Set as Homepage | Add to favorites



 

     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

.
 


57.

''तुम लोग तो दिल्ली में रहकर भी मिलते ही नहीं। मैंने सोचा आज इसी बहाने से मैं ही मिल आता हूँ। मैं अपने कालेज के गोल्डन जुबली फंक्शन के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा हूँ। ...और कैसी कट रही है?''
विक्रम, श्याम और राधिका से मिलने उनके घर गया हुआ था। राधिका का मिलने का बिल्कुल मन नहीं था, श्याम भी ठंडे मन से मिल रहा था। घर आए मेहमान को जबरदस्ती भगाया भी नहीं जा सकता। श्याम और राधिका दिल्ली में रहते हुए विक्रम के बारे में सब जानते तो थे सुनते भी रहते थे। मगर उससे मिलने की कोशिश करना तो दूर उसके लिए अनजान ही बने रहते थे।
श्याम ने बड़े साधारण रूप में बस इतना ही जवाब दिया था,
''बस यार टाइम ही नहीं मिलता। तुम सुनाओ, तुम्हारी कैसी कट रही है?''
''बहुत बढ़िया, कोई टेंशन नहीं है। ज़िंदगी में मस्ती ही मस्ती है।''
राधिका ने बेमन से चाय और नाश्ता परोसा था।
''और बैच में किस-किस से बात होती है?''
विक्रम बात आगे बढ़ाने की कोशिश में था। श्याम इस सवाल का मतलब समझता था। विक्रम का इशारा अमित और निकिता से था।
''बस होती रहती है कई लोगों से।'' रूखा-सा जवाब दिया था श्याम ने।
''और कितने बच्चे हैं?''
राधिका ने यूँ ही पूछ लिया तो विक्रम हँसकर जवाब देने लगा,
''मैं बंधकर नहीं रह सकता, जीवन जीना चाहता हूँ। अभी पूरी तरह से सैटल नहीं हुआ हूँ। जीवन का आनंद और मस्ती ले रहा हूँ। बच्चे के बारे में तो सोचा ही नहीं।''
श्याम जानता था कि विक्रम की तीन शादियाँ अब तक असफल हो चुकी हैं। एक को विक्रम ने छोड़ा था तो दो उसे छोड़ चुकी थीं।
''विