Himachal View theme

Mar 06 2010

अपने ही शहर में अनजान

Published by Singh Manoj under Weekly Article

करीब 25 साल के लंबे अंतराल के बाद अपने शहर में जाना हुआ था। यहां युवा जीवन के महत्वपूर्ण पांच वर्ष बिताये थे। भोपाल के मौलाना आजाद इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी। यह मध्य भारत का एक प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थान है। यह कहना अनुचित न होगा कि यहां दाखिला कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के बाद ही मिलता है और बेहद पढ़ाकू व किस्मत वाले छात्र ही इन संस्थाओं में पहुंच पाते हैं। जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं का स्तर और अधिक तीव्र हुआ है और इस तरह के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश पाना दिन-प्रतिदिन छात्रों के लिए एक सपने से कम नहीं। स्कूल व कक्षाओं में अव्वल रहने वाले इन छात्रों में भी अतिरिक्त ऊर्जा, मस्ती, सपने व उमंग का होना स्वाभाविक और नैसर्गिक है। युवावस्था में इसे उम्र का तकाजा भी कहा जा सकता है। ऊपर से हॉस्टल में रहने वालों का छात्र जीवन तो विशेष होता ही है। सबकी अपनी-अपनी कहानियां, जवानी के उन्मुक्त क्षणों की स्वप्निल दुनिया में कई रंग भरे होते हैं। चुनौतियां और कठिनाइयां भी हैं। दूसरी ओर, छोटी उम्र अर्थात अनुभवहीनता, तो फिर अपरिपक्वता तो होगी ही। ऐसे में घर के अनुशासित माहौल से पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होते ही जीवन कभी-कभी अनियंत्रित हो जाता है। स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में बहुत बारीक अंतर होता है। और इसी को पहचानने में कई बार चूक हो जाती है। इसे बचपन की नादानी कहकर नहीं बचा जा सकता। संपूर्ण स्वतंत्रता कई बार सर्वनाश का कारण भी बन जाती है। खैर, जो सवारी करते हैं वही खेल के मैदान में जीत भी हासिल करते हैं और अमूमन हॉस्टल जीवन से छात्र मजबूत व योग्य नागरिक बनकर बाहर निकलते हैं।
इतने वर्षों के बाद जाने के बावजूद शहर की मुख्य सड़कें ही नहीं कॉलेज के आसपास की गलियां, बाजार, दुकानें, यहां तक कि सड़क किनारे लगे हुए कई प्रतीकचिह्न जाने-पहचाने लग रहे थे। मगर उनसे अपने आपको जोड़ना, तारतम्य बनाना, इतना आसान नहीं। असल में पुरानी यादें मनुष्य के मस्तिष्कपटल पर अंकित व संचित होती हैं। जिसे रिवाइंड करने पर ही वो चित्र और संदर्भ उभर पाते हैं। और फिर खुली आंखों से आदमी इसे देखता रह जाता है। अन्यथा वर्तमान के धरातल पर आप अपने आप को चाहे जितना रुककर ढूंढ़ने की कोशिश करें कुछ हाथ नहीं लगता। कॉलेज के प्रांगण में कुछ विशेष नहीं बदला। हां, कुछ नई इमारतें जरूर बन गई। हमारी सामाजिक व्यवस्था पर समय का चक्र भी कमाल घूमता है। सब कुछ उसी तरह था सिवाय इसके कि हमारे स्थान पर नये छात्र आ चुके थे। हां, हम में से कुछ एक इस बीच उसी कालेज में अध्यापन का कार्य करते करते प्रोफेसर के पद तक पहुंच चुके थे। उनके लिए पीछे मुड़कर देखना शायद ज्यादा मुश्किल होता होगा, क्योंकि निरंतरता में यादों को संजोकर दिल के किसी कोने में छिपाकर समेटे रखना सरल नहीं। वर्तमान से निकलकर भूतकाल में जाना आम आदमी के लिए आसान नहीं। वैसे भी रोजमर्रा के जीवन में, रोटी-दाल के चक्कर से निकल पाना हरेक के लिए संभव नहीं।
अपने ही कॉलेज में, अपने प्रॉध्यापकों के बीच में, अभी कुछेक रिटायर नहीं हुए थे, किसी भी पूर्व छात्र के द्वारा संक्षिप्त उदबोधन देना, इन विशिष्ट लमहों को जीवन में एक पर्व के समान माना जाना चाहिए। मैं स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूं जो अपने शिक्षकों के बीच में, अपने लेखन के अनुभवों को बांटकर, उनसे अतिरिक्त आशीर्वाद प्राप्त कर सका। उनके लिए मैं आज भी एक युवा छात्र ही था। और उनके सामने जाते ही मुझमें भी बाल-सुलभ शरारतें हिचकोले मारने लगी थीं। मैं एक बार फिर अपनी उम्र से कहीं छोटे होने जैसा व्यवहार कर रहा था। घर-परिवार-समाज में बुजुर्गों के रहते हुए हम सदैव छोटे बने रहते हैं। इस सत्य को हम जानते तो हैं मगर इसका अनुभव किया जाना चाहिए। बहरहाल, इस दौरान वर्तमान छात्रों से बातचीत हुई और कुछ बिंदुओं ने विशेष रूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया था। तकरीबन सभी छात्रों के पास मोटरसाइकिल और हॉस्टल के कमरे में कंप्यूटर मिला। संचार के युग में इंटरनेट का होना औचित्यपूर्ण लगा परंतु मोबाइल की आवश्यकता पर मैं असमंजस में था। सैकड़ों की तादाद में बाइक के खड़े होने से हॉस्टल में चलने-फिरने की जगह नहीं रह गई थी। यह दृश्य हर दूसरे कॉलेज के छात्रावास में देखा जा सकता है। इसकी प्राथमिकता व जरूरत पर मेरी ओर से एक बड़ा प्रश्नचिह्न उभरा था। युवावस्था में यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो है ही, माता-पिता पर पैसे का अतिरिक्त बोझ। नयी पीढ़ी के लाखों-हजारों छात्रों के द्वारा खरीदी जाने वाली मोटरसाइकिल के कारण एक व्यवसायी को तो फायदा हो सकता है लेकिन प्रकृति का बेवजह दोहन और फलस्वरूप पर्यावरण