Himachal View theme

Apr 07 2012

नैतिकता का अवमूल्यन

Published by Singh Manoj under Weekly Article

एक विज्ञापन को देखा तो पहले पहल तो चौंका फिर हैरानी हुई, और फिर बहुत देर तक सोचने के लिए मजबूर हुआ था। एक व्यक्ति समय से पूर्व अपने घर अचानक वापस आता है तो पति को देख गृहिणी घबरा जाती है। भूले हुए सामान को लेने के लिए वही व्यक्ति जब अपनी अलमारी खोलता है तो अंदर किसी अनजान युवा को छिपा हुआ पाता है। पीछे गृहिणी भयभीत है और गलती पकड़े जाने का डर चेहरे पर साफ-साफ दिखाई पड़ रहा है। उस व्यक्ति का एक मिनट के लिए भौचक्का हो जाना स्वाभाविक है। इसी बीच वह छिपा हुआ युवा उपभोग के किसी सामान की विशेषता के बारे में बताना शुरू करता है। और उसकी खूबियों को दिखाते-समझाते वह यह बताना नहीं भूलता कि मैं उस महिला के सामने अलमारी में छिपकर यही सिद्ध कर रहा था। और इस तरह बातों ही बातों में वह अपने सामान की दूसरी विशेषता बताते हुए उस घर के स्वामी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है और फिर धीरे से वहां से रफूचक्कर हो जाता है। घर का स्वामी अंत में उसकी बातों से पूरी तरह से सहमत होते हुए दिखाया गया है और यही नहीं उस सामान को खरीदने के लिए प्रेरित भी हो चुका है। उधर, गृहिणी का चेहरा अब सामान्य हो चुका है तो घर में घुस आया युवा जाते-जाते अपनी चतुराई साबित करने में सफल दिखाया गया है। एक और विज्ञापन आजकल बहुत प्रसारित किया जा रहा है जिसमें युवतियों को अपने प्रेम-प्रसंगों के बारे में चर्चा करते हुए फोन पर सुना जाता है। एक स्थान पर वह अपने प्रेमी को घर आने के लिए आमंत्रित कर रही है तो दूसरे दृश्य में वह अपने किसी वरिष्ठ के अनैतिक संबंधों के बारे में किसी के साथ बातचीत में व्यस्त है। इस दौरान पास में बैठा एक अति उत्साही युवक उसकी बातों को सुनने के लिए प्रयासरत दिखाया गया है। आजकल एक चित्र विभिन्न नेटवर्किंग साइटों और मीडिया में भिन्न-भिन्न रूप में आम दिखाया जाता है। जिसमें एक युवा जोड़े को गले मिलते हुए दिखाया गया है मगर वहीं युवती का हाथ युवक के पीछे खड़े एक और व्यक्ति के हाथ में है। इसी मानसिकता के कई और भी विज्ञापन मिल जायेंगे। यही नहीं, फिल्मी नायक-नायिकाओं के बीच विभिन्न स्तर के नैतिक-अनैतिक संबंधों को लेकर पहले मीडिया में उत्सुकता पैदा की जाती है और फिर उत्तेजना की हद तक उसे फैलाया जाता है। यह आज प्रचार-प्रसार का प्रमुख अस्त्र-शस्त्र बनता जा रहा है। और तो और, हास्य और व्यंग्य के अनगिनत कार्यक्रमों में भी हंसाने के लिए अब सिर्फ अनैतिक संबंधों, भौंडापन और अश्लील व निम्न स्तर की बातों का खुलकर प्रयोग होने लगा है।
यहां सवाल उठता है कि विज्ञापनों का प्रभाव क्या सिर्फ सामान या सेवा बेचने तक ही सीमित होता है? उपरोक्त बातों का उद्देश्य क्या सिर्फ मनोरंजन है? शायद नहीं। और अगर हो भी तो क्या उसे इतना स्तरहीन होना चाहिए? नहीं। चूंकि यहां हमें यह मानना होगा कि उपभोग के सामान बेचने के लिए भी एक कहानी बुनी जाती है। जिमसें से एक संदेश निकलता है। जिसको अच्छी-बुरी दृष्टि से पढ़ा-समझा जा सकता है। शब्दार्थ से लेकर भावार्थ तक विचारों की लंबी श्रृंखला होती है। यकीनन यह पाठक और दर्शक पर अपनी-अपनी तरह से असर डालते हैं। यह बनाने वाले की मानसिकता को तो दर्शाता ही है उसकी सोच को भी प्रदर्शित करता है। मगर जाने-अनजाने ही समाज की प्रवृत्तियों को भी बता जाता है। और उसे बढ़ावा भी देता है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से, विज्ञापन से समाज में खरीदारी की आदतें पड़ती हैं या फिर आम जनता की जरूरतों के हिसाब से विज्ञापन बनाये जाते हैं? यह एक तरह से प्रश्नों का कुचक्र है। जिसका सीधे-सीधे जवाब तो नहीं दिया जा सकता, मगर यह एक-दूसरे से पूरी तरह जुड़े हुए हैं, और एक-दूसरे के लिए प्रेरक का काम करते हैं, सीधे-सीधे तौर पर कहा जा सकता है।
