्सों में यह आम आदमी के रोजमर्रा के खाने की थाली में नहीं देखा जाता था। पिछले दो-तीन दशक में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है, परिणामस्वरूप खेत-खलिहान सिकुड़े हैं तो साथ ही दूध के लिए गाय-भैंस के ऊपर भी दबाव बढ़ा होगा। लेकिन दूसरी तरफ दूध-दही और पनीर गांव-गांव, घर-घर में अब आम देखा जा सकता है। इस अंतर्विरोध को समझने की जगह हमने इसे विकास से जोड़ दिया। आलू-गोभी-बैंगन की सब्जी वाले क्षेत्रों की शादियों में भी अब पनीर परोसा जाने लगा। ये अब आधुनिक होने का पैमान बन चुका है। मीडिया के विज्ञापन और आधुनिकता की चाहत का इतना प्रभाव है कि मां के दूध के बाद सीधे दाल-रोटी खाने वाला परिवार भी अब बच्चे को दूध में तरह-तरह के डिब्बाबंद पाउडर मिलाकर पिलाने में गर्व महसूस करता है और इस तरह स्वयं को विकसित कहलाने की दौड़ में शामिल कर चुका है। इस नकल की अंधी दौड़ में हम इतने पागल हो चुके हैं कि हमें कुछ और दिखाई नहीं देता। हमने यह जानने-समझने की कोशिश ही नहीं की कि इतना दूध आ कहां से रहा है। दूध पर जम रही मोटी मलाई और सफेदी के पीछे के राज को हम समझ नहीं पाये और इसे जाने-अनजाने देश-समाज के विकास से जोड़कर देखते रहे। असल में, विकास शब्द हमारे जेहन में सुबह-शाम तोते की तरह रटा दिया गया है कि हमें कुछ और समझ ही नहीं आता। हजारों वर्षों में धीरे-धीरे पनपी संस्कृतियों को ऐसा अहसास कराया गया है कि मानों पिछले दो-तीन दशक में जो कुछ हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। आधुनिक सोच ने बीस-पचीस साल पूर्व तक की सभ्यता के तमाम पैमानों को सिरे से नकार दिया और स्वयं को अति विकसित कहलाने का डंका पीट दिया। हरेक व्यक्ति में तथाकथित विकास के नाम पर इतना अहम् भर दिया गया कि वह फूलकर अपने आप को दुनिया का सबसे होशियार व्यक्ति मानने लगा। उसे ज्ञान की ऐसी दवा पिलायी गई कि वो कुछ और सोच ही नहीं सकता।
क्या यही विकास है? उपरोक्त स्थिति से तो यही प्रतीत होता है कि बाजार ने मीडिया के सहयोग से अपने मक्कड़जाल को एक बेहतरीन शब्द से सुशोभित कर रखा है। जिसमें आदमी को फंसाना बड़ा आसान है। वैसे देखें तो पिछले दो-तीन दशकों में विकास के नाम पर हमने क्या-क्या पाया? हर दूसरे हाथ में मोबाइल, हर घर के अंदर पहुंचता कंप्यूटर-इंटरनेट और बाहर बरामदे में दो से चार पहिया वाहन, साथ ही हर परिवार में टीवी-फ्रिज, बड़े-बड़े मॉल आदि-आदि। और हां, मध्यम वर्ग ने अपने कपड़े चमकीले और भड़कीले जरूर कर लिये हैं। महिलाओं ने जहां श्रृंगार पर अपने नखरों को और हवा दी, वहीं पुरुषों ने भी इस क्षेत्र में दखल की है। घर-दुकान और कार्यालय ही नहीं स्कूल भी वातानुकूलित होने लगे। इन तमाम चीजों में एक मूल तथ्य समान रूप से उपस्थित है, ये सब शारीरिक सुख-सुविधाओं, जिसे भौतिक और उपभोग की वस्तु कह सकते हैं, से संबंधित हैं। आज स्कूली छात्र भी मोबाइल रखने लगा है। यूं तो इसका औचित्य सीधे-सीधे समझ नहीं आता? लेकिन सामान्य रूप से पूछने पर भी तमाम समाज आपके