को असंतुलित करना, निष्पक्ष बहस का मुद्दा होना चाहिए। तमाम हॉस्टल, कॉलेज से तकरीबन किलोमीटर के फासले पर होंगे और इस उम्र में इतनी दूरी पैदल तय की जानी चाहिए। घास और झाड़ियों के बीच में से सुबह-दोपहर-शाम चार-छह बार पैदल चलना, जाने-अनजाने ही स्वस्थ शरीर के लिए संजीवनी-बूटी का काम कर सकता है। मजबूत शरीर किसी भी कीमत पर चारदीवारी के अंदर बंद जिम के द्वारा नहीं बनाया जा सकता। इन आधुनिक उपकरणों से शरीर को गठीला या पतला तो बनाया जा सकता है, स्वस्थ नहीं। इसीलिए स्कूल-कॉलेज जीवन में पेट्रोलचलित वाहन छात्रों को देने के मुद्दे पर परिवार-समाज व कॉलेज प्रशासन को ध्यान देने की आवश्यकता है। हां, शहर और मार्केट दूर होने पर, पैदल जाना हमेशा संभव नहीं, ऐसे में साइकिल एक बेहतर विकल्प हो सकती है। अन्यथा नियमित बस की व्यवस्था एक उत्तम साधन होगा। यह सामूहिक और सामाजिक व्यवहार में अपनत्व भी बढ़ाता है। वरना आधुनिक तकनीकियां व सुविधाएं इंसान को इंसान से दूर करती हैं। आज के युवा छात्रों में एकाकीपन और उससे उत्पन्न होने वाली परेशानियों को बढ़ते हुए आम देखा जा सकता है।
इसमें कोई शक नहीं कि इन वर्षों में छात्राओं ने अधिक विकास किया है। उच्चशिक्षा में लड़कियों की बढ़ती संख्या इस क्षेत्र में इनकी सफलता का प्रमाण है। बातचीत करने पर आसानी से समझा जा सकता है कि आधुनिक युवावर्ग में लड़कियां अधिक स्वतंत्रत होने के साथ-साथ समझदार, सतर्क, स्वावलंबी, स्वाभिमानी, ऊर्जा व स्फूर्ति से भरपूर हैं। वे लड़कों से कहीं अधिक मेहनती, केंद्रित और संतुलित दिखाई दीं। उनके सपने उनके अपने थे और आदर्श महान। जबकि अधिकांश लड़के इंजीनियर बनते ही नौकरी और पैकेज के चक्कर में अधिक दिखाई दिए। यहां सामाजिक दबाव और पारिवारिक जिम्मेदारी भी कारण हो सकती है। शायद यही कारण है जो अधिकांश कमाने और बसने के लिए आतुर दिखे। हां, आईआईएम व मैनेजमेंट का प्रभाव नजर आया। इस क्षेत्र में भी जाने के लिए लड़कियों में अधिक उत्सुकता नजर आई। प्रशासनिक और पुलिस सेवा में जाने का जुनून भी कन्याओं में अधिक दिखाई दिया। यह आश्चर्य करने वाला था।
यह सर्वविदित है कि हिन्दुस्तान में अव्वल छात्र आमतौर पर इंजीनियरिंग की ओर चले जाते हैं। इसे अन्य क्षेत्र के महान व सफल लोग अन्यथा न लें। अगर यही छात्र अपने प्राकृतिक व बौद्धिक क्षमता का इस्तेमाल अन्य क्षेत्रों में करें तो कमाल कर सकते हैं। इंजीनियरिंग की डिग्री के कारण कई मामलों में वो अपनी संभावनाओं को सीमित कर लेते हैं। वे एक अच्छे वकील बन सकते हैं, मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ सकते हैं। कला के क्षेत्र में भी संभावनाओं की कमी नहीं। छात्रों के बीच जाकर यह सवाल पूछने पर कि राजनीति में जाना उनके जीवन की मंजिल क्यों नहीं? स्वयं का व्यवसाय क्यों नहीं? अधिकांश के पास इसका सीधा जवाब नहीं था। शायद जोखिम लेने की इच्छाशक्ति नहीं थी। यहां सवाल उठता है कि इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद भी क्या वे एक सफल व अच्छे संपादक और लेखक नहीं बन सकते? तकनीकी के क्षेत्र में हजारों-लाखों न्यायिक उलझनों को सुलझाने के लिए वकालत नहीं कर सकते? वे कम से कम एक अच्छे विज्ञान फंतासी के लेखक तो बन ही सकते हैं। और फिर विज्ञान और तकनीकी तो सभी व्यवसाय के केंद्र में होता है। यहां वे बेहतर ढंग से हाथ आजमा सकते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी और सामाजिक कार्य के लिए समर्पित व्यक्तित्व वाले छात्र थोड़ा कोशिश करें तो राजनीति में भी चमका जा सकता है। अगर आज की युवा पीढ़ी में से होनहार छात्र राजनीति में नहीं जाएंगे तो फिर विश्वपटल पर देश को महाशक्ति बनाए जाने का सपना कैसे पूरा होगा? इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं था। यह इतना आसान भी नहीं।
भोपाल एक बेहद खूबसूरत शहर है। विशिष्ट संस्कृति व स्थानीय बोली यहां की विशेष पहचान है। खुशी इस बात की है कि विभिन्न व्यवस्थाओं ने इन्हें बनाए रखने की सफल कोशिश की है। दशकों से, भारत भवन के कारण, भोपाल कला, साहित्य व रंगमंच के क्षेत्र में देश का केंद्र बिंदु रहा है। उसी शहर में एक साहित्य-प्रेमी के द्वारा साहित्यकारों की यादगार वस्तुओं को संग्रहीत करने की कल्पना साकार रूप ले रही है। लोकप्रिय साहित्यकारों की पांडुलिपियां व पत्रों आदि को संग्रह कर दुष्यंत पांडुलिपि संग्रहालय का अस्तित्व अपनी अनोखी पहचान बनाने में कामयाब हुआ है। यह अपनी ओर ध्यान आकर्षित करता है जबकि अभी प्रारंभिक अवस्था में है। देश-विदेश का छोटा-बड़ा हर लेखक, भोपाल आने पर इस संग्रहालय को देखने अवश्य जाता है। एक व्यंग्यकार ने तो यहां तक कह दिया कि यहां आकर लगता है कि अब मर ही जाएं, जिससे कि कम से कम मेरी व्यक्तिगत चीजें भी इस संग्रहालय में जगह पा सकें, और मैं हमेशा के लिए जीवित रह सकूं। मुझे भी यहां पर बतौर लेखक स्थानीय पत्रकारों, लेखकों, पाठकों व सृजनकर्ताओं से बातचीत का मौका मिला। अपने ही शहर में एक नयी पहचान प्राप्त करने का यह सुखद अनुभव था।
मनोज सिंह