बाजार में विज्ञापन एक आवश्यक माध्यम है लेकिन क्या सफलता के लिए इसका उपयोग किसी भी हद तक किया जाना चाहिए? फिल्मों को सफल बनाने के लिए क्या किसी भी स्तर तक खबरों में गिर जाना चाहिए? सवाल उठता है कि हंसने के लिए किसी का मजाक उड़ाना, नीचा दिखाना क्या आवश्यक है? अब तो कई नायक-नायिका सुर्खियों में रहने के लिए अपने संबंधों को खुद हवा देते हैं। इसे बीमार मानसिकता का नाम दिया जाना चाहिए। क्या यह एक किस्म का भौंडापन नहीं है? यहां सीधे-सीधे अनैतिकता है। ऐसा नहीं कि अच्छा रचनात्मक एवं सकारात्मक सृजन नहीं हो रहा मगर उपरोक्त किस्म की रचनाओं में अचानक वृद्धि हुई है। पहले भी इस तरह की निम्नता होती थी। मगर इस हद तक खुलकर नहीं। मनुष्य के अवगुण सदा साथ रहे हैं। मगर कभी समाज ने उसे सार्वजनिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया था। कम से कम इसे प्रचारित नहीं किया जाता था। प्रेम का मनुष्य के जीवन में जन्म-जन्मांतर से संबंध है। हमारे शास्त्र इसके बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं और कामशास्त्र की अपनी एक महत्ता रही है। मगर यही सेक्स जब विकृत और विचारहीन हो जाता है तो समाज को रोगग्रस्त करता है। यूं तो अनैतिक संबंध पहले भी हुआ करते थे मगर तब उसे समाज में छिपाया जाता था। उसकी सामाजिक स्वीकृति नहीं हुआ करती थी। बल्कि ऐसी प्रवृत्तियों को हतोत्साहित किया जाता था। घटिया और हल्का साहित्य पहले भी उपलब्ध होता था। लेकिन इसे छिपकर पढ़ा जाता था। मगर आज तो इसे विज्ञापित किया जा रहा है। स्त्री-पुरुष संबंध तो प्राकृतिक रूप से सर्वत्र एक समान ही है मगर प्रदर्शन के तरीके उसे अच्छे और बुरे में परिवर्तित कर देते हैं। नारी का सौंदर्य और प्रेम-रस पूर्व में भी था। उसके श्रृंगार का विस्तार से जितना वर्णन हिंदी साहित्य में हुआ है ऐसा कहीं और दिखाई नहीं देता। मगर जब इसे नग्नता में परिवर्तित कर दिया जाता है तो उसका प्रभाव प्रदूषित करता है। कला में अश्लीलता आते ही समय के पैमाने पर यह अस्तित्वहीन हो जाता है।
असल में मनुष्य तो मूल रूप से जानवर ही है। उसकी सदा इच्छा करती है कि वह हर दूसरी नारी के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करे। उसकी चाहतों का कोई अंत नहीं। उसके वहशीपन की कोई सीमा नहीं। मगर इसके अपने दुष्परिणाम हैं। समाज की स्थापना के मूल में मनुष्य के इन अवगुणों को नियंत्रित करना ही प्रमुख था। उसकी इच्छाओं और भावनाओं को नियमित एवं सीमित करना आवश्यक था। यहां अच्छे और बुरे को परिभाषित किया गया। समाज की स्थापना ही इसलिए हुई कि सब कुछ सबके लिए समान व व्यवस्थित किया जाये। ऐसे में फिर व्यवस्था के लिए नियम-कायदे-कानून तो होंगे ही। वे हर क्षेत्र में बनाये गये। चाहे वो फिर सामाजिक हों, राजनीतिक हो, निजी हों। ध्यान से देखें तो हर एक के पीछे कोई न कोई कारण साफ-साफ दिखाई देते हैं। यकीनन मनुष्य में अंदर की पशुता को रोकने एवं प्रबंधित करने के लिए ही नैतिकता की बात सामने आई होगी। सवाल उठता है कि क्या हम इस नैतिकता को पुनर्स्थापित और नये ढंग से परिभाषित करना चाहते हैं? अगर हां तो फिर समाज को उसके परिणामों के लिए भी तैयार रहना होगा। परिवार का विघटन, तलाक, हत्याएं, बलात्कार ऐसे कुछ उदाहरण यहां दिये जा सकते हैं जिसे हमें स्वीकार करना होगा। मगर सत्य तो यह है कि असमाजिकता व अराजकता के बढ़ते ग्राफ से हम सब चिंतित हैं।
मेरे मन में पश्चिमी संस्कृति के खुलेपन को लेकर एक जिज्ञासा जाग्रत हुई थी। जैसा हमारे यहां बतलाया जाता है, क्या यह सच है? जानने की इच्छा हुई थी। वहां पर रहने वाले मित्रों से पूछने पर पता चला कि वे भी अपने व्यक्तिगत रिश्तों के मामले में उतने ही सजग, सतर्क और संवेदनशील हैं। गहराई से पूछने पर पता चला कि विवाह पूर्व चाहे जितने संबंध रहे हों, जिस भी स्तर के हो, मगर विवाह में बंधने के बाद वे पूरी तरह से समर्पित जीवन साथी की अपेक्षा करते हैं। यही नहीं, ऐसा न होने पर तुरंत तलाक भी देने को तैयार हो जाते हैं। वे इस बिंदु पर अत्यंत क्रियाशील हैं। और धोखे को किसी भी रूप में स्वीकार नहीं करते। इन तथ्यों ने मुझे चौंकाया था और भारतीय समाज में पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण ने मुझे चिंतित किया था। असल में हम मानवीय मूल गुणों से भटक रहे हैं। रिश्तों में विश्वास दोनों पक्ष को चाहिए। यह दीगर बात है कि आदमी ही नहीं औरतों में भी बराबर से कमजोरी रही है। लेकिन सवाल उठता है कि हम उसी कमजोरी को दिखाकर क्या प्रदर्शित करना चाहते हैं? क्या उपरोक्त विज्ञापन इस बात के प्रमाण हैं कि हम उसमें निहित अर्थ को स्वीकार कर रहे हैं? या फिर, क्या हम यह कहना चाहते हैं कि ऐसा हमारे समाज में अब आम हो गया है? और कुछ हो न हो इस तरह के विज्ञापन आधुनिक महिला की गलत छवि को प्रदर्शित करते हैं। यहां चतुर-चालाक बदमाश व्यक्ति का आराम से खुशी-खुशी निकल जाना और घर के स्वामी को बेवकूफ बनते हुए दिखाकर हम पता नहीं क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या हम अपने समाज का यही चरित्र प्रस्तुत करना चाहते हैं?
मनोज सिंह

