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8.
समय नहीं रुकता। किसी के मरने पर, ज़िंदा लोगों की ज़िंदगी में मोड़
तो आता है, पर जीवन चलता रहता है। छोटा देवर दिलासा देकर जा चुका
था और यहाँ से शुरू हुई मालती की अपनी एक नयी ज़िंदगी। काल का चक्र
तेज़ी से घूम रहा था। निम्न मध्यमवर्गीय परिवार, सीधा-सा मतलब ग़रीबी
रेखा से थोड़ा-सा ऊपर। ये ऐसा वर्ग है जहाँ कुछ समय में ही, थोड़ी
परेशानियों से लोग सीधे ग़रीबी रेखा पर या उससे नीचे पहुँच जाते
हैं। इस वर्ग में बस खाने लायक प्रबंध रहता है। दो वक्त रोटी ज़रूर
मिल जाएगी, रहने के लिए एक छोटा-सा मकान हो सकता है। न तो कोई बहुत
बड़ा बैंक-बैलेंस, न ही घर में कोई शानो-शौकत का सामान। बस आप दोनों
समय अपना पेट भरते रहें। आपने ज़रा-सी भी ज़्यादा की इच्छा की तो आप
परेशानी में पड़ सकते हैं। मास्टर जी और मालती दोनों ही एक ही तरह
के सोच के और एक ही परिवेश से आए हुए थे। इसीलिए दोनों में ही बिना
कुछ कहे हुए बहुत सामंजस्य था। दोनों ही बहुत ज़्यादा न ख़्वाब देखते
थे न ही उनकी बहुत ज़्यादा कोई चाहत थी। चकाचौंध का तो कोई सवाल ही
नहीं। बस इज्जत से दो वक्त की रोटी मिलती रहे, जिसके लिए भगवान की
तरफ़ से कोई कमी नहीं थी। मास्टर जी इतना तो ज़रूर कमा लेते थे।
आज के युग में भी अगर इंसान सिर्फ दो वक्त की रोटी ही खाये और सादा
जीवन व्यतीत करे तो उसके लिए महंगाई बिल्कुल भी नहीं है। मास्टर और
मालती इसी सिद्धांत पर यकीन करते थे। भोजन वह बढ़िया खाया करते थे
फिर चाहे तन ढकने के लिए साधारण से वस्त्र ही क्यों न हो। मालती को
बहुत फैशन या आधुनिकता में विश्वास तो क्या उसकी कोई सोच ही नहीं
थी। हाँ, भगवान ने स्वयं ही उसको रूप और रंग ठीक-ठीक दिया हुआ था।
साधारण-सी धोती, कमर से होकर सिर के ऊपर पल्ला लेते हुए फिर दूसरी
तरफ़ से साड़ी का पल्लू पूरे शरीर को ढकता हुआ वापस कमर से बांधा
रहता था। यह उसकी रोज़ की वेशभूषा थी। सुबह जो नौ बजे दाल रोटी बनायी
तो रात को दाल और रोटी के साथ एक सब्जी भी। रात आठ बजे खाकर मास्टर
जी जल्दी सोने चले जाते थे। न कोई रेडियो सुनने का साधन, न ही चाहत।
दोपहर एक अखबार स्कूल से रोज ले आया करते थे। स्कूल के पुस्तकालय
से कभी-कभी पत्रिका भी ले आते। बस पढ़ते रहना। फिर स्कूल की तमाम
राजनीति से दूर, दोस्ती यारी से दूर। हाँ, अगर कभी कोई विशेष बात
हुई तो दूसरे अध्यापक उनसे मिलने आ जाते थे। वह भी दूसरों के घर
किसी विशेष कार्यक्रम में ही जाते थे। माँ-बाप का देहांत बहुत पहले
ही हो चुका था। भाई अपनी-अपनी जगहों पर छोटी-मोटी नौकरियाँ कर रहे
थे। दर्जनी मोहल्ला का यह मकान पिछले तक़रीबन चार पांच दशकों से
मास्टर जी के पूर्वजों के पास था और स्कूल से उन्हें इतनी तनख्वाह
मिल जाती थी कि घर का बाकी खर्चा वह कर सके।
कुछ समय पहले मास्टर जी को स्कूल में एलआईसी (जीवन बीमा) का एजेंट
मिला था। इस बारे में उन्होंने कभी कुछ सोचा नहीं था। वह इतना तो
ज़रूर समझ गये थे कि इसमें एजेंट का भी कुछ कमीशन है इसलिए इतना ज़ोर
