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पूजनीय माता
(स्वर्गीय) कृष्णा सिंह की याद में...
...उन सभी मासूम बच्चों को समर्पित,
जो अपना बचपन घुटन भरे वातावरण में व्यतीत करते हैं।
प्राक्कथन
कल्पना का वास्तविकता से गहरा संबंध है। मानव
की परिकल्पना चाहे जितनी भी ऊँची उड़ान भर ले, उसकी डोर ज़मीन से कहीं
न कहीं ज़रूर जुड़ी होती है। मेरा उपन्यास एक काल्पनिक जीवन चरित्र
है। उसके सभी पात्र भी काल्पनिक हैं। इनका किसी भी वास्तविक चरित्र
से कोई लेना-देना नहीं है। परंतु यह मेरे जीवन में आसपास घटी
विभिन्न घटनाओं से प्रेरित अवश्य हैं। इसके पात्र मेरे आसपास, मेरे
साथ अपने जीवन के कुछ अनमोल पल ज़रूर गुजार चुके हैं। हर पात्र
अलग-अलग समय पर, भिन्न रूप में मुझसे मिला। कुछ पात्रों ने तो दिल
पर इतना गहरा असर किया हुआ है कि वर्षों बाद भी उनके चिह्न हृदयपटल
पर अंकित हैं।
उपन्यास लिखते-लिखते, पात्रों का जीवन, कल्पना में जीने पर,
अत्यधिक पीड़ा का अनुभव हुआ। पीड़ा, दुःख यह तो जीवन की वास्तविकता
है। इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। उपन्यास लिखने के पूर्व यह कभी
नहीं सोचा था कि मानसिक बीमारी से ग्रसित मरीज़ों की संख्या इतनी
अधिक होगी। विभिन्न अस्पतालों में लंबी कतारें देखकर, पहले तो
आश्चर्य, फिर उन मरीज़ों से सहानुभूति हुई। परंतु बाद में मरीज़ों के
साथ रह रहे लोगों पर ज्यादा दया आई। मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति
शारीरिक और मानसिक पीड़ा, मेरे ख़याल से, कम ही उठाता होगा। उसकी
अपनी दुनिया होती है। जब आपकी सोच ही नहीं तो पीड़ा कैसी। पीड़ा का
संबंध दिमाग़ से है और जब वही ठीक नहीं तो पीड़ा का अनुभव कैसे हो
सकता है। मगर यह भी सत्य है कि वे जीवन में आनंद और सुख के अनुभव
से भी वंचित रह जाते हैं।
हाँ, इन मरीज़ों के साथ रह रहे लोगों पर दया इसलिए आई, चूँकि वे
मरीज़ों से कहीं ज्यादा मानसिक और सामाजिक पीड़ा से गुजरते हैं। वे
बीमार तो नहीं होते परंतु दुःख ज्यादा भोगते हैं। अन्य बीमारियों
के मरीज़ों के साथ रहने वालों को कष्ट नहीं होता, ऐसा नहीं है। परंतु
मानसिक बीमार व्यक्ति के साथ रह रहे सभी लोगों को, जो उनसे
भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, पीड़ा अधिक होती है, ऐसा मेरा मानना
है। मरीज़ मर भी नहीं रहा और जी भी नहीं रहा। वहीं आप हरेक दिन पीड़ा
में ही व्यतीत कर देते हैं। जीवन है भी और नहीं भी। मानसिक रोगी तो
सामान्य होता ही नहीं, आप भी सामान्य जीवन नहीं बिता पाते। बड़ा
भयावह जीवन होता है। परंतु यह देखकर अत्यंत प्रसन्नता होती है कि
आज भी बहुत बड़ी संख्या में लोग मरीजों की देखभाल भी करते हैं और
अपने साथ परिवार में ही रखते हैं। ऐसे साथ रहने वालों की संख्या
बाहरी देशों से हमारे देश में अधिक है।
आज के भौतिक युग में, नर-नारी की प्रतिस्पर्धा में, पारिवारिक जीवन
के अवमूल्यन और माता-पिता के गलत परवरिश और सोच ने, पति-पत्नी के
संबंधों पर बहुत ग़लत असर डाला है। मधुरता और सुख का, समर्पण और
सामंजस्य से सीधा संबंध है। पहले यह नारी करती थी फिर भी नर उस पर
उत्पीडऩ करता था। नारी चोट तो खाती थी मगर परिवार को बचा ले जाती
थी। समाज की धुरी थी। फिर जो केंद्र में होगा, कष्ट तो उसे होगा