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Mar 31 2012

शब्दों का शोर

Published by Singh Manoj under Weekly Article

विभिन्न महत्वपूर्ण नौकरियों एवं उच्च शिक्षा की संस्थाओं में प्रवेश की चयन प्रक्रिया में सामूहिक बहस (ग्रुप डिसकशन) एक महत्वपूर्ण पायदान बनता चला जा रहा है। जिसमें एक सुनिश्चित संख्या के अभ्यर्थियों को एक बड़े व बंद कमरे में बिठा दिया जाता है और किसी एक विषय पर उन्हें बहस करनी होती है। परीक्षक/निरीक्षक दूर से बैठकर इन सारी गतिविधियों को ध्यान से देखते रहते हैं। इस बहस का समय सुनिश्चित होता है। चूंकि विषय अचानक दिया जाता है इसलिए आप पहले से इस पर तैयार नहीं हो सकते। यही कारण है जो आपके मस्तिष्क की, उस विषय पर पहली क्या प्रतिक्रिया होती है, उसे बखूबी सुना व देखा जा सकता है। आप किसी विषय पर कितना जानते हैं? जांचा जा सकता है। आपकी समझ को परखा जा सकता है। आपके कहे गये विचारों का विश्लेषण हो सकता है। बीच में समय नहीं होता इसी कारण से आप किसी और से मुद्दे पर पूछताछ भी नहीं कर सकते। यह विशुद्ध आपका अपना दृष्टिकोण होता है। यही नहीं, आप अपनी बात किस तरह रखते हैं, यहां यह भी महत्वपूर्ण होता है। विद्वानों की राय माने तो सिर्फ अपनी बात कहना ही नहीं दूसरों की बात सुनना भी उतना ही जरूरी होता है। अर्थात आप अन्य की कही गयी सही बातों का भी समर्थन करते हैं या नहीं? या सिर्फ अपनी ही चलाते हैं? और अगर गलत मत भी है तो विरोधी पक्ष की बातों को आप किस तरह से काटते हैं? दूसरों को अपनी बातों से किस तरह से प्रभावित करते हैं? अर्थात इस दौरान आपके तर्क-वितर्क की क्षमता का भी मूल्यांकन हो जाता है। यहां शालीनता से अपनी बात रखना अधिक प्रभावशाली माना जाता है। और कोई माने या न माने सामान्य शिष्टाचार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मगर अमूमन देखा गया है कि इस तरह की सामूहिक बहस एक शोर में परिवर्तित हो जाती है। जिसमें सभी जोर-जोर से चिल्लाकर अपनी बात रखते हैं। कोई किसी की बात को सुनने के लिए तैयार नहीं होता। अधिक से अधिक बोलने की होड़ मच जाती है। ऊंची से ऊंची आवाज में बोलने की कोशिश की जाती है। तभी दूर से देखने पर कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि झगड़ा हो रहा है। ऐसे में आमतौर पर बहस का कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा पाता। यह सामूहिक वार्तालाप न होकर एक तरह की ‘अपनी डफली अपना राग’ बन जाता है। कई बार अभ्यर्थी खुद बाहर आने पर यह कहते पाये जा सकते हैं कि अंदर मछली-बाजार बन गया था। और वे अमूमन इस हरकत से बड़े असंतुष्ट रहते हैं और कई बार दुखी भी दिखायी पड़ते हैं।
उपरोक्त परिस्थिति बड़ी हास्यास्पद कही जानी चाहिए। और फिर छात्रों द्वारा बाद में पछताने से क्या फायदा। जबकि वे सभी इस सत्य को जानते हैं कि अधिक बोलना, चिल्लाना, दूसरों को न सुनना, अपनी ही बात बोलना आदि-आदि सैद्धांतिक रूप से गलत है और इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। मगर फिर भी अधिकांश इस गलती को करने से नहीं बच पाते। इतना ही नहीं, जोश में अपनी ही कही बात को बाद में किसी अन्य संदर्भ में उलट देते हैं अर्थात एक ही बहस में अलग-अलग राय दे जाते हैं। जबकि यह बड़ी गलती मानी जानी चाहिए। मगर फिर भी आम विद्यार्थी जल्दबाजी में ही सही ऐसा करने से नहीं चूकते। कह सकते हैं कि यह एक किस्म की फितरत बन चुकी है। प्रवाह में हमें कुछ होश नहीं रहता। हां, बाद में रुकने पर खुद अहसास होता है। उधर, निरीक्षक तो आसानी से समझ जाता है। और ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं कि जब मात्र एक बार बोलने वाला अभ्यर्थी चुन लिया गया और पूरे समय बोलने वाला निकाल दिया गया। शांत, गंभीर रहते हुए किसी एक ही कथन से आप अपनी बात प्रभावशाली ढंग से रख सकते हैं। समूह में किसी एक का सटीक मत दूसरों के लिए मुश्किल बन सकता है। इन सामान्य से दिखने वाले महत्वपूर्ण बिंदुओं को, कोचिंग संस्थाओं में तमाम अध्यापक घुट्टी की तरह पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। फिर भी छात्र वही गलती करते हैं, क्यों? क्योंकि यह हमारी कमजोरी नहीं आदत बन चुकी है। समाज का स्वभाव बन चुका है।