ऊपर चढ़ बैठेगा। जबकि यहां यह पूछा जाना चाहिए कि इससे आपको प्राप्त क्या हुआ? अर्थव्यवस्था के मायाजाल में न फंसे तो यह तो यकीन से कहा जा सकता है कि पहले भी बच्चे दूर-दूर पढ़ने जाया करते थे, बल्कि आज से कहीं अधिक दूर रहकर भी अपने परिवार से भावनात्मक रूप में जुड़े रहते थे। रिक्शेवाले और दैनिक मजदूरों के हाथ में मोबाइल देकर हमने विकास का ऐसा कौन-सा फायदा इस वर्ग तक पहुंचाया है? सिवाय इसके कि वह अपने सीमित आय का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा इस अनावश्यक सेवा में गंवाता है और एक वर्ग को और अधिक अमीर बनाने में सहयोग करता है। इसी तरह के प्रश्नों का सीधे-सीधे जवाब जब नहीं बनता तब पढ़ा-लिखा वर्ग भी विकास की परिभाषा के वही रटे-रटाये जवाब सुनाने लग पड़ता है। बिजली के उपकरणों पर हमारा जीवन पूरी तरह निर्भर कर दिया गया मगर इस बिजली का उत्पादन प्रकृति के साथ किस तरह खेलता है हम इससे अनभिज्ञ ही रहते हैं।
उपरोक्त तमाम विकास किस कीमत पर हुआ है? क्या अवाम की मूलभूत आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान पूरी हुई है? अगर इसे ध्यान से देखें तो स्थिति और अधिक भयावह उपस्थित होती है। और कुछ हो न हो इसने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया। विकास के नाम पर हुए फायदे के नशे में चूर वर्ग भी इसे ठीक से समझ नहीं पा रहा। असल में श्रृंगार-प्रसाधन के चक्कर में आंतरिक सौंदर्य कम हुआ है। वातानुकूलित वातावरण की चाह ने लोगों को दीवारों के भीतर कैद कर दिया। कृत्रिम हवा ने शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता को कम करने के साथ-साथ लोगों की सोच को भी संकुचित किया है। घर के एक चूल्हे की जगह अब कई रसोई बन चुकी है और परिवार टूट चुके हैं। समाज में भौतिक सुख-सुविधा की अंधी दौड़ में हर इंसान पागल है। प्रतिस्पर्द्धा ने मानवीयता को बहुत पीछे छोड़ दिया है। शराब पीना अगर आधुनिकता की निशानी है तो हां हमने बहुत विकास किया है। अब हिन्दुस्तान के हर एक महानगर के हर दूसरे रेस्टोरेंट में लड़कों के साथ-साथ लड़कियां भी शराब के नशे में धुत्त सिगरेट का धुआं फेंकते हुए मिल सकती हैं। उस पर तुर्रा यह कि अगर आपने इस संदर्भ में कुछ भी लिखा या बोला तो आप नारी-विरोधी एवं पुराने खयालात के दकियानूस आदि-आदि घोषित किये जा सकते हैं। यही नहीं, आधुनिक विचारधाराओं के पुजारी आपको ऐसा बहुत कुछ कह सकते हैं जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। ये पुरुष और स्त्री दोनों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बराबर से है, कहने के बावजूद इसे नारी स्वतंत्रता से जोड़ दिया जायेगा। शिक्षा के क्षेत्र में विकास की बात करें तो हां हमने शिक्षित होने के प्रतिशत को तो कई गुणा बढ़ा लिया है लेकिन समझदारी का इंडेक्स बुरी तरीके से नीचे गिरवा लिया। शिक्षा अब व्यवसाय व पैसा कमाने का एक रास्ता बन चुका है। जहां मानवता, समाज, राष्ट्र अब गौण हो चुके हैं। शिक्षा जीवन के भौतिक स्तर को