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Feb 28 2010

रचनात्मकता में सत्यम्‌ शिवम्‌ सुंदरम्‌

Published by Singh Manoj under Weekly Article

दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज पूछने पर तरह-तरह के जवाब मिलेंगे। यहां व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का मामला बनता है। लेकिन अद्भुत शब्द जोड़ते ही तकरीबन सभी जवाब में प्रकृति केंद्र में आ जाएगी। और फिर इनमें पर्वत की विशालता हो सकती है। इठलाती बलखाती नदी। झरझर गिरते झरने। किसी को समुद्र की गहराई अच्छी लग सकती है। आकाश में बिखरे असंख्य तारे। चंद्रमा भी सुंदर लग सकता है। फल-फूल, पेड़-पौधों में तो एक से एक कई प्रकार हैं। किसी को गुलाब का फूल अच्छा लगता है तो किसी को चमेली की सुगंध। इसमें भी कई प्रजातियां हैं। मामला इतना उलझ जाता है कि गुलाब में भी किसी को लाल सुर्ख बड़ा गुलाब अच्छा लगता है तो किसी को थोड़ा मुश्किल से मिलने वाला काला गुलाब। कुछ को वर्षा ऋतु अच्छी लगती है तो कइयों को ठंड का मौसम। जितने लोग उतनी पसंद। कइयों की राय में मानव स्वयं सृष्टि की सबसे अद्भुत रचना है। तो कइयों का इनमें भी औरत विस्मित करती है। मगर यहां भी नारी को अलग-अलग रूप में पसंद किया जाता है। कई इसे जननी के रूप में देखते हैं तो कई जीवनसाथी के रूप में। गोरे रंग पर मर-मिटने की कहानी चाहे जितनी भी सुना दी जाये लेकिन आज भी काले रंग पर मरने वालों की संख्या कम नहीं। ऐसे लोग भी मिलेंगे जो जंगली जानवरों और पक्षियों में नैसर्गिक सुंदरता खोजते हैं। सुंदर-सुंदर तितलियां और छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ो के आकर्षक रूप-सौंदर्य को देखने के बाद कुछ और नहीं रह जाता। कुछ लोगों को तो शेर-चीता की शक्ति व ताकत पसंद आती है तो कई लोग कोयल की सुरीली आवाज के दीवाने देखे जा सकते हैं। अर्थात संक्षिप्त में कहें तो एक राय बन नहीं पाती।
कह सकते हैं कि संपूर्ण सृष्टि अपने आप में बेहद खूबसूरत है। यह रहस्यमय भी है। लेकिन नश्वर है। ये भौतिक रूप में परम सत्य नहीं, चूंकि स्थिर नहीं। जिस तरह से इंसान की पसंद स्थायी नहीं, सृष्टि में भी सब कुछ परिवर्तनशील है। यहां हर क्षण किसी नयी रचना का जन्म होता रहता है। ये सभी अपने आप में अनोखे और अद्भुत हैं। सृष्टि की इन रचनाओं में, तारे-ग्रह, बह्मांड, तारामंडल, सभ्यता, जीव-जंतु, उनकी प्रजाति, कुछ भी हो सकती है। संक्षिप्त में, समय के पैमाने पर जिस रफ्तार से जन्म होता रहता है, साथ ही धीरे-धीरे पुराना लुप्त होता चला जाता हैं। अर्थात यह सृष्टि सुंदर तो है मगर श्रेष्ठ नहीं चूंकि शाश्वत नहीं। और तभी ईश्वर की कल्पना आती है। शिव तो परम सत्य भी हैं और अति सुंदर भी हैं और सर्वशक्तिमान भी। मगर फिर उनके साक्षात्‌ दर्शन? यहां पर तर्क, व्याख्या, धर्म बेवजह कूद पड़ते हैं। इनसे परे होकर कल्पना करें तो जो दिखाई नहीं देता, उसकी कर्म व क्रिया, उसके अस्तित्व की पहचान व अहसास कराते हैं। अर्थात यहां सृष्टि की रचना प्रक्रिया में हम ईश्वर को देख सकते हैं। अब कल्पना करें तो पायेंगे कि सृष्टि की रचनात्मकता अपने आप में सबसे खूबसूरत है। सुंदरम्‌। यह प्रक्रिया परिवर्तनशील नहीं। यह क्रिया अपने आप में, संपूर्णता में नहीं बदल रही। सतत जारी है। निरंतर। यहां पत्थर, पेड़, नदी, तालाब, आदमी, औरत, तारमंडल, ब्रह्मांड यह सब तो सृष्टि की भिन्न-भिन्न रचनाएं मात्र हैं। लेकिन इन सबके उत्पन्न होने की, प्रकट होने की, रचनात्मक प्रक्रिया एक ही है। जिस तरह से साहित्य में कई तरह के उपन्यास, कहानी, कविताओं की रचना होती रहती है और हर एक पाठक की अपनी पसंद होती है, ठीक इसी तरह से प्रकृति की हर एक रचना भी अलग-अलग व्यक्ति को अलग-अलग ढंग से मोहित करती है। ये रचनात्मकता, साहित्य में इसे लेखन कहेंगे, अपने आप में अनोखी, विशिष्ट और अद्भुत है। हर रचना के पीछे सृजन की शक्ति है। यह रचनात्मकता ही असल में सबसे खूबसूरत है। साहित्य में रचे गए एक-एक शब्द गहरे और अर्थवान बन जाते हैं मगर इनको ऊर्जा लेखन से ही मिलती है। अक्षर शब्दों के माध्यम से नई रचना को जन्म देते हैं और ये शब्द ही सौंदर्य के साथ-साथ क्रांति का बीज भी बन जाते हैं।