ऐसा ही कुछ दृश्य आप टेलीविजन पर होने वाले विभिन्न बहसों में देख सकते हैं। यहां अमूमन वरिष्ठ एवं विशिष्ट लोगों को अपनी-अपनी बात रखने के लिए बुलाया जाता है। विषय भी पहले से सुनिश्चित होता है और भाग लेने वाला हर एक व्यक्ति किसी विशेष वर्ग या विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है, सभी को पहले से ही पता होता है। इसके बावजूद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, बहस जिस रूप में आगे बढ़ती है, उसका वर्णन यहां न ही किया जाये तो अच्छा है। कई बार शब्दों में शालीनता की सभी सीमाएं टूट जाती है। खुद की गलती को कभी नहीं स्वीकारा जाता उल्टा दूसरों की गलती को उभारा जाता है। क्या इससे आप सही साबित हो जाते हैं? बिल्कुल नहीं। और ऐसे में यह बहस तू-तू, मैं-मैं में बदल जाती है। कई बार कुछ भी सुनाई और समझ नहीं आता। तथाकथित परिपक्व और बुद्धिजीवी वर्ग का प्रभाव आम दर्शक पर क्या होता होगा? क्या वार्ता में भाग लेने वाले नहीं जानते? जानते और समझते हैं, मगर फिर भी वही गलती करते हैं। आखिरकार क्यूं? शायद यह हमारे आधुनिक जीवन मूल्यों को दर्शाता है।
ऐसा ही कुछ-कुछ लोकसभा, राज्यसभा और विधासभाओं में भी देखा जा सकता है। स्थिति कई बार इतनी गंभीर हो जाती है कि इन सभाओं के अध्यक्ष इसे किस तरह नियंत्रण में कर पाते होंगे, देखकर आश्चर्य होता है। इस घटनाक्रम को वो किस रूप में लेते होंगे, गहन विश्लेषण और चिंतन का विषय लगता है। चूंकि वे अमूमन इन सभाओं के सदस्य भी रह चुके होते हैं। ऐसे में इनका स्वयं का आचरण सभा में बहस के दौरान एक सदस्य के रूप में किस तरह होता था? क्या वे कभी रुककर सोच पाते होंगे? यह अवलोकन एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का विषय है। सभापति के आसन पर विराजमान होने पर दूसरों के व्यवहार में स्वयं का प्रतिबिंब देखते होंगे तो कैसा लगता होगा? हो सकता है तकलीफ होती हो। क्या कभी स्वयं से प्रश्न पूछने के लिए विवश होते होंगे? क्या आत्मचिंतन होता होगा?
उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर सीधे-सीधे दे पाना किसी के लिए भी मुश्किल है। मगर इसी तरह का दृश्य जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी आम देखे जा सकते हैं। घर-परिवार के अंदर जहां बोलने की पूरी स्वतंत्रता है वहां हम दूसरों की बातें कितना सुनते हैं? किस तरह का व्यवहार करते हैं, किस तरह से समझते हैं, अपनी बातों को किस तरह से दूसरों पर थोपते हैं, हर दूसरे घर में देखा जा सकता है। यहां पर परिवार के मुखिया की स्थिति को आसानी से समझा और परखा भी जा सकता है। कई बार कितनी विकट परिस्थितियों से वह गुजरता होगा, दूर बैठकर भी जाना जा सकता है। बाकी के सदस्य जीवन में उसी पद पर आसीन होने पर इसकी भूमिका के महत्व को समझ पाते होंगे, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। मगर यह भी जरूरी नहीं। लेकिन हां अपनी डफली अपना राग बनाने पर परिवार में विघटन हो रहा है, घुटन हो रही है, एक रसोई कई चूल्हों में बदल जाती है तो परिवार के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। ऐसा ही कुछ आधुनिक समाज के अंदर भी देखा जा सकता है। जहां हर वर्ग सिर्फ अपनी-अपनी बात कहने के चक्कर में रहता है। अधिक से अधिक संख्या में एकत्रित होकर चिल्लाकर ज्यादा से ज्यादा प्रभाव बनाने की कोशिश की जाती है। हम यह भूल जाते हैं कि ऐसा सभी करने लगे तो शोर उत्पन्न होगा। समाज की शांति भंग हो सकती है। हम जानकर भी अनजान बन जाते हैं। जब सब एक साथ बोलेंगे तो क्या होगा? जब कोई किसी को सुनने को तैयार ही नहीं तो क्या फायदा? दुःख इस बात का है कि हम धीरे-धीरे एक ऐसी अवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहां समाज मछली-बाजार बनता जा रहा है। मुश्किल इस बात की है कि यह किसी एक क्षेत्र या वर्ग में नहीं, हर जगह है। फिर चाहे वो खेल का क्षेत्र हो, व्यवसाय हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, उच्च, मध्यम या निम्न वर्ग हो। यहां तक कि धर्म के क्षेत्र में भी धर्मगुरुओं को एक-दूसरे से उलझते हुए, टीका-टिप्पणी करते हुए आम देखा जा सकता है। पता नहीं आदिकाल में महान धर्मगुरुओं के बीच शास्त्रार्थ कैसे हुआ करता था? वे जरूर उपरोक्त बातों का ध्यान रखते होंगे। मगर हम इतिहास और अपने पूर्वजों के संस्कारों से कभी शिक्षा नहीं लेते। यह सच होता जा रहा है कि पढ़े-लिखे को समझाना ज्यादा मुश्किल काम है। आज टेलीविजन के किसी भी चैनल को खोलकर देख लें, कुछ समय के पश्चात दिल और दिमाग उलझकर भ्रमित हो जाते हैं। ऐसा लगता है कि मानों कई दिशाओं से तरह-तरह के विचारों, घटनाओं, सनसनियों के बम फेंके जा रहे हैं। आपका मन-मस्तिष्क एक को सुनकर-समझकर अभी संभल ही पाता है कि दूसरा तीर आ लगता है। ऐसे में कोई भी तंग हो सकता है। ऐसी परिस्थिति में आप अशांत, मानसिक रूप से परेशान और हो सकता है उद्वेलित होकर कहें- बंद करो ये शोर। क्योंकि आपको शांति चाहिए।
मनोज सिंह