लगा रहा है। परन्तु फिर भी दोस्तों के समझाने पर, एजेंट के मनाने
पर उन्होंने बीमा की हाँ कर दी थी। अपनी परिस्थिति को देखते हुए
सिर्फ कुल पाँच हज़ार रुपए का बीमा कर दिया था। बनने वाली मासिक
किस्त दी जा सकती थी।
तेरहवीं के कुछ दिन बाद, एक दिन अचानक घर पर एलआईसी का एजेंट आया
था। दरवाज़ा मालती ने ही खोला था। उसे देखते ही सफेद साड़ी में सिर
पर पल्ला रखकर हाथ जोड़े खड़ी हो गयी। आँखों में शून्यता और चेहरे
पर उदासी थी। कुछ महीने पहले ही वो बीमा करते समय घर आ चुका था।
मालती के लिए मेहमान के रूप में उसे स्वीकार करने में काफी
हिचकिचाहट हो रही थी। वहीं एजेंट के लिए शायद यह उसका रोज़मर्रा का
काम था। एजेंट ने ब्रीफकेस से कागज निकालकर उस पर मालती के
हस्ताक्षर करवाने चाहे। मालती नाम लिख लिया करती थी। बिना किसी को
दिखाये, बिना ज़्यादा अक्ल लगाये, उदासीनतापूर्वक उसने हस्ताक्षर कर
दिये थे। उसने यह भी नहीं पूछा था कि 'किसलिये?'
एजेंट जाते-जाते बोल गया था...
''बहुत दुःख हुआ सुनकर। मैं जल्दी से जल्दी पैसे दिलवाने की कोशिश
करूँगा। मास्टर जी का बीमा अभी हाल ही में हुआ था। शायद थोड़ी
मुश्किलें आये। ख़ैर...'' सुनकर उसे अटपटा लगा था। दरवाज़ा बंदकर एक
बार फिर रोई थी। अमित तो स्कूल में था। हाँ, सुप्रिया ने रोने में
साथ दिया था।
समय तो अपनी रफ्तार में था मगर मालती के लिए थोड़ा तेज़। एजेंट को
गए हुए हफ्ते बीत गए थे। कोई खबर न आने पर मालती थोड़ा सोच में पड़
गई थी। पैसों की तंगी हो रही थी और उस बीमे का फ़ायदा भी मालती को
नहीं हो पा रहा था। अगर बीमा कराने के बाद जल्दी ही आदमी का देहांत
हो जाये, तो जीवन बीमा निगम में उसे अरली क्लेम कहते हैं। और इस
तरह के केस की पूछताछ की जाती है। सुनिश्चित किया जाता कि कहीं झूठा
या बीमार आदमी का बीमा तो नहीं करा दिया गया था। अन्यथा जीवन बीमा
के पैसे जल्दी मिल जाया करते हैं। मालती इस बात से बेखबर थी। आज
उसने सोचा... गीता से तो वह कई बार चर्चा कर चुकी, परन्तु शुक्ला
जी तो सिर्फ बात ही किया करते, कुछ मदद नहीं कर पा रहे... और उसे
अचानक सैनी जी की याद आयी तो आज वह सैनी की बहू उषा के पास
सुबह-सुबह ही पहुँच गई थी।
''अरे मालती कैसे? क्यों क्या हुआ?'' उषा ने बड़ी सहजता से पूछा
था।
''नहीं कुछ खास तो नहीं, …बस वो जीवन बीमा के पैसे नहीं मिल पा रहे।''
धीरे से उसने कहा था।
उषा मालती की पक्की सहेली थी। वह समझ गई कि मालती को पैसे की सख्त
ज़रूरत है। अन्यथा वह इस तरह से नहीं पूछती। यह भी अजीब पीड़ा है।
आप मरने वाले का दुःख कब तक मनाओगे। अपने और बच्चों के पेट की
ज्वाला को शांत करना ही पड़ता है। उसके लिए पैसा चाहिए। पैसे पेड़
में तो लगते नहीं। उन पैसों को एकत्र करने के लिए आपको सारी भावनाएं
एक तरफ़ रखनी पड़ती हैं। आप मरने वाले का दुःख मनाने की जगह, उस मौत
से मिलने वाले पैसे के लिए खुद को तैयार कर लेते हैं। यह विधि का
विधान नहीं, समाज की पीड़ा है। बीमा जीवन का नहीं, मौत का होता है।