रचना तो कई हो सकती हैं। लेकिन इनमें निहित रचनात्मकता समरूप है, एक ही होती है। ये रचनाएं, अंतिम प्रोडक्ट, समय के पदचिह्नों पर धूमिल हो सकती हैं। जबकि रचनात्मकता कभी पुरानी नहीं होती। रचनाएं पसंद-नापसंद की जा सकती हैं, नये के आते ही पुराने का विस्थापन होता रहता है, मगर रचनात्मकता पर कोई बहस नहीं की जा सकती। आरोप नहीं प्रत्यारोपित किया जा सकता। रचनाएं परिवर्तनशील हो सकती हैं। ये स्थायी नहीं। कोई दो रचनाएं कभी एक समान कदापि नहीं हो सकती। लेकिन रचनात्मकता के अंदर निरंतरता और परिवर्तनशीलता उसका अपना गुण है। स्वभाव है। मिजाज है। अवयव है। मगर स्वयं में ये स्थिर है। इसी रचनात्मकता को ईश्वर का नाम दिया जा सकता है। सृष्टि तो एक रचना मात्र है, लेकिन सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया, रचनात्मकता का एक उदाहरण मात्र, बेहद अनोखी प्रक्रिया है। जो न जाने कब से जारी है। हर पल, हर क्षण, ब्रह्मांड में हर जगह, निरंतर अपनी गति से चल रही है। अनंतकाल से अनंत तक। शून्य में भी पदार्थ में भी।
अगर आपको ईश्वर के सचमुच दर्शन करने हों तो सृष्टि नहीं, सृष्टि के निर्माण प्रक्रिया को देखिए। उसके रचनाधर्म के अंदर झांकिए। बीज से पौधा व पौधे को पेड़ बनता हुआ देखिए। एक बच्चे के जन्म की प्रक्रिया को देखिए। इंसान को मत देखिए, इंसान के बचपन से जवान और जवान से प्रौढ़ होते हुए संपूर्ण जीवन-चक्र को देखिए। नन्ही-सी मासूम बालिका को, यौवन सुंदरी और मां जननी बनते देखिए। आपका सिर अपने आप ही आदर में झुक जाएगा। पेड़ों पर फल लगते हुए देखिए। कली से फूल बनते देखिए। अंडे से चूजे को निकलते हुए देखिए। फिर चाहे वो शेर का बच्चा हो या गाय का, कौवे का काला या कबूतर का गोरा, ये सब अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लेते हैं। भावुक मत होइये, मौत को करीब से देखिए। यह विनाश नहीं, मात्र एक प्रक्रिया है। सृष्टि की रचनात्मकता का एक अंग है। संभव हो तो किसी ग्रह को नष्ट होते देखिए। तारे को टूटते देखिए। ये डर के आगे अद्भुत लगेगा। अंतरिक्ष की ये फुलझड़ियां, आपको सतत निहारने के लिए मजबूर कर देंगी।
इस रचनात्मकता की खूबसूरती को हम अपने भीतर ही नहीं, आसपास भी देख सकते हैं। मां, बहन, पत्नी और कहीं-कहीं कुछ एक पिता या दोस्त, जो भोजन बनाने में दिलचस्पी रखते हैं, उनसे किसी व्यंजन बनाने के बाद होने वाली संतुष्टि के बारे में पूछिये? कुम्हार जब कच्ची मिट्टी से बर्तन बनाता है, फिर चाहे वो आकार में सुंदर और मजबूत हो न हो, मगर उसके चेहरे के संतोष को देखा जा सकता है। बढ़ई के फर्नीचर बनाने पर, उसके अंदर छिपी रचनात्मकता को समझा जा सकता है। पंछी का घोंसला बनाना। छोटी-छोटी चींटियों को सदैव काम में भागते देखना। मधु से भरा हुआ मधुमक्खी के छत्ते को बनते हुए देखिए। हर एक जगह रचनात्मकता में कलात्मकता की एक अनूठी कहानी है। जंगल की शांत लेकिन ऊबड-खाबड़ पगडंडियों में घूम जाइए, कहीं न कहीं, कुछ न कुछ विशिष्ट स्वरूप में सृजन होते जरूर मिल जाएगा। नदी पर पुल बनाते इंजीनियर से लेकर मजदूर से पूछिए, पुल बनने पर कैसा लगता है? अपने लिये एक सुंदर घर बनाने के जुनून के बारे में आम आदमी से पूछिए। एक कविता के जन्म की प्रक्रिया के दौरान उत्पन्न कवि की भावनाओं को स्वयं कवि शब्दों में बयान नहीं कर सकता। कागज के टुकड़े पर, चंद शब्दों के साथ खेलते हुए, काटा-पीटी करना, शब्दों को जोड़ना, काटना फिर लिखना, साहित्य सृजन के अंदर छिपी महान रचनात्मकता का अंश है। मजा यात्रा में है मंजिल पर पहुंचने में नहीं। राहगीर से राह का वर्णन करवाइए, पड़ाव का नहीं। प्रेमी को जो आनंद प्रेम करने के दौरान प्राप्त होता है वो शायद कहीं और नहीं। यहां आनंद प्रेम करने में है, प्रेमी-प्रेमिका में नहीं। संगीतकार से पूछिए, एक गीत की फाइनल रिकार्डिंग के बाद कैसा लगता है? गायन के दौरान गायक-गायिका के चेहरे पर उभरते अलौकिक सौंदर्य को देखिए। फिल्म निर्माण के अनुभव फिल्म निर्देशक से पूछिए। सिर्फ मुस्कुराएंगे, कुछ कह नहीं पाएंगे। यह सब हम जाने-अनजाने रोज ही देखते-करते हैं। मगर कभी रुककर गौर नहीं करते। अगर आपको सत्यम्‌ शिवम्‌ में सौंदर्य के दर्शन करने हों तो इस रचनात्मक प्रक्रिया को एक बार ध्यान से देखिएगा, कण-कण में ईश्वर नजर आएंगे।
ईश्वर को इस रचनात्मकता का ही दूसरा नाम कहा जा सकता है। यह निराकार है। इसे हम अपने रूप-स्वरूप में, अपनी-अपनी समझ से, अपना-अपना नाम और चेहरा दे सकते हैं। मगर इसको परिभाषित करते ही हम इसे सीमित कर देते हैं। इसकी असली पहचान खत्म हो जाती है। क्योंकि ईश्वर स्वयं में कोई एक रचना नहीं, रचनात्मकता है। वो स्वयं में सृजित भी है सृजन भी सृजनात्मकता भी। वह सतत है। इस निरंतर सृजन की अनंत शक्ति में अनुपम सौंदर्य है। यह अंतिम और प्रथम सत्य है। और इसीलिए शिवम्‌ भी। जो अपनी इसी क्रियाशीलता के साथ हर जगह उपलब्ध है। हर समय उपस्थित है। यह समय के साथ नहीं चलते। समय इनके साथ चलता है और अस्तित्व में आता है। हम, मनुष्य, इसी सृजनता का अपने अंदर छोटा-सा अंश लिये, उस सर्वशक्तिमान से, हर क्षण जुड़े रहते हैं। और इस तरह से हम स्वयं में, परमात्मा की रचना (आत्मा) के रूप में, इस सृष्टि में विद्यमान हैं।
मनोज सिंह