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Mar 24 2012

शिक्षा की दुकानें

Published by Singh Manoj under Weekly Article

ग्रेटर नोएडा के एक क्षेत्र में अनगिनत शैक्षणिक संस्थाओं को एक कतार में खड़ा देख मैं हैरान हुआ था। ऐसा दृश्य अन्य शहरों में भी देखा जा सकता है। थोड़ा-सा ध्यान से देखने पर नाम से ही समझ में आ रहा था कि अधिकांश कॉलेज इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कोर्स से संबंधित हैं। सीमित क्षेत्र में बनी कंक्रीट की ये खूबसूरत बिल्डिंगें पहले पहल तो किसी शिक्षण संस्थान के होने का अंदेशा भी नहीं देतीं। हो सकता है मन के किसी कोने में अंकित बचपन के विद्यालय-कॉलेजों की तसवीरों से मेल न खाने के कारण ऐसी भावना उपजी हो। एक ही जगह सड़क के दोनों ओर इन संस्थाओं के झुंड से किसी बाजार में होने का अहसास हो रहा था। मगर आसपास टहलते छात्रों की संख्या उस अनुपात में काफी कम लग रही थी। इस बात ने मुझे सोचने के लिए मजबूर किया था। कई सवाल खड़े हुए थे। इन संस्थाओं में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या क्या वास्तव में कम है? अगर हां तो क्यूं? अपवादों को छोड़ दें तो क्या यहां से पढ़कर निकलने वाले आम छात्रों को उचित नौकरी मिल पाती है? इस सवाल के पहले यह प्रश्न ज्यादा गंभीर होकर उभरा था, विशेष रूप से इंजीनियरिंग कॉलेज के संदर्भ में, कि क्या इन कॉलेजों में समुचित तकनीकी शिक्षा दी जा रही है? इस सवाल के उठने के पीछे कारण था। असल में पूर्व में बनी विशालकाय इंजीनियरिंग संस्थाओं के सामने ये बहुत छोटी और अनुभव के हिसाब से अपर्याप्त महसूस हो रही थीं। संदेह का होना स्वाभाविक है, या तो पहले की तकनीकी संस्थाएं बेवजह इतनी बड़ी-बड़ी बनाई गईं या फिर आज की संस्थाएं आवश्यक शिक्षा के हिसाब से नाकाफी हैं? अगर यह मान भी लें कि पूर्व में अधिकांश संस्थाएं शासकीय होने के कारण उनके पास बड़े-बड़े भूखंड हुआ करते थे, जिनकी अब आवश्यकता नहीं, तब भी उनमें समायोजित विभिन्न प्रयोगशाला, बड़ी-बड़ी कार्यशाला और पुस्तकालय की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इन शिक्षण संस्थाओं को देखकर मन में आशंका का उठना स्वाभाविक है।
इसी संदर्भ में एक दोस्त के वक्तव्य ने मुझे चौंकाया था। उसके मतानुसार भोपाल जिला में इस वक्त एक सैकड़ा के आसपास इंजीनियरिंग शिक्षा संबंधित कालेज होंगे। सुनकर मैं हैरान हुआ था। इतनी संख्या में तो शायद विद्यालय भी भोपाल शहर में नहीं होंगे!! अगर यह आंकड़ा सही है तो इतने छात्र इन कॉलेजों को कहां से मिलते होंगे? सुना है कि शायद यही कारण है जो हजारों सीटें हर राज्य में खाली पड़ी रहती हैं। ऐसा ही कुछ हाल मैनेजमेंट संस्थाओं का भी है। जबसे शिक्षा के क्षेत्र को प्राइवेट संस्थाओं के लिए खोला गया है, तब से ऐसी स्थिति बनी है। इसमें कोई शक नहीं कि आबादी के अनुपात में शिक्षण संस्थाओं की कमी के कारण जहां एक तरफ प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन और जटिल हो चुकी थी वहीं अधिकांश छात्रों को शिक्षा भी नहीं मिल पा रही थी। मगर क्या उसका समाधान इस तरह से अनियंत्रित छूट देकर किया जाना उचित है? इस पर कई प्रश्नचिन्ह लगाये जाने चाहिए। और इसके पीछे कारण हैं। अति किसी भी चीज की खराब होती है और अनगिनत खुल रहे इन कॉलेजों की अपनी कई मुश्किलें हैं।
असल में यह देखकर कि शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसाय की अकल्पनीय संभावना है, समाज के तकरीबन सभी क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों ने अपने पैसे इसमें लगाये। फलस्वरूप बिना किसी व्यवस्थित योजना के तकनीकी शिक्षा एवं मैनेजमेंट कोर्सेस की संस्थाएं खुलती चली गईं। शिक्षा का सीधे-सीधे जीवनयापन से संबंध होने के कारण और आज के व्यवसायिक युग में नौकरी की प्रबल संभावना को देखते हुए तकनीकी और मैनेजमेंट के कोर्स का सर्वाधिक मांग होना स्वाभाविक था। यह कुछ-कुछ उसी तरह था जिस तरह अंग्रेजी की मांग को देखकर गांव-गांव, गली-गली अंग्रेजी स्कूल खुल गये। जहां छात्र न तो पूरी तरह अंग्रेजी सीख पाता है, साथ ही मातृभाषा ज्ञान को भी कमजोर कर लेता है। शिक्षा में ऐसी व्यावसायिकता के साइड इफेक्ट्स के लिए क्या समाज तैयार है? कुछ और हो न हो लेकिन इसमें निहित विरोधाभास को समझना जरूरी है। एक व्यवसायी जब अपना पैसा लगाता है तो उसका मूल उद्देश्य अमूमन लाभ कमाना होता है। फिर चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र ही क्यूं न हो। और फिर वो धन प्राप्ति के लिए व्यवसाय के वही सब दांव-पेंच खेलता है, जो बाजार में चलते हैं। मगर सवाल उठता है कि क्या शिक्षा के क्षेत्र में बाजार की प्रतिस्पर्धा उचित है? समाज की दृष्टि से तो