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58.
लंदन के हेथ्रो अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अदिति आकांक्षा और
अनिरुद्ध के साथ बैठी बोर्डिंग एनाउंसमेंट का इंतज़ार कर रही थी।
मैथ्यू भी साथ था। चारों हिन्दुस्तान जायेंगे यह तो सुनिश्चित था।
सभी प्रोग्राम बना भी रहे थे। मगर इस तरह जल्द ही जाना पड़ेगा किसी
ने भी नहीं सोचा था। वैसे भी इंसान का सोचा हुआ ज़रूरी नहीं कि हो
ही जाए। मगर हर बार उसी के साथ क्यूँ...? न जाने कितनी बार इस हवाई
अड्डे पर इंतज़ार किया है... हर बार अलग-अलग अवस्था में... अचानक
उसकी निगाह भीड़ को चीरने लगी थी। लगा था सभी खामोश हैं। चारों ओर
मौत का सन्नाटा पसर रहा था। नहीं... ये मेरी सोच है और उसकी नज़र
बगल में आकांक्षा तक पहुँची थी। आकांक्षा की आँखों से साफ लग रहा
था कि वह पिछले कई दिनों से सिर्फ रोती रही है। उसकी आँखों में आँसू
खत्म हो चुके थे। अदिति मासी के कंधे पर सिर रखकर बैठी हुई थी।
चेहरे पर दर्द और मस्तिष्क थका हुआ था। कोई इतना दूर भी जा सकता है
कि फिर कभी न मिले...उसे यकीन नहीं हो पा रहा था। जब वो
हिन्दुस्तान छोड़कर इंग्लैंड आई थी तभी लग रहा था कितनी दूर है कैसे
मिलेगी मम्मी-पापा से... मगर अब...? और रह-रह कर रोना आता...। बस।
मैथ्यू बगल से आकांक्षा को बार-बार देख लेता और सिर पर हाथ फेरता
रहता था। अपनों को दुःखी देखकर वो भी दुःखी था। अनिरुद्ध
अव्यवस्थित हो रहा था। कई दिनों की दाढ़ी चेहरे पर कटी हुई फसल के
समान उग आई थी। उसे बेटे होने का फ़र्ज़ अदा करना था। भाई बनकर बहन
को सँभालते-सँभालते खुद टूट चुका था।
अदिति ने एक बार फिर घड़ी की ओर देखा। उसे अपनी जवाबदारी का एहसास
था। जल्द हिन्दुस्तान पहुँचना चाहती थी। वैसे ही लेट जा पा रही थी।
एक तो टिकट वीज़ा का चक्कर था। ऊपर से पापा का समाचार सुनते ही
आकांक्षा की तबीयत ज़्यादा खराब हो गई थी। वह मेंटल शॉक में आ चुकी
थी। कुछ दिन अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। मैथ्यू उन दिनों सारा
दिन अस्पताल में ही रहा था। अदिति यह देखकर खुश और बेफ़िक्र हो गई
थी। आकांक्षा की पसंद ठीक है, बहुत प्यार करता है। जीवनसाथी कोई भी
हो अगर प्यार करने वाला है तो दूसरी चीज़े उतनी महत्वपूर्ण नहीं रह
जाती। और फिर अपने धर्म का हो या विदेशी। मैथ्यू पहली बार जब उससे
मिलने आया था तो उसे मासी शब्द से बहुत परेशानी हुई थी। आकांक्षा
ने उसे आँटी कहने से मना किया था। वह इन संबंधों के बंधन को समझ ही
नहीं पाया था। मासी इज़ नॉट मदर, बट लाइक मदर... मासी माँ तो नहीं
होती हाँ माँ जैसी होती है। जो चीज़ ख़्वाब में न सोची हो उसे समझ
पाना बहुत मुश्किल था। और वह आकांक्षा को अक्सर छेड़ते हुए मज़ाक
में कहता था,
''...ज़रूर तुम्हारे पिताजी की सेकंड वाइफ होंगी।''
एक बार तो आकांक्षा ने डाँट कर कहा था,
''नो।''
आकांक्षा घर आकर सब बताती थी। अदिति सुनकर हँसी थी। जब पहली बार
मैथ्यू घर आया तो उसके मन में बहुत डर था। आकांक्षा ने कह रखा था
मासी का फैसला ही अंतिम होगा। मगर आते ही अदिति मासी के प्यार में
वह मिनटों में ही घुल मिल गया था। मासी के प्यार को उसने पहली बार
देखा और महसूस किया था। बिना नाम का संबंध और बिना बात के बंधन को
देखकर आश्चर्यचकित हो रहा था। कुछ मिनटों में ही प्यार और अपनेपन
का जो रसास्वादन उसने किया, पी कर झूम उठा था। मैथ्यू ने भी अदिति
के जाते-जाते चरण स्पर्श करके उसका दिल जीत लिया था। शादी के पहले
अदिति ने थोड़ी रोक लगा रखी थी। समझाया था शादी के बाद नवीनता होनी
चाहिए। दोनों समझदार थे। शादी तक इंतज़ार कर सकते थे। अदिति चाहती
थी कि वह दोनों को अमित से एक बार ज़रूर मिलवा दें। मगर अब एक ई-मेल
के बाद से ही सब कुछ बदल चुका था। हिन्दुस्तान फ़ोन करके सुनिश्चित
होने पर बच्चों की दुनिया ही खत्म हो चुकी थी।
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