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Feb 20 2010

हॉलीवुड की चिंताएं

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बद अच्छा बदनाम बुरा वाली लोकप्रिय कहावत हॉलीवुड पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। नग्नता, खुला सेक्स, भ्रष्ट संस्कृति कुछ इसी तरह की बातें हॉलीवुड के नायक-नायिकाओं के संदर्भ में आम हिन्दुस्तानी द्वारा बोली जाती हैं। जबकि हमारे खुद के बॉलीवुड में रूमाल से छोटे आकार के वस्त्र होते जा रहे हैं और चुंबन दृश्य की लंबाई और संख्या पर हीरो-हीरोइन की सफलता की तकदीर लिख दी जाती है। फिर चाहे हीरोइन आम लड़कियों से भी साधारण हो सपनों की राजकुमारी बना दी जाती है और नायक व्यक्तित्व व एक्टिंग प्रतिभा दोनों से ही जीरो क्यों न हों, हीरो बना दिया जाता है। कई बार, अब तो, सेक्स परोसने में बॉलीवुड हॉलीवुड को पछाड़ता महसूस होता है। एक तरफ जहां पश्चिम का प्रेम-प्रदर्शन सहज और स्वाभाविक लगता है, हमारा जबरदस्ती ठूंसा हुआ दिखता है। फिर भी वो बदनाम हैं और हम आत्मप्रशंसा में चूर। घूंघट हटाकर नारी के आत्मनिर्भर होने व आत्मसम्मान की बात करने तक तो ठीक है मगर हम, शरीर उघाड़कर व उभारकर अपनी संस्कृति के सौंदर्य को बेशर्मी से पीछे छोड़कर, अश्लीलता को स्वतंत्रता के नाम पर गली-गली लुभाते व बेचते देखे जा सकते हैं। वैसे तो हॉलीवुड में भी कई कमियां हैं। राजनीति की व्यावसायिक शिक्षा और नेटवर्किंग की कलात्मकता से सफलता की कुंजी वहीं से प्रारंभ हुई है। दूसरों की गरीबी पर हंसते-हंसते करोड़ों-अरबों कमा ले जाना, हॉलीवुड वालों का ही काम हो सकता है। यही क्यों, ऑस्कर में जमकर धूम मचाने के लिए फिर मखमली रेड कार्पेट पर हौले-हौले इतराकर चलो। मीडिया में जबरन सामाजिक प्रतिबद्धता और मानवीय सरोकार दिखाओ, साथ ही मुफ्त में संवेदनशील सभ्य-सुसंस्कृत मनुष्य कहलाने का गौरव प्राप्त करो।
जो सफल और नामी होते हैं, उनमें कुछ न कुछ तो असाधारण अवश्य होता है। इसे हम कई बार कई कारणों से सही-सही देख नहीं पाते। हम यह भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी को विश्वपटल पर नयी पीढ़ी के सामने एक नये रूप में पुनर्जीवित हॉलीवुड ने ही किया था। हॉलीवुड की फिल्म तकनीकी, संजीदा प्रदर्शन, मजबूत कथानक व डायरेक्शन की सूझबूझ को स्वीकार न करके हम अपनी हीन-भावना का प्रदर्शन करते हैं। वे यकीनन श्रेष्ठ विशेषज्ञों से भरे पड़े हैं। धर्म की स्वतंत्र आलोचना या व्याख्या हो, युद्ध की भीषणता का सजीव चित्रण, हास्य-व्यंग्य, प्रेम, ट्रेजडी, स्टंट सभी क्षेत्रों में उन्होंने बेहतरीन फिल्में दी हैं। एक और प्रमुख बात जो उन्हें हम सबसे आगे रखती है, वो है उनकी कल्पना शक्ति, एक नये तरह की मौलिक सोच और भविष्य के मानव की नयी-नयी योजनाएं। अंतरिक्ष में उनका कोई मुकाबला नहीं। पुरानी पीढ़ी ‘स्टार वार्स’ को भूल नहीं सकती। आज अमेरिका में विज्ञान संबंधित फंतासी को लेकर सबसे अधिक फिल्में बनती हैं। और विगत कुछ वर्षों में इन्हें देखकर तो ऐसा अहसास होता है कि वो इस क्षेत्र में सतर्क, सजग व सक्रिय होने के साथ-साथ बेहद सफल भी हैं।
सन्‌ 2004 में डायरेक्टर रोलेन्ड की एक फिल्म आई थी ‘द डे ऑफ्टर टुमारो’। इसमें हमारे ही कारणों से पर्यावरण में हुए असंतुलन के द्वारा होने वाले असामान्य परिवर्तन की कल्पना की गई थी। इसे मौसम की तुनक-मिजाजी कह सकते हैं। साथ ही, परिणामस्वरूप भविष्य की भयावहता भी दिखाई गई थी। एक नये अप्रत्याशित हिमयुग का आगमन। सब कुछ भीषण ठंड में जमने लगता है। ऐसे में हीरो पिता द्वारा पुत्र को बचाने का प्रयास। यह व्यावसायिक रूप से भी एक सफल फिल्म थी। उसी डायरेक्टर के द्वारा एक नयी फिल्म आई है, ÷2012′। यहां भी हमारे द्वारा प्रकृति के दोहन के कारण उत्पन्न होने वाली समस्या को बड़े नाटकीय अंदाज से ही सही, मगर बखूबी दिखाया गया है। यहां ग्लोबल वार्मिंग के द्वारा जलस्तर के बढ़ने की कल्पना है। फिल्म में, अंत में, सकारात्मक दृष्टि के साथ विज्ञान की मदद से मानवीय सभ्यता को बचाने की सफल कोशिश की गई। इसमें संदेश है। इसकी कल्पना न चाहकर भी वास्तविकता के करीब लगती है। कहानी के अंदर कहीं न कहीं एक विचारधारा छिपी है। कहीं वर्तमान व्यवस्था का विरोध है तो उसी विज्ञान के द्वारा विनाशकारी प्रकृति से अपने अस्तित्व को बचाने की एक काल्पनिक कोशिश भी है। इसमें मानवीय संवेदना का पुट है। सामाजिकता है। नायक-नायिका और उनका परिवार है। उनके बीच आलोकिक प्रेम है। राजनीति है, उसका बुरा पक्ष है तो अच्छे और समाज के लिए समर्पित नेतृत्व भी है। लोभी और बदमाश लोग हैं तो संवेदनशील मनुष्य भी हैं। एक रईस की बाजार शक्ति है तो गरीब के संघर्ष की अंत में जीत भी। कुल मिलाकर सब कुछ है। एक पागल के द्वारा चिंतन है, व्यंग्य है, शाश्वत सत्य का प्रदर्शन है। वह हंसते-हंसते रूला देता है और रोते-रोते हंसा देता है। इन सबके साथ अगर कुछ है तो वो है उत्कृष्ट फोटोग्राफी और एक नयी सोच। समाज व सभ्यता के िलए चिंता जो चिंतन बनकर उभरती है। ये दुर्भाग्यवश हिन्दी फिल्मों में दिखाई नहीं देती।