स्वाभाविक रूप से यह ठीक नहीं। मगर बाजार में उचित-अनुचित की कोई परिभाषा व सीमा सुनिश्चित नहीं। एक छोटा-सा उदाहरण देखें। व्यवसाय में लाभ के लिए अधिक से अधिक बिकना आवश्यक है, फिर उसके लिए मार्केटिंग के तमाम हथकंडे अपनाये जाते हैं। बाजार हर बात के पैसे उपभोक्ता से वसूलता हैं। और पैसा पैसे को खींचता है। मगर अंत में ऊंचा दाम किससे लिया जाता है? क्या सभी उत्सुक व होनहार छात्र मोटी रकम दे सकने में समर्थ होते हैं? नहीं। मैनेजमेंट कोर्स की फीस लाखों में देखकर तो हैरानी होती है। मात्र डेढ़ से दो वर्ष के लिए इतने पैसे!! क्या पैसे से मैनेजमेंट सीखा जा सकता है? बहरहाल, और कुछ हो न हो हां, पैसे का कुचक्र चल पड़ता है। शिक्षा के क्षेत्र में पैसे का प्रयोग कितना हानिकारक हो सकता है कल्पना करना मुश्किल नहीं। मगर एक आम व्यवसायी से इस मुद्दे पर किसी राहत की उम्मीद करना उचित न होगा। उलटा वो तो अपने उद्देश्य प्राप्ति में पूरे जोर-शोर से लगा होता है। हर एक कॉलेज द्वारा, एक दुकान की तरह अधिक से अधिक छात्रों को आकर्षित करने के लिए ऐसे-ऐसे हथकंडों का उपयोग किया जाता है जो मार्केटिंग की शब्दावली में तो एक बार अच्छे से समझे जा सकते हैं मगर शिक्षा के लिए यह घातक ही होंगे। जो फिर समाज के लिए किसी भी तरह उपयोगी नहीं हो सकते। ऐसे बहुत सारे झूठे वायदों का पिटारा खोला जाता है कि छात्र एवं अभिभावक एक उपभोक्ता की तरह भ्रमित हो जाते हैं। उदाहरण, कई कालेज इस बात का दावा करते हैं कि वे अपने शतप्रतिशत छात्रों की नौकरी सुनिश्चित करते हैं। जबकि हकीकत कुछ और होती है। कई बार ऐसा पाया गया है कि व्यवसायिक घरानों से मिलकर कुछ समय के लिए छात्रों को नौकरी दिला दी जाती है और फिर कुछ समय के पश्चात विभिन्न कारणों को दिखाकर निकाल दिया जाता है। इस प्रक्रिया का अंत चाहे जो हो शिक्षण संस्थाओं का नाम और काम तो हो ही जाता है।
इस क्षेत्र में बड़े-बड़े प्रभावशाली लोगों के आ जाने के बाद खेल भी बड़ा हो गया है। सुविधा के नाम पर छात्रावास में बहुत कुछ दिया जाता है मगर मोटी रकम भी वसूल की जाती है। आमतौर पर ये आम आदमी की पहुंच से बाहर होता है मगर ऊंचे सपनों को पाने के चक्कर में लोग कर्जा लेने से भी नहीं चूकते। उधर, पैसा खर्च करने से आजकल क्या नहीं हो सकता। शिक्षण संस्थाओं द्वारा झूठी मगर बड़ी-बड़ी तारीफें कई पत्र-पत्रिकाओं में छपवा दी जाती हैं। मैनेजमेंट के सारे प्रयोग यहां किये जाते हैं। और इस तरह से कुछ संस्थाएं थोड़े अंतराल में बड़ा नाम कमा लेती हैं। अंततः शिक्षा में इस व्यवस्था का समाज में कहां-कहां दुरुपयोग और दुष्प्रभाव हो सकता है, उसकी आशंका देखने में तो बहुत छोटी लगती है मगर उसके परिणाम दूरगामी होते हैं। वे संस्थाएं जिन्होंने करोड़ों रुपये फूंककर कंक्रीट की विशाल दुकानें खड़ी कर दीं उनके खाली पड़े रहने से अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा इसका आकलन आर्थिक विशेषज्ञ अपनी आंख-मूंदकर चाहे जो कहे मगर आम आदमी को भी समझने में मुश्किल नहीं।
किसी जमाने में आईटीआई से निकलने वाला बालक तकनीशियन और पॉलिटेक्निक से निकलने वाला छात्र जूनियर इंजीरियर और गिने-चुने इंजीनियर कालेज से निकलने वाला युवा इंजीनियर बना करता था। इन कालेजों में अपनी-अपनी योग्यता के हिसाब से दाखिला मिलता था तो फिर पास होने पर उसी तरह की नौकरी प्राप्त होती थी। मगर तमामउम्र व्यक्ति संतुष्ट रहता था। आमतौर पर सभी के जीवन में संतोष होता था। आज कहने के लिए तो यह बहुत अच्छा लगता है कि अत्यंत कम अंक लेने वाला छात्र भी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त कर रहा है और हर दूसरा युवक मैनेजमेंट कर रहा है। मगर हम यह भूल जाते हैं कि उसकी अपेक्षाएं बढ़ाकर उसके साथ कितना अन्याय किया जा रहा है। आज छोटे-छोटे तकनीकी कार्य के लिए भी इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त छात्रों को लिया जाता है। सामान्य होटलों एवं ब्रांडेड दुकानों में मैनेजमेंट विद्यार्थी को नौकरी करते देखा जा सकता है। ऐसे में बड़े-बड़े सपने पाले कालेज से निकलने वाला छात्र का जब हकीकत से पाला पड़ता है तो वह कुंठाग्रस्त हो जाता है। इसके बावजूद इस पैकेज की शब्दावली में सिमटते हमारे युवावर्ग की मानसिकता का संस्थाएं भरपूर फायदा उठाती हैं। और यह धंधा खूब फूलफल रहा है। इससे वास्तव में कितना फायदा हो रहा है यह तो छात्र और अभिभावक इस दौर के गुजरने के बाद ही समझ पाते हैं मगर तब तक शायद देर हो जाती है। जीवन में पीछे मुड़कर देखा तो जा सकता है मगर वापस जाया नहीं जा सकता। पीछे खड़ी भीड़ आपको रुकने भी तो नहीं देती। और फिर हर दुकान में साइन बोर्ड भी तो लगा होता है कि बिका हुआ माल वापस नहीं लिया जाता।
मनोज सिंह

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Mar 17 2012

कुछ अनुत्तरित प्रश्न

Published by Singh Manoj under Weekly Article

एक मित्र के व्यवहार ने कल मुझे हैरान किया था। वे एक प्रमुख समाचारपत्र से संबंधित हैं और हिंदी साहित्य में भी दखल रखते हैं। विभिन्न विषयों पर उनसे समय-समय पर बहस करने में मजा आया करता था। उनकी सटीक टिप्पणियां और तर्कों के साथ-साथ तथ्यों और आंकड़ों के आगे जब निरुत्तर हो जाता तो मुझे तकलीफ नहीं होती थी। कहीं भी इसे मैं व्यक्तिगत नहीं लिया करता था न ही कभी जीत-हार के रूप में सोचा करता था। बल्कि मेरी कल्पना नयी ऊर्जा पाती। उसे व्यापकता के साथ नयी दिशा भी प्राप्त होती। फलस्वरूप आत्मचिंतन और विचार मंथन की प्रक्रिया तेज होती। हम हर मुद्दे पर घंटों बहस करते थे मगर हर बार अंत में रिश्तों में ताजगी और अपनापन महसूस होता। अमूमन हमारा उद्देश्य एक ही होता, समाज का विकास और देशहित। लेकिन कल सब कुछ बदला हुआ था। विगत दिवस हुए चुनावों में हार-जीत पर मेरी टिप्पणी पर उनकी प्रतिक्रिया को सुनकर पहले तो मैं समझ नहीं पाया। मोबाइल पर हो रही बातचीत के अचानक कट जाने पर मुझे लगा कि शायद यह अनायास ही हुआ है। मेरे द्वारा पुनः डायल करने पर वह यह कहते हुए पाये गये कि मैं उन लोगों से बात तक करना पसंद नहीं करता जो अमुक-अमुक विचारधारा का बातचीत में भी समर्थन करते हों। कथन समाप्त होते ही टेलीफोन एक बार फिर कट गया तो इस बार मुझे शक हुआ था। एक बार फिर टेलीफोन मिलाने तक मैं समझ चुका था कि बात कुछ और है। तीसरी बार फोन लगाने पर यह बिल्कुल साफ हो चुका था कि वह एक विचारधारा से नफरत करते हैं। जबकि मेरे लिये विचारधारा और राजनीतिक दल बुद्धिजीवी मित्र से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकते। मगर उनके लिए उनकी सोच और पसंद-नापसंद प्रमुख थी और वह उसके लिए मुझ जैसे लेखकीय दोस्त की दोस्ती भी तोड़ने के लिए तैयार बैठे थे। बहरहाल, मैंने दूसरे संदर्भों की बात शुरू करके अपने मूल्यवान संबंधों को बचाने का प्रयास किया और सामान्य रूप में बातचीत समाप्त की।
उपरोक्त घटनाक्रम एवं व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं मगर फिर भी प्रश्न उठता है कि क्या एक बुद्धिजीवी का ऐसा व्यवहार उचित हो सकता है? क्या यह संकीर्ण मानसिकता का परिचायक नहीं? सवाल तो कई उठते हैं जैसे कि यह पूछे जाने पर कि किसी भी विचारधारा से सहमत या असहमत होना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन उससे नफरत करना क्या उचित है? और फिर नफरत का कोई कारण भी तो होना चाहिए? इस प्रश्न पर वह थोड़ा भड़के भी थे। बाद में शांत मन से विश्लेषण किया तो लगा कि ये विचार उनके कोई व्यक्तिगत अनुभव आधारित नहीं बस एक किस्म की कट्टरता है जो उन्हें कुछ और न सोचने के लिए मजबूर करती है। यह समाज के लिए एक अत्यंत घातक परिस्थिति मानी जानी चाहिए। किसी पार्टी के कार्यकर्ता से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा की जा सकती है और आम जनता में भी कुछ एक लोग अपनी-अपनी पक्की राय रख सकते हैं मगर एक लेखक व मीडियामैन में इसकी संभावना कम होनी चाहिए। लेकिन हिंदुस्तान में तथाकथित बुद्धिजीवियों का इस तरह का आचरण मीडिया में अमूमन देखा जा सकता है। उधर, सामान्य हिंदी लेखकों का ऐसा व्यवहार फेस बुक से लेकर छोटी-मोटी गोष्ठियों में कई बार इन हदों को भी पार कर जाता है। सामान्य शिष्टाचार भी नहीं निभाये जाते। यहां तक कि पुरस्कार लेने और देने में भी कुछ लोगों को अछूत घोषित कर दिया जाता है। और लिये-दिये गये मान-सम्मान को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। कई बार संदर्भित व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता है। विरोधी विचारधारा की प्रजातांत्रिक सरकार को भी स्वीकार नहीं किया जाता। चुनी हुई सरकार के प्रति ऐसा दृष्टिकोण क्या अवाम का अपमान नहीं है? क्या लोकतंत्र में इस तरह के व्यवहार पर प्रश्नचिन्ह नहीं उठना चाहिए? यह समाज को कितना नुकसान पहुंचा सकता है? इसे चंद शब्दों में सीधे-सीधे कह देना संभव नहीं होगा। ऐसी अवस्था में व्यक्ति अपने पसंदीदा नेताओं एवं संबंधित विचारधारा की बुरी बातों की जहां अनदेखी करता है वहीं नफरत होने के कारण विरोधी पार्टी के अच्छे कार्य और सकारात्मक विचार भी स्वीकार नहीं करता। उलटे एक की कट्टरता को देख प्रतिक्रिया में दूसरा और अधिक कट्टर बन जाता है। संक्षिप्त में कहें तो ज्ञानी में इस अवगुण के आते ही क्या वो अज्ञानी नहीं हो जाता? चूंकि यह कहीं न कहीं उसकी लेखनी और वक्तव्य पर भी असर डालता है। ऐसा लेखन फिर समाज को भ्रमित व प्रदूषित कर सकता है, कहना गलत न होगा।