ही। नारी के प्रतिस्पर्द्धी बनने से वह पक्ष खत्म-सा हो गया। जहाँ
बात बराबरी की हो जाये तो फिर संबंध नहीं, व्यापार हो जाता है। ईंट
का जवाब पत्थर से देने से नुकसान ज्यादा होता है। पत्थर की मार ईंट
से अधिक असरदार होती है। यही हो रहा है। अब नर और नारी दोनों ही
प्रहार कर रहे हैं। नुकसान अति विनाशकारी है और यह देखते ही बनता
है।
आधुनिक युग के हर घर में तनावपूर्ण वातावरण से मानसिक बीमारों की
संख्या बढ़ रही है। प्राकृतिक और बॉयलॉजिकल रूप से मानसिक बीमार तो
पहले भी थे। सामाजिक संरचना के बदलने से, संबंधों की नाजुकता के
टूटने से, भावनाओं के बिखरने से, देने की प्रवृत्ति के कम होने और
सिर्फ लेने की मानसिकता बढऩे से, मानसिक असंतुलन की संख्या में
अचानक बहुत बढ़ोतरी हुई है। दोष कम या अधिक किसका का है, यह एक
दीगर बात है। फिर पहले की सामाजिक व्यवस्था में, संयुक्त परिवार
में, बहुत से सदस्य होने पर आप अकेले कम रह पाते थे। सुख-दुःख की
लंबी क्रियाकलापों में मन भटक ही नहीं पाता था। गिरते ही सँभालने
वालों की संख्या अधिक होती थी। सही उम्र में ब्याह से कुंठाएं, झूठी
अभिलाषाएं, अधिक चाहतें नहीं होती थीं। आजकल परिपक्व उम्र में
ब्याह से नये घर को नारी स्वीकार नहीं कर पाती और नया घर उसे
स्वीकार नहीं कर पाता। नारी दोनों घरों में बँटकर, तीसरा ठिकाना बना
ले जाती है। फिर विभिन्न धारणाएं, पसंद-नापसंद पहले से ही
सुनिश्चित होती है। उस पर नया कुछ होने की संभावना कम होती है।
हमारी सामाजिक संरचना में नर-नारी की स्थिति स्पष्ट परिभाषित थी।
उसमें अगर आप फेरबदल करते हैं तो आपको सामाजिक व्यवस्था में भी
मूलभूत परिवर्तन करना होगा। अन्यथा सब कुछ अव्यवस्थित ही रहेगा। यही
कारण है कि आज अव्यवस्था इतनी बढ़ गयी है कि दिमाग़ उसे सँभालने की
स्थिति में नहीं है और असंतुलित हो गया है। फिर ऊपर से एकल परिवार
होने से नकारात्मक सोच, ग़लत विचारों को बढऩे में सहायता मिलती है
और मानव मानसिक रूप से अधिक बीमार होता चला जाता है। फिर माता-पिता
में से किसी भी एक के मानसिक रूप से असंतुलित होने से पूरा घर ही
बिखर जाता है। इस तरह के बीमार परिवार के बीमार वातावरण में सिसकती
हैं मासूम ज़िंदगी। भविष्य का मानव बचपन में ही असुरक्षित हो जाता
है। समय के कालचक्र में यही बालक बड़ा होकर नया मानसिक रोगी बनता
है।
प्रेम का बंधन, त्याग की भावना, सामंजस्यपूर्ण संबंध और जीवन से भरा
परिवार, स्वर्ग के आनंद की अनुभूति इसी में है।
उपरोक्त उपन्यास को लिखने में मेडिकल प्रोफेशन से संबंधित विभिन्न
जानकारियां प्राप्त करने में मुझे डाक्टर भोंडेले (सेवानिवृत्त
रेलवे डाक्टर), डाक्टर बहरानी (जबलपुर), डाक्टर मीरा संघी (जबलपुर),
डाक्टर वीरेन्द्र मोहन (सोलन) ने जो सहयोग किया वह अवर्णनीय है।
विभिन्न मानसिक रोगी और उनके परिवार के सदस्य जो मेरे संपर्क में
आए, उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। उपन्यास लिखते-लिखते
अपने वास्तविक जीवन से कुछ दूर हो जाने पर जो कष्ट पिता, पत्नी रेखा
और दोनों बेटियों अनुलिका एवं मानविका ने महसूस किया, उसके लिए मैं
उनका क्षमाप्रार्थी नहीं हूँ, चूँकि सृजन की पीड़ा से वे भी अब कहीं
न कहीं जुड़ने लगे हैं।
सभी इस सुंदर जीवन का आनंद ले सकें, इन्हीं आशाओं से...
- मनोज सिंह
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