वर्ष 2007 में एक और अंग्रेजी फिल्म आई थी ‘आई एम लिजेंड’। रिचर्ड मैथेसन की उपन्यास पर आधारित इस फिल्म को फ्रांसिस लॉरेन्स ने डायरेक्ट व स्मिथ ने एक्ट किया है। यह एक विज्ञान की कल्पना में हॉरर-एक्शन-डिसास्टर फिल्म है। किस तरह से एक वैज्ञानिक खोज की प्रक्रिया के दौरान पूरी मानवीय सभ्यता अचानक खतरे में पड़ जाती है। सारे जीवित मनुष्यों पर इस नये विशिष्ट जीवाणु का आक्रमण हो जाता है और वे एक अजीब जंगली जानवर में परिवर्तित हो जाते हैं। फिल्म का हीरो अपने कुत्ते के साथ किस तरह से मानवीय सभ्यता को बचाने के लिए कोशिश करता है। फिल्म की कहानी अद्भुत है। एकदम नयी कथावस्तु, एक नया विषय, एक नयी तरह की फिल्म। एक अकेला नायक, सिर्फ एक कुत्ते के साथ मिलकर, लाखों-करोड़ों दर्शकों को, लेखक-डायरेक्टर और फोटोग्राफर की मदद से, किस तरह दो से ढाई घंटे बांधकर रख सकता है, इसका यह एक सजीव उदाहरण है। कोई सेक्स नहीं, कोई मसाला नहीं। कोई बेवजह प्रचार के हथकंडे नहीं। यूं तो फिल्म के अंत में, नायक अपने मकसद में सफल होता है, लेकिन सफल होने से पूर्व वह मानवीय सभ्यता को बचाने के लिए राक्षसों से लड़ता है, और अपनी जान तक दे देता है। यहां जानवरों के प्रति प्रेम है तो परिवार के प्रति समर्पण भी। इन सब उदाहरणों को देखकर यहां एक प्रश्न अनायास ही उभरता है कि न जाने क्यों, हम बेवजह अपनी संस्कृति की महानता का प्रदर्शन करते घूमते हैं और उनकी सामाजिक सांस्कृतिक व सभ्यता के प्रति प्रतिबद्धता तथा मानवता पर प्रश्नचचिह्न लगाते रहते हैं? जबकि उनकी फिल्मों में भी वहां के घर-परिवार व व्यक्तिगत संवेदनाएं अपनी विशिष्ट रूप में विद्यमान दिखाई देती हैं।
विज्ञान की कल्पनाएं, एक नये दर्शन के रूप में, तरह-तरह की विचारधाराओं के साथ, वहां अपने चरम पर है। इस तरह का नयापन हिन्दी फिल्मों से बिल्कुल नदारद है। यह कहना उचित न होगा कि हिन्दी का पाठकवर्ग व दर्शक इसके लिए तैयार नहीं। वरना ये फिल्में आज हिन्दुस्तान में सफलता के परचम नहीं लहराती। इन्हें देखकर कौन कह सकता है कि उनके पास हमसे बेहतर कुछ नहीं? बल्कि वर्तमान में, वे हर मामले में हमसे आगे दिखाई देते हैं और मानवीय सभ्यता को बचाने व संस्कृति को गतिशील बनाए रखने में हमसे अधिक जागरूक। आज फिल्मों में, प्रकृति का दोहन, आवश्यकता से अधिक उपयोग और उपभोग करना, प्राकृतिक/सामाजिक/राजनैतिक असंतुलन, हमारी व्यवस्थाएं, अन्य जीव-जंतुओं के प्रति हमारी गलत नीति, उसका जितना अच्छा चित्रण हॉलीवुड में होता है वो बॉलीवुड में संभव नहीं। कहने वाले कह सकते हैं कि समाज और प्रकृति को प्रदूषित करने के लिए यही लोग ज्यादा जवाबदेह भी हैं और इस तरह का प्रदर्शन बनावटी आंसू की तरह है। यह बहुत हद तक सच हो सकता है लेकिन वे कम से कम कोशिश में तो लगे हैं। उलटा हम अपने दर्शकों को अपनी फिल्मों के माध्यम से उनकी जीवनशैली में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। मगर उनकी तरह मौलिक सोच को निष्क्रिय करके। वो अगर कचरा पैदा करते हैं तो साथ ही उत्कृष्टता भी। और हम मात्र नकल करके रह जाते हैं। यहां तक कि हमारी नकल में भी नाटकीयता लगती है। इसमें कोई शक नहीं कि हमारे पास विरासत में एक समृद्ध साहित्य और लंबा इतिहास है। कला के क्षेत्र में क्लासिक्स की हमारे पास कमी नहीं। मगर दुःख इस बात का अधिक होता है कि वह हमारा ही पढ़कर कुछ नया पैदा कर देते है। अँग्रेज़ी फिल्म ‘अवतार’ इस बात का सबूत है जो हिन्दुस्तान में भी धूम मचा चुकी है। खर्च के साथ-साथ कमाने में भी इसने सारे पुराने रिकार्ड को ध्वस्त किया है। और इसके लिए उन्हें किसी विवाद को हवा देने की जरूरत नहीं पड़ी या नायक को घूम-घूमकर गली-गली डंका नहीं बजाना पड़ा। काम अपने आप बोलता है। वो मल्टीप्लेक्स के माध्यम से प्रारंभ के मात्र तीन दिनों में कमाई करने के लिए नहीं आते। इन फिल्मों को कभी भी देखा जा सकता है। और देखते ही दावे से कहा जा सकता है कि हां, वो आज की तारीख में हमसे अधिक कल्पनाशील हैं, मेहनत कर रहे हैं, मौलिक सृजन के लिए प्रयासरत रहते हुए निरंतर अध्ययनरत व चिंतन करते हैं। वो विश्व चिंता को अपने अंदर समेट लेते हैं। उनके संदर्भ हम सब से जुड़ जाते हैं। ऐसे में वो क्यों नहीं विश्व शक्ति व राजनीति के केंद्र में रहेंगे? उपरोक्त कुछ एक शब्द इस प्रश्न का छोटा-सा मगर सटीक जवाब है।
मनोज सिंह