बढ़ाने में सहायक हो गई है जबकि मानसिकता स्वार्थी और व्यक्तिगत होती चली गयी है। अध्यात्म या दर्शन को छोड़ें, शिक्षा का मूल तथ्य ज्ञान भी नदारद है। इसकी जगह अब सूचना ने ले ली है। बच्चा-बच्चा इंटरनेट पर सोशल वर्किंग-साइट से जुड़ चुका है। वो कंप्यूटर पर ही तमाम तरह के खेल खेलने लगा है। अगर यही विकास का पैमाना है तो यकीनन बहुत कुछ हुआ है। अब बच्चा खुली हवा में मैदान में जाकर खेलता नहीं। उसके शरीर पर मिट्टी नहीं लगती। शाम को तैयार कर बच्चे को बाहर खेलने भेजना प्रचलन में नहीं रहा। खेलते-खेलते कपड़े गंदे हो जाना अब स्वीकार्य नहीं। इसीलिए आजकल हम अपने तमाम दाग आधुनिक डिटेरजेंट से पूरी तरह साफ कर देने के चक्कर में रहते हैं। हम यह भूल चुके हैं कि इसी मिट्टी में ऐसे कई तत्व हैं जो हमारे शरीर के लिए अति आवश्यक हैं। धूप की गर्मी व खुली हवा में सांस लेना अब हमारी विकास की परिभाषा में नहीं आता। अब तरह-तरह के डिब्बेबंद टॉनिक पिलाकर हमारे बल्लेबाज घर पर ही चौके-छक्के मारते दिखाये जाते हैं। ये किताबी-शेर हमारे जीवन को हवा बना दे रहे हैं। नदी में बहता स्वच्छ जल अब हमारे लिये एक आश्चर्य का विषय हो सकता है। विकास की धमा-चौकड़ी ने हमारे झरनों-तालाब-नदियों को कब प्रदूषित कर दिया इसकी हमें खबर भी नहीं। उलटे बोतल में बंद पानी हमारे आधुनिकता की नवीनतम पहचान बना दी गयी और हम पानी के लिए भी पैसे खर्च करने लगे। मिट्टी के बर्तन में रखे गये खाने का सौंधापन अब कहां? पिज्जा-बर्गर और महीनों पुराना डिब्बाबंद खाना विकास की नयी परिभाषा गढ़ रहे हैं। ऐसे में हमने कई सारी नयी मुश्किलों और परेशानियों व बीमारियों को भी जन्म दिया है। हां, विज्ञान के विकास से हमने अपने जीवन को लंबा खींच तो लिया लेकिन उसमें वो जीवन-रस कहां जो हर पल जीने के लिए लालायित रखे। अगर सौ साल का एकाकी जीवन ही विकास की परिभाषा है तो इस पर बहुत जल्दी कई सवाल खड़े होने लगेंगे जिसका जवाब आने वाली पीढ़ी के पास नहीं होगा।
मनोज सिंह
Jan
17
2012
यूं तो पत्रों द्वारा पाठकों की राय मिलती रहती है। और यदाकदा टेलीफोन भी आ जाते हैं। मगर यह कॉल कुछ विशिष्ट थी। इसने मुझे रुककर सोचने के लिए मजबूर किया था। दूरदराज के क्षेत्र से किसी पाठक का फोन था। फोन पर वह असहज लग रहा था। कह सकते हैं कि कुछ-कुछ डर रहा था। उसकी बातों से लगा कि वह इस बात से आशंकित था कि कोई उसकी बात सुन तो नहीं रहा। उसकी धीमी आवाज में कहीं न कहीं भय का समावेश था। वह अपनी बातें कहने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि वह सही व्यक्ति से बात कर रहा है। उसने मेरा नाम कई बार पूछा था। ऐसा लगा कि वह मुझे मेरे लेखों के कारण पसंद करता था और बहुत हद तक प्रभावित भी था। शायद यही वजह थी कि वह अपने दिल की बात कहने के लिए प्रेरित हुआ। उसने हिम्मत जुटाई थी। वार्ता से यह पता चला कि वह अपने आसपास होने वाली विभिन्न गैर-कानूनी काम मसलन जंगल की कटाई, खदानों का अवैध खनन, ड्रग्स की तस्करी और इसी तरह की विभिन्न असामाजिक कार्य से बेहद दुखी है। वो किसी व्यक्ति विशेष या संस्था का नाम नहीं ले रहा था और उसकी तमाम बातें आम थीं मगर उसे वो विशिष्ट लग रही थीं। उसके मतानुसार एक पूरा समूह है जो इन कार्यों को अंजाम देता है इससे जुड़ा हर व्यक्ति पैसे बनाने के लालच में अंधा हो रहा है, ये लोग कुछ भी सुनने-समझने को तैयार नहीं, उल्टे रास्ते में दखल देने वाले किसी भी शख्स को छोड़ते नहीं। आगे बातचीत से पता चला कि वो इन कामों को रुकवाना चाहता था और इन सब बातों को देख-देखकर उत्तेजित था। उसकी व्यथित मानसिक अवस्था को देखते हुए मैंने उसे धैर्यपूर्वक सुनने की कोशिश की तो बातचीत में वह सच्चा देशभक्त लग रहा था। एक ऐसा व्यक्ति जिसे सिर्फ अपने या अपने परिवार से ही प्यार नहीं था बल्कि वह संपूर्ण समाज व देश के लिए संदर्भित व चिंतित दिखाई दे रहा था। ऐसा प्रतीत होता था कि वह चारों ओर घटित हो रही घटनाओं को देख-देखकर अंदर से पूरी तरह से हिल चुका है। वह यह जानता था कि तमाम गैर-कानूनी कामों के पीछे बड़े-बड़े हाथ हैं जो ऊपर कहां तक संबंधित हैं, कहा नहीं जा सकता। वह यह भी जानता था कि वे लोग उसे किसी भी वक्त नुकसान पहुंचा सकते हैं और उसे मिट्टी में मिला सकते हैं। ऐसे में उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए। यह सब कुछ जानते हुए भी वह अपने अंदर इतनी ऊर्जा जुटा पाया कि अपने दिल की बात किसी अनजान से कह गया। उसकी बातों में वर्तमान व्यवस्था को लेकर असंतोष था और उसका विरोध दबे स्वरों में भी मुखर हो रहा था। वह वर्तमान राजनीतिक अवस्था से भ्रमित लग रहा था।
उपरोक्त तस्वीर हिंदुस्तान के किसी भी क्षेत्र की हो सकती है बस काम के रंग-ढंग बदल सकते हैं मगर आम आदमी की अवस्था एक-समान ही होगी। अपने आसपास घटने वाली गलत घटनाओं को हम अमूमन देखकर अनदेखा करते है। और दोस्तों-यारों के बीच भी इधर-उधर देखकर अप्रत्यक्ष रूप से ही धीरे से बोलते हैं। साथ ही यह भी कहते हैं कि किसी को बताना मत। बड़े और प्रभावशाली लोगों का नाम जानते हुए भी हम डरकर आमतौर पर बताने से बचने की कोशिश करते हैं। मगर उस व्यक्ति ने अपनी सीमाओं से बाहर जाकर प्रयत्न किया था। इसीलिए वो विशिष्ट था। उसका प्रश्न था कि क्या मैं इस में कुछ नहीं कर सकता? मेरे मौन ने उसे हतोत्साहित किया था। बाद में मैंने स्वयं की ओर देखा तो मुझे बेचैनी हुई थी।
समाज की अव्यवस्थाओं से दुखी होकर अमूमन हम व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्रांति की बात करते हैं। इस दौरान बड़े-बड़े क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है। हम आम जनता में उनसे उत्साह भरवाते हैं और तालियां बजवाते हैं। मगर सत्य तो यह है कि हर दूसरा आम व्यक्ति क्रांतिकारी नहीं बन सकता। इसे गुण-अवगुण जो कहें मगर वो अपनी प्राकृतिक क्षमताओं में सीमित रहकर जीवन गुजर करता रहता है। और अमूमन विद्रोह नहीं कर पाता। उलटे अत्याचार और शोषण को सहता रहता है। सदियों तक क्रूरता का शासन रहा क्योंकि आम आदमी डरता है। वो किसी भी मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार नहीं बल्कि परिणामों से सहमा होता है और तभी सामान्यतः विरोध में खड़ा नहीं हो पाता। आमतौर पर हम सब अपने आसपास होने वाली गलत घटनाओं से दुखी व परेशान होते हैं और दिन-प्रतिदिन बिगड़ती स्थिति के लिए मन ही मन उद्वेलित भी रहते हैं। अव्यवस्था हमें क्षणिक ही सही मगर आक्रोशित करती है। हमारा क्रोध भट्ठी बनकर स्वयं को ही जलाता रहता है। वर्तमान काल तो और भयावह है। इस वैज्ञानिक काल ने अमानवीय एवं गैर-कानूनी कार्य करने के लिए आधुनिक अस्त्र-शस्त्र के साथ-साथ चेहरे पर नकाब लगा लिये हैं और वह बेहद चतुराई से अपने खेल को खेल रहा है। वह पहले से अधिक क्रूर हुआ है। साधारण व्यक्तियों का दमन शारीरिक ही नहीं अब मानसिक भी होने लगा है। स्थितियां इतनी बिगड़ चुकी हैं कि चारों ओर होने वाली तथाकथित क्रांतियां भी अब भ्रमित करती हैं और कई शासकों के तख्ता-पलट प्रायोजित व पूर्व नियोजित लगते हैं। यह एक तरह की छद्म क्रांतियां हैं जिसमें कई बार भाग लेने वाले क्रांतिकारियों को स्वयं पता नहीं होता कि वह किसी के हाथों की कठपुतलियां बन चुके हैं। उधर, मीडिया अपनी विश्वसनीयता तेजी से खो रहा है। और वो कब शासक के हाथों विष फैला रहा हो, कहना और समझना मुश्किल है। घटनाएं समाचार बनते-बनते अपनी आत्मा खो चुकी होती हैं और उन्हें ऐसे शब्दों में परोसा जाता है जो भावार्थ को पलटकर रख देते हैं। हिंदुस्तान में भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, हम विकास की रफ्तार तेज करने के चक्कर में खुद को समुद्री भंवर में फंसा चुके हैं। जो कब हमें रसातल में ले जाये पता नहीं। सबसे अधिक चिंता की बात है कि यह सांस्कृतिक और सभ्यता की गुलामी का दौर है। ऐसे में उस समाज को कोई नहीं बचा सकता जहां का बुद्धिजीवी वर्ग भी दूसरों की निगाह से देखने लगे और असंदर्भित व असंबंधित विचारधारा पर सवारी करके अपनी बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन करे। यही नहीं जब उसे रोका-टोका जाये तो वह रुककर सोचने की बजाय ताल ठोंककर हर तरफ से शब्दों व विचारों की बमबारी करने के लिए तैयार हो जाये। परिणामस्वरूप समाज मानसिक गुलामी की ओर बढ़ने लगता है। और फिर उसे युगों-युगों तक शासित व शोषित बनाये रखने से कोई नहीं रोक सकता।
इन सबके बावजूद उपरोक्त व्यक्ति की वेदना अंधकारमय वातावरण में आशा की किरण लेकर आती प्रतीत होती है। इसे क्रांति के बीज के रूप में भी लिया जा सकता है। छोटे-छोटे प्रयास ही बाद में बड़े काम करने के लिए प्रेरणा का ह्लोत बनते हैं। हर सामान्य व्यक्ति ऐतिहासिक व महान या बहुत लोकप्रिय क्रांतिकारी या सेलेब्रिटी सामाजिक कार्यकर्ता ही हो, कोई जरूरी नहीं। वैसे भी हिंदुस्तान में मंच पर बैठने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। नेता बनने की ख्वाहिश बढ़ती जा रही है। जबकि अधिकांश में नेतृत्व के लिए आवश्यक प्राकृतिक गुण नहीं। अब राजनीति समाज सेवा का क्षेत्र नहीं रहा बल्कि कमाई का जरिया बन चुका है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा सर्वोपरि है। प्रजातंत्र तो कहने के लिए है, राजनीति के द्वारा धीरे-धीरे पारिवारिक व्यवस्था ने अपना आधिपत्य जमा लिया है। आज अधिकांश नेता जमीन से उठकर खड़े हुए कम बल्कि ऊपर से समाज पर थोपे हुए अधिक प्रतीत होते हैं। इनके असली उद्देश्य छिपे हुए और भिन्न हैं। मगर ऐसे नेतृत्व के पीछे की भीड़ भी नदारद है। और जो है भी वो जुटाई हुई लगती है। मगर फिर भी वो सफल और सत्ता में है और बने रहने के लिए सारे हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे भ्रमित माहौल में आम आदमी की आवाज कहां मायने रखती है? उसे तो उपयोग में लाया जाता है। मगर सत्य यह भी है कि जब उसके सहने की क्षमता समाप्त हो जाती है, जब वह अति का शिकार हो जाता है, जब वह रुक नहीं पाता, अपने आप को रोक नहीं पाता तो उसकी भयभीत आंखें चारों ओर हो रहे अत्याचार एवं हाहाकार के बीच में भी तिनके का सहारा ढूंढ़ने के लिए बेचैन रहती है। इसी बेचैनी को जब शब्द मिलता है तो क्रांति की चिंगारी सुलगती है। यह कब ज्वालामुखी में परिवर्तित हो जाये, कह नहीं सकते। आम आदमी के अंदर की आग छोटी-सी चिंगारी के रूप में निकलती जरूर है मगर वो चाहता है कि यह आग का शोला बने। विद्रोह की शुरुआत यहीं से होती है। जिस दिन भी इस दबी-कुचली ऊर्जा को रास्ता प्राप्त होगा वो बिजली की तरह चमक उठेगी। और अंधेरे में उजाला तेजी से चारों और फैल जाएगा।
मनोज सिंह
Jan
09
2012
क्या समय का अस्तित्व है? यह एक मुश्किल सवाल है। इस मुद्दे पर विज्ञान भी अंधेरे में तीर चलाता है और अंतरिक्ष में जाकर तो भ्रमित हो जाता है। बहरहाल, समय की गति को न तो तेज किया जा सकता है न ही धीमे। इसे रोकना तो फिर असंभव है। सच तो यह है कि पीछे मुड़कर भूतकाल में देखा तो जा सकता है, मगर वहां फिर से जाया नहीं जा सकता। भविष्य के गर्भ में तो फिर रहस्य ही होता है। समय का स्वयं अस्तित्व हो न हो मगर यह आम आदमी से लेकर महानतम बलशाली राजाओं के निजी जीवन ही नहीं वंश तक के अस्तित्व समाप्त होने का साक्षी रहा है। तभी कहा जाता है कि समय बहुत बलवान है। और न जाने इसी तरह की अनगिनत विचारधाराएं एवं धारणाएं हमारे आम बातचीत से लेकर अचेतन मन तक में निरंतर चलती रहती हैं।
पच्चीस वर्ष का कालखंड जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। और अगर यह युवा अवस्था से लेकर अधेड़ होने के बीच का हो तो महत्वपूर्ण भी हो जाता है। मौलाना आजाद नेशनल इंस्टिच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (इंजीनियरिंग कॉलेज) से निकलने के पच्चीस वर्ष पूर्ण होने पर सहपाठियों द्वारा फिर से मिलने का कार्यक्रम बनाया गया था। ‘रजत जयंती पुनर्मिलन समारोह’ भोपाल में कॉलेज प्रांगण में ही होगा, यह जानकार मैं उत्साहित हुआ था। अगर आपका जीवन घटनाओं से भरा हुआ है तो वह तेजी से कब बीत जाता है, पता नहीं चलता। यादें भी धूमिल होती रहती हैं। समय के मस्तिष्कपटल पर बार-बार नया लिखने पर पुरानी बातें कई सतहों के नीचे दबकर अदृश्य हो जाती हैं। ऐसे में अगर अधिकांश मित्र कालेज से निकलने के बाद पहली बार मिल रहे हों तो सबको एकदम से पहचान लेना संभव नहीं होता। लेकिन फिर भी बहुत अधिक मुश्किल नहीं हुई थी। वही आत्मीयता, वही अपनापन, वही भावनाएं। यह सब देख बहुत देर तक विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना समय बीत चुका है। हैरानी हुई थी, मगर सत्य है, इतने वर्षों के बाद बचपन के दोस्त मिलते ही मैंने अपने व्यवहार में भी परिवर्तन महसूस किया था। और यह युवावस्था में प्रारंभिक दौर में फिर से पहुंचती दिखाई दी थी। फिर वही अल्लहड़ता, उन्मुक्तता, आवारापन। जिह्ना पर अनायास ही अशुद्ध शब्दों का बिना किसी रोक-टोक के आना इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। और अमर्यादित भाषा के प्रयोग के बावजूद सामने वाले का बुरा न मानना इसे प्रमाणित कर रहा था। ताज्जुब तो इस बात को देखकर हुआ कि सभी उसी तरह से पेश आ रहे थे जिसके लिए वो जाने व पहचाने जाते थे। और वे अपनी-अपनी विशिष्ट शैली में ही वार्तालाप में भाग ले रहे थे। पुरानी बातें खुलकर की जा रही थी। बचपन के साथियों के बीच वैसे भी कोई पर्दा कहां रहता है। जबकि बड़ी उम्र के साथियों के साथ ऐसे सरल और सपाट व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन यहां सब कुछ वही था, वही दीवानगी थी, जिसमें निरंतर गूंज रहे थे ठहाके। युवावस्था में की जाने वाली प्रेम संबंधित ज्ञान की विशिष्ट विचारधारा एक बार फिर वार्ता के केंद्र में थी। और कहीं से प्रतीत नहीं होता था कि हम जवान बच्चों के मां-बाप बन चुके हैं और दादा-नाना बनने के कगार पर खड़े हैं। हंसी-मजाक, चुटकुले, छेड़छाड़ में कोई भेदभाव नहीं था। जिसके बीच पुराने प्रेम के किस्से नयी बोतल में पुरानी शराब की तरह लग रही थी। किसी के दिल में पुराना दर्द उठा हो तो इस संभावना को सिरे से नकारा भी नहीं जा सकता। ऐसे मदमस्त व आत्मीय माहौल ने एक बार फिर सोचने के लिए मजबूर किया था कि क्या वास्तव में पच्चीस साल पूरे हो गये? किसी के कमर का मोटापा तो किसी के सिर के चमकीलेपन ने कुछ-कुछ इस बात का अहसास कराया था। जो समझदार थे वे इस कार्यक्रम में अकेले ही आये थे। और जो जरूरत से ज्यादा पत्नी-भक्त थे वे परिवार सहित पधारे थे। उनके बातचीत व व्यवहार में परिवर्तन ने थोड़ी हैरानी जरूर पैदा की थी, लेकिन उसका कारण समझने में भी देर नहीं लगी। और फिर इन सब बातों ने भी बातचीत में मजाक का एक और विषय जोड़ दिया था। बहरहाल, परिवार सहित आये सहपाठियों ने ऐसा करके तमामउम्र के लिए मुसीबत मोल ली थी। ऐसा कइयों का मानना था। न जाने कौन-सी ऐसी बात घरवाला/घरवाली को पता चल जाये जो हो तो छोटी और आज की तारीख में अप्रासंगिक मगर फिर भी तिल का ताड़ बना दी जाये।
ठंड की छुट्टियों में हिंदुस्तान के तमाम कॉलेजों में इस तरह के रजत जयंती समारोह कार्यक्रम मनाये जाते हैं। इस उम्र तक पैसा और पॉवर के क्षेत्रों में आप शिखर के करीब होते हैं और आपका जीवन काफी हद तक आपके नियंत्रण में होता है। शरीर के पुर्जे आवाज तो करने लगते हैं लेकिन उनमें अभी भी बहुत हद तक दम-खम होता है। इसलिए मस्ती का पूरा आलम होता है। बड़े-बड़े होटलों में दावत, जिसमें मदिरा खुलेआम पूरी रफ्तार के साथ बहती है। और यह दो से तीन दिन का कार्यक्रम आधुनिक जीवन की नीरसता और उबाऊपन को दूर करने में सहायक होता है। अधिकांश कार्यक्रमों में कॉलेज के अपने-अपने समय के तत्कालीन प्राध्यापकों को भी आमंत्रित किया जाता है। कुछ एक दूसरी दुनिया की यात्रा में जा चुके होते हैं तो कई शरीर के हाथों मजबूर देखे जा सकते हैं। उनकी बुजुर्ग अवस्था एक बार फिर समय की निष्ठुरता को प्रमाणित करती है। मैं कइयों की वर्तमान शारीरिक हालात को देखकर स्तब्ध हुआ था। ये पुराने मजबूत किलों को खंडहर में परिवर्तित होते देखने जैसा अनुभव था।
समय की बलिहारी तो और भी कई तरह से देखी जा सकती है। इन पच्चीस वर्षों में कोई छात्र करोड़पति बन जाता है तो कोई अपनी फटेहाली को छुपाने में प्रयासरत रहता है। कोई चीफ इंजीनियर बन जाता है तो कोई जूनियर इंजीनियर ही रह जाता है। कोई विदेश में नाम व दाम कमा रहा होता है तो कोई अपने ही देश में वीराना कहलाता है। आदि-आदि। यूं तो इस असमानता के बावजूद निश्छल बचपन की भावना से मिलने की बात ही प्रबल होती है। और यह भी सत्य है कि एक-दूसरे से मात्र यह पूछा जाता है कि तू कैसा है? और कहां है? अमूमन यह नहीं पूछा जाता कि क्या है? या क्या बन गया है? मगर साथ ही कुछ हद तक यह भी सच है कि पैसा और पॉवर का नशा कब किसके सिर पर चढ़कर बोल पड़े, कहा नहीं जा सकता। कई चेहरों पर इसे पढ़ा जा सकता है। ऐसे में बचपन का प्रेम कभी-कहीं एक स्वांग बनकर रह जाता है। समय के उतार-चढ़ाव रिश्तों की बुनियाद में घुसकर कब उथल-पुथल मचा देते हैं, ऊपरी तौर पर तो पता नहीं चलता। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत में अपना रंग दिखा ही देते हैं। यूं तो किसी के चेहरे की रौनक तो कइयों के होंठों का सूखापन एक-दो दिन की मस्ती में कहीं छुप जाते हैं और आमतौर पर पढ़े नहीं जाते। लेकिन जब उभरते हैं तो दिल पर सीधे प्रहार कर टीस पैदा करते हैं। मस्ती में खाते-पीते, चिल्लाते और नाचते रहो तो सब ठीक है, रुककर सोचते ही क्या खोया, क्या पाया की शुरुआत हो जाती है। असल में समय अपनी रफ्तार से आपके जीवन का हरेक पक्ष काटते-पीटते व जोड़ते हुए निरंतर आगे बढ़ता रहता है। इन सबके बावजूद अट्टहास, छेड़छाड़, मस्ती और रिश्ते के बीच चुलबुलापन समय के रूखेपन को चुनौती देता है। और इनसान समय के रेतीले सफर पर अपना मील का पत्थर गाड़ने की एक और कोशिश करता है, जिस पर इस बार लिखा हुआ था रजत जयंती समारोह। यह रास्ता आगे चलकर स्वर्ण जयंती समारोह के मोड़ से भी गुजरेगा। हम फिर मिलेंगे। इन्हीं आशाओं के साथ दोस्त विदा हुए थे। मगर इस बार आंखें नम हो रही थीं क्योंकि सबको पता है कि समय बहुत कातिल है। यह किसी को नहीं बख्शता। पता नहीं कितने साथी अगले दौर तक पहुंचने से पहले ही समय के हाथों हार जायें।
मनोज सिंह