दुर्भाग्य से ऐसे कट्टर बुद्धिजीवियों की संख्या बढ़ती जा रही है। दूसरे पर दोषारोपण करने वालों को पता नहीं चलता कि वो स्वयं कितना कट्टर हो रहा है। देखने व समझने वालों के लिए यह बड़ी हास्यास्पद स्थिति होती है। मगर इसके फलने-फूलने के कारण कई हैं-व्यक्तिगत लाभ, अहम्‌ का तुष्टिकरण, सामाजिक सुरक्षा, संकीर्ण मानसिकता, धार्मिक प्रतिबद्धता, भावनात्मक लगाव, प्रतिस्पर्धा के युग में पहचान और सफलता का शार्ट-कट। और फिर कहीं न कहीं बाजारवाद। क्योंकि और कुछ हो न हो कट्टरता से फायदे तो होते ही हैं। आपको अपनी तरह के लोगों का खुला समर्थन प्राप्त होता है। आप एक ग्रुप (यहां गैंग शब्द बेहतर होगा) में होने का फायदा उठाते हैं। लेकिन फिर समाज कई खंडों में पूरी तरह से बंट जाता है। जहां किसी भी तरह का खुलापन न हो उस कमरे में घुटन स्वाभाविक है। मुश्किल इस बात की है कि यह सिर्फ बुद्धिजीवियों में ही नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र को सीमाओं में बांध दिया गया है। पढ़ा-लिखा व्यक्ति अधिक कट्टर हो जाता है क्योंकि आधुनिक पढ़ाई उसे नया सोचने की इजाजत नहीं देती। यह ज्ञान नहीं सूचना पर आधारित शिक्षा का प्रतिफल है। यहां ऐसा महसूस कराया जाता है कि आप सब जानते हैं। जब आप किसी दूसरे को सुनना ही नहीं चाहते, समझना ही नहीं चाहते तो आपको अपनी गलतियों का पता कैसे चलेगा? ऐसी अवस्था राजनीति के लिए अनुकूल होती है। ऐसी कट्टरता भी। फिर चाहे वो धर्म या विचारधारा के नाम पर हो या फिर किसी एक वर्ग या विचारधारा को विरोधी घोषित करके हो, डराकर हो, भावनाओं के साथ खेलकर हो, इतिहास और भूगोल की गवाही देकर पैदा की जाये मगर होती राजनीतिज्ञों के लिए फायदे का सौदा। यही कारण है जो राजनेता भी जाने-अनजाने कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। आश्चर्य यह देखकर होता है कि हार के बाद भी वे खुलेदिल से अपनी गलतियों को समझना नहीं चाहते। विश्लेषण के दौरान भी चालाकी करने की कोशिश करते हैं। मूल कारणों में जाना ही नहीं चाहते। चूंकि यह व्यक्तित्व द्वारा ओढ़े गये आवरण को हटा सकता है, जीवनशैली को आघात पहुंचा सकता है। वे अपने आपसे भी झूठ बोलने लगते हैं और फलस्वरूप झूठे अहम्‌ में जीना चाहते हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि एक समय के बाद फिर गद्दी मिलेगी। चाहे फिर जो भी गलती कर रखी हो।
तो क्या सारी गलती अवाम की है? यह उसका स्वभावजनित प्रतिफल कहें तो बेहतर होगा क्योंकि वह अपना ही नुकसान सदियों से कराता आ रहा है। स्वयं को शासित एवं शोषित बनाये रखने की शासक की चालाकी को वो कभी नहीं समझ पाया। शासक भी फिर चाहे जिस भी रूप में हो, उसकी पीठ थपथपाकर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाये रखता है। और अपना उल्लू सीधा करता रहता है। तो क्या अवाम के पास कोई विकल्प नहीं? होता है भी तो हम मौका नहीं देते। बार-बार कहा जाता है कि अब सादे सच्चे खुले विचार वाले चिंतक नेताओं की कमी महसूस होती है। क्या कभी अवाम ने महसूस किया कि जब ये लोग प्रासंगिक भी थे तो क्या इन्हें स्वीकार किया गया था? जिन लोगों का नाम लेकर आज आहें भरी जाती हैं, क्या वे अपने समय में सफल हो पाये थे? सत्ता पर वही विराजमान होता आया है जिनके पास संगठन और सत्ता तक पहुंचने की तमाम सीढ़ियां व चाबियां हैं। इक्के-दुक्के उदाहरण को छोड़ दें। इन्हें दुर्घटना कहा जाना चाहिए। आज भी राजनीति में उन्हीं को मौका मिल पाता है जिसके पास तथाकथित क्षमता और सक्षमता हो। राजनेता इस तथ्य व सत्य को भलीभांति जानता है तभी राजनीति की बात करने वाले सामान्यजन को इस क्षेत्र में आकर चुनाव लड़ने की चुनौती दी जाती है। वो जानता है यह उसके बस का नहीं। उधर, हम खुद नहीं चाहते कि हमारा शासक सीधा, सरल व सच्चा कोई नया व्यक्ति हो। ऐसे में राजनेताओं में अगर अहम्‌ आता है, कट्टरता आती है तो क्या गलत है? ऐसी परिस्थितिजन्य समाज में बुद्धिजीवी भी अपनी पसंद का राजनेता और विचारधारा चुन ले तो इसमें किसी को परेशानी क्यों? मुझे उपरोक्त दोस्त के व्यवहार से अब कोई भी आश्चर्य नहीं हो रहा। मेरा उनकी निगाहों में मूल्य ही क्या है? मुझसे उनको मिल ही क्या सकता था? एक स्वस्थ व खुले विचार!! बस!! इसकी कीमत क्या है? कुछ नहीं। असल में सच तो यह है कि जो हम चाहते हैं जैसा हम सोचते हैं वैसी ही सरकार हमें मिलती है, वैसे ही राजनेता होते हैं और वैसे ही बुद्धिजीवी भी पनपते हैं। और फिर मित्र भी तो इसी समाज से आते हैं।
मनोज सिंह

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