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Feb 13 2010

और वो चुपचाप चले गए

Published by Singh Manoj under Weekly Article

पिछला शनिवार अनमना-सा बीता। खालीपन का अहसास हुआ था। मंजिल न हो तो रास्तों पर भटकना कहा जाता है। यूं ही सड़कों पर समय बर्बाद करने का मन न किया तो घर वापस लौट आया था। और फिर दिनभर उदास रहा। वरना पूर्व में सुबह-सुबह सबसे पहले किताबों-पत्रिकाओं की दुकानों में पत्र-पत्रिकाओं को उलट-पलट कर देखना और किसी मन-पसंद पुस्तक की तलाश करना। नये विषय की रचना मिल जाने पर भी पत्रिका/किताब अक्सर खरीद लेता और फिर सीधे डॉ. संसार चंद्र के घर के लिए निकल पड़ता। घंटे से दो घंटे का समय अमूमन उनके साथ बिताया करता था। और दोपहर तक घर वापसी। भोजन के समय तक तो पहुंच ही जाता। मगर इस शनिवार उनके घर नहीं गया था। जा कर क्या करता? चूंकि वो तो वहां अब थे नहीं। सदैव के लिए कहीं जा चुके थे। कभी न लौटने के लिए।
डॉ. संसार चंद्र लगभग 94 वर्ष के हो रहे थे। पूरे हिन्दुस्तान के संदर्भ में दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता मगर उत्तर भारत के जीवित साहित्यकारों में शायद सर्वाधिक वयोवृद्ध थे। मूलतः व्यंग्यकार। मगर उनकी रचनाओं को आम व्यंग्य नहीं कहा जा सकता, भाषाविद् जो थे। हिन्दी, पंजाबी, अंग्रेजी, उर्दू, डोगरी के साथ-साथ संस्कृत के महान विद्वान। ऐसे में भाषा का गंभीर होना तो स्वाभाविक है ही। वैसे भी उस युग में हल्केपन की संभावना कम ही होती थी। मगर इसका मतलब यह कदापि नहीं कि रचना क्लिष्ट हो जाए। सरलता व सहजता उनके सृजन का सौंदर्य होता। और फिर वो ठहरे पुराने जमाने के अपने इलाके के सर्वाधिक संपन्न व शिक्षित परिवार से। तब संस्कार परिवार ही नहीं समाज की भी धरोहर हुआ करती थी। इतना लंबा जीवन भी उन्होंने यूं ही नहीं काट दिया, निरंतर रचनाधर्म में लीन रहे। यह उनके जीवन की औषधि थी। रचनाकार भी ऐसे कि दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित। कई पुरस्कार/सम्मानों से अलंकृत तो हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद स्वयं ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्रदान करने के लिए उनके पास आया। पेशे से वैसे तो शिक्षाविद् मगर सेवानिवृत्ति के बाद ज्योतिष के रूप में अधिक लोकप्रिय। अम्बाला, चंडीगढ़ और जम्मू विश्वविद्यालय में जब तक प्रोफेसरी की तो दसियों पी.एचडी. व डी.लिट. रिसर्च स्कॉलर समाज को दिए और ज्योतिषी इतनी सफल की तीस वर्ष लगातार एक प्रतिष्ठित अखबार में भविष्यवाणी का दैनिक व साप्ताहिक कॉलम लिखा। बरसात, गर्मी और ठंड के आने में देर-सवेर हो सकती है लेकिन उनका लिखा कॉलम अखबार के दफ्तर में निर्धारित समय पर पहुंच जाता था। अंतिम दिनों तक।
विशालकोठी के प्रांगण में मुख्यद्वार के ठीक आगे साफ-सुथरी खुली-सी जगह, उसके साथ ही लगा सामने एक अच्छा-खासा बड़ा कमरा। इसी में बरसों से रोज सुबह दस से सायं पांच बजे तक यह शख्स पूरी ऊर्जा के साथ तैयार होकर नियमित बैठता और अध्ययनरत रहता। कमरे में चारों ओर तरतीब से रखी सैकड़ों दुर्लभ पुस्तकें। और बीच में उनकी टेबल और बैठने के लिए साधारण कुर्सी। बगल में टेलीफोन। आसपास कागज, पेन, स्टेपलर, रबड़-पेंसिल, स्केल, पंचांग, ढेर सारी पत्रिकाएं और कॉल बेल। पीछे की लकड़ी की रैक में सजी हुई ट्रॉफी, शील्ड और फ्रेम किए हुए प्रशस्तिपत्र। सामने आगंतुक के लिए छह कुर्सियां। लोगों का आना-जाना दिनभर लगा रहता। अधिकांश इसमें दुखी और भविष्य को लेकर चिंतित होते। कुछ बनने की चाहत में तो कई अपनी पदोन्नति को लेकर परेशान, माता-पिता अक्सर अपने बेटे-बेटियों की शादी व पारिवारिक कलह के निराकरण के लिए आते। दुनिया में दुःख की कोई कमी नहीं और चाहत की कोई सीमा नहीं। शायद यही कारण है कि पूछने वालों का तांता लगा रहता। सभी को ग्रह-नक्षत्र व जन्म के समय, तिथि, स्थान के आधार पर उचित राय दी जाती और बचाव में धार्मिक कर्मकांड का रास्ता भी बताया जाता। आने वालों में मंत्री और कई सेठ भी होते। इस कार्य में मिलने वाले पैसे को गुरु-दक्षिणा भी कहा जा सकता है। और इसी से उनका दैनिक खर्चा चलता। इस बात का जिक्र वो अक्सर किया करते थे कि उन्हें पेंशन नहीं मिलती है। और उनके मतानुसार ज्योतिषी से ही उनका जीवनयापन चल रहा था। दुःख से कहते कि लेखन के द्वारा एक परिवार का पालन-पोषण संभव नहीं। उनसे मिलने के लिए आने वालों में लेखक कम ही होते। और जो आते भी वो व्यक्तिगत भावनाओं व संबंधों की खातिर या ज्योतिषी पूछताछ के उद्देश्य से। बहरहाल, न जाने क्यों, उन्हें रचनाकारों का इंतजार रहता और किसी साहित्यकार के आने पर उनकी आंखों में चमक देखी जा सकती थी। बातचीत का उत्साह तो फिर दोगुना हो ही जाता। याददाश्त इतनी जबरदस्त कि हर संदर्भ पर संस्कृत का श्लोक और किसी भी मुद्दे पर मन के चंचल होने पर शायरियों की बौछार कर देते। सुनकर मैं अचंभित, प्रभावित और साथ ही उत्साहित भी होता।
पिछले तीन वर्षों में, जब से चंडीगढ़ आया हूं, उनके साथ धीरे-धीरे कैसे संबंध आगे बढ़ते चले गए, पता ही नहीं चला, याद भी नहीं, मगर तकरीबन हर शनिवार दोपहर की मुलाकात का सिलसिला दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका था। एक कप चाय, गर्मी में कभी-कभी नीबू-पानी और साथ में नमकीन। कोई न कोई मिठाई भी अक्सर होती। जो उनके चाहने वाले उन्हें भेंटस्वरूप दे जाते। उन्हें याद रहता था तभी तो मेरे पहुंचते ही किसी विशेष मिठाई की उपलब्धता होने पर उसे जरूर मंगवाते। वो यह जानते थे कि मीठा मेरी कमजोरी है। और फिर पारिवारिक नौकर उसे प्रेमपूर्वक परोस जाता। शूगर की बीमारी के बाद भी वो अति उत्साह में कभी-कभी स्वयं भी ग्रहण करते। मैं उनकी उम्र से आधे से भी कम का था। लेकिन चर्चा के दौरान किसी मुद्दे पर कब नोकझोंक बहस में परिवर्तित होकर तेज हो जाती, पता ही नहीं चलता। और ये रिश्ता बिना किसी परिभाषा के मजबूत होता चला गया। राजनीति की वर्तमान अवस्था पर उन्हें बेहद तकलीफ होती। उधर, साहित्यकारों की राजनीति पर उन्हें क्रोध आता। और इन बातों पर उनका आक्रोश खुलकर प्रकट होता। इस उम्र में भी वह एक अच्छे पाठक सिद्ध होते और रचनाओं को गंभीरता से पढ़ते। वो इस बारे में ईमानदार भी थे और बिना पढ़े किसी भी टिप्पणी से बचते। मेरी एक-दो रचनाएं ही उन्होंने पढ़ी थीं जो उन्हें बेहद पसंद आई थीं शायद तभी वह मेरे हर कार्यक्रम में अवश्य आते।
बुजुर्गों के पास ज्ञान व अनुभव का भंडार होता है। साथ ही वह अध्यापक के साथ चिंतक भी हो तो आपका सर्वश्रेष्ठ पथ-प्रदर्शक बन सकता है। वह एक खुली किताब ही नहीं जीवनशास्त्र बन जाता है। जीवन के उतार-चढ़ाव व्यक्ति-समाज-राष्ट्र को समग्र रूप से परिभाषित करवाते हैं। जब तक सांस है जीवन एक संघर्ष है। किसी भी वृद्ध को देखकर यह सत्य समझ तो आता है मगर कड़वा होने के कारण निगला नहीं जाता। और युवा अवस्था इसे नजरअंदाज करने की कोशिश करता है। एक बार दोपहर उनके घर पहुंचा तो हमेशा की तरह कुछ लिख रहे थे मगर चेहरे पर थोड़ी चिंता दिखाई दी। पूछा तो पता चला कि तबीयत खराब है और डाक्टर के पास जाना है। घर में नौकर नहीं था। मैंने साथ चलने के लिए कहा तो वो तुरंत खड़े हुए थे। देखा तो उनके पायजामे में खून के दाग थे। शायद मूत्र के साथ रक्त निकल रहा था। उसी अवस्था में इतनी उम्र में भी, खुद चलकर गाड़ी तक गए और फिर डाक्टर से मिलकर पूरी जानकारी दी। इलाज करवाकर बडे+ आत्मविश्वास के साथ वापस घर आए थे। देखकर कई दिनों तक मैं हैरान रहा था। अंत में यही समझ आया था कि विपरीत परिस्थितियों मे भी, फिर चाहे वो किसी भी प्रकार की हों, जूझना और अस्तित्व के लिए लड़ना ही जीवन है। बस छोटा-सा संदेश मिला था। छोटे से जीवन के लिए इतना ही ज्ञान काफी है। चंडीगढ़ ही नहीं देश के बड़े शहरों की कई विशाल कोठियों में अकेले बूढ़ों या वृद्ध दंपतियों को रहते देखा जा सकता है। कारण चाहे जो भी हो, यहां वो संदर्भ नहीं, मगर आधुनिक जीवन की नियति देखकर दुःख, आश्चर्य, वैराग्य तो कभी आक्रोश उत्पन्न होता है। यह हमारी नयी सामाजिक व्यवस्था का प्रतिफल है। परिवर्तन समाज ही नहीं सृष्टि की नियति है लेकिन उनके दुष्परिणामों का यथाउचित निराकरण भी समाज की जिम्मेवारी है जो आधुनिक काल भूल बैठा। यह इस युग की सबसे बड़ी त्रासदी है। इन सबके साथ भी जीना तो है ही, और अगर उसे एक चुनौती के रूप में लिया जाये तो? प्रभाव डालता है। उनकी आवाज में इतनी खनक थी कि अच्छे-अच्छे जवान-पहलवान चित्त हो जाएं। जिसने अपनी जवानी में ही अपनी आंखों के सामने अपने घर-परिवार को बर्बाद होते देखा हो, मां-पिता-बहन को खो दिया हो, वो मजबूत तो हो ही जाएगा। वो अपनी पत्नी और दो साल के एक बेटे के साथ रातों-रात किसी तरह बंटवारे के दौरान भागकर हिन्दुस्तान आए थे। उनके मुख से विस्तारपूर्वक उनकी युवावस्था की यह कहानी मैंने कई बार सुनी थी और जाने-अनजाने ही उस दौर की राजनीति, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं से ही नहीं पूरे एक काल से जुड़ गया था। संघर्ष सिर्फ बुजुर्ग नहीं युवा भी करते हैं। और जो निरंतर आगे बढ़ना जानते हैं वो हर मोड़ पर सफल होते हैं। कालांतर में उनका मूल नगर मीरपुर (वर्तमान में पाक अधिकृत क्षेत्र में) अब एक बांध में डूब चुका है। इसका दुःख उनकी आंखों में तैरता रहता था। अपनी मातृभूमि से इतना लगाव! आश्चर्य होता है। अब उस दौर का एक जीवन ही नहीं एक संपूर्ण काल इतिहास के पन्नो में समा गया।
उनमें अंत तक बहुत कुछ करने की चाह थी। दर्जनों पुरस्कारों के बाद भी ख्वाहिशें थीं। लोग पीठ पीछे बातें बनाते। मगर यह भूल जाते कि जिंदा रहने के लिए जीवन के अवयव जरूरी हैं। उनकी एक बात के पीछे छिपा दर्द मैंने कई बार पाया था। कहा करते थे कि मुझे दुःख है कि मेरे जीते जी मेरी किताबें समाप्त हो रही हैं, रचनाएं विलुप्त हो रही हैं। मैं उन्हें समझाने की कोशिश करता कि शायद यही जीवन का चक्र है। लेकिन उनकी आंखों के शून्य में खुद खो जाता। हर घर में बुजुर्ग होंगे और उपरोक्त दृश्य या उससे थोड़ा हटकर, कुछ न कुछ सभी के साथ होगा। कहानी अलग-अलग हो सकती है मगर मूल में आत्मा एक ही होगी। आज मैं डॉ. संसार चंद्र को, सिर्फ शनिवार ही नहीं, हर पल महसूस कर सकता हूं। उसी तरह से आप भी अपनो को याद करते होंगे। आज मुझे इस बात का सुकून है कि मैंने उनके साथ एक लंबा समय बिताया। कम से कम तब जब उन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्यकता थी। आप भी अपने बुजुर्गों के साथ, यथासंभव समय बिताएं, वरना कब ये चुपचाप चले जाएंगे, पता ही नहीं चलेगा।
मनोज सिंह

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