यह जीवन का सौदा है।
''तू चिंता न कर, मैं अभी बात करती हूँ।'' उषा ने समझदारी दिखाते
हुए अपने पति सैनी को सब कुछ बताया था। उषा के ससुर बड़े सैनी भी
सुन रहे थे।
''आज ही चला जा बेवकूफ एलआईसी के दफ्तर, सारी बात करके आना। आज ही
जा और सारे कागज लेकर जाना।''
बड़े सैनी का फरमान जारी हो गया था। छोटा सैनी यूं भी समझदार और
तेज़-तर्रार था। अपनी बातों को मज़बूती से बोलने के साथ-साथ ताकतवर
और समय पडऩे पर बदमाशी करने को भी तैयार रहता। जीवन बीमा ऑफिस
पहुंचने के बाद ही उसे पता चला कि यह अरली क्लेम का केस है और
निरीक्षक मोहल्ले में दो बार घूम गया है। मगर कोई यह बताने को
तैयार नहीं था कि मास्टर जी पहले से कहीं बीमार तो नहीं थे। सैनी
का माथा ठनका, मोहल्ले में मास्टर जी का कोई भी दुश्मन नहीं। परंतु
अज्ञानता अपने आप में एक बहुत बड़ी दुश्मन है। किसी को भी यह नहीं
पता था कि किसलिए पूछताछ हो रही है, इसलिए सभी ने डर की वज़ह से या
शायद बिना सोचे-समझे अनभिज्ञता दिखाकर परेशानी को बढ़ा दिया था।
सैनी को कुछ-कुछ बात समझ में आई और वह तुरंत बड़े मैनेजर के पास
पहुँच गया था,
''आप मुझसे सर्टिफिकेट ले लीजिए। मास्टर जी पूरी तरह से स्वस्थ थे।
फिर भी यह सब कैसे हो गया, पता नहीं... भगवान की मर्जी है... शायद
उनका इतना ही समय था।''
''आप कैसे कह सकते हैं?''
''हम कैसे नहीं कह सकते, इसके पहले वह बीमार हुए ही नहीं। मैं उनके
पड़ोस में रहता हूँ।''
''क्या आप स्टैम्प पेपर पर किसी डाक्टर का एफिडेविट दिलवा सकते
हैं?''
सैनी एक मिनट के लिए रुका था और फिर तुरंत कहने लग पड़ा, ''क्यों
नहीं। मैंने उन्हें कभी भी बीमार होते हुए नहीं देखा। ...मगर जब
बीमार ही नहीं हुए तो फिर कौन डाक्टर उनको जानेगा, फिर क्यों और
कैसे लिख कर देगा? ...हाँ, आप उनके स्कूल में भी पूछताछ कर सकते
हैं। क्या उन्होंने कभी भी छुट्टी ली थी?''
मैनेजर को बात ठीक लगी थी और उसने अपने निरीक्षक को स्कूल के
प्रिंसिपल से ही सर्टिफिकेट लेने के लिए कहा था। वापस लौटकर सैनी
ने सब कुछ मालती को बता दिया था।
इन सब मुसीबतों को देखकर मालती कुछ-कुछ समझने लगी थी। स्कूल से
सर्टिफिकेट जारी हो चुका था और कुछ दिनों में ही जीवन बीमा के पैसे
मिलने वाले थे। मालती के लिए इस वक्त इसकी बेहद आवश्यकता थी। उसकी
अवस्था खाने-खाने के लिए मोहताज वाली हो चुकी थी। कर्जा बढ़ता जा
रहा था। तक़रीबन वह रोज़ सीधे सैनी के घर जाने लगी। उषा के बार-बार
ज़ोर देने पर सैनी भी रोज़ एलआईसी ऑफिस चला जाया करता था। और एक दिन
उसे बीमा के पैसे भी मिल गए थे। दो मिनट के लिए मालती को ऐसा लगा
कि जैसे कि उसकी साँसों में साँस आई है। आदमी के मरने की कीमत उसके
जीने का सहारा बन गई थी। परन्तु वह इन भावनाओं व बातों से बेखबर
थी। हाँ, इतने समय में उसने ललन का दूध तक़रीबन आधा कर दिया sssथा।
अब वह एक बार ही लिया करती थी। जिससे दोनों वक्त कम से कम दो कप
चाय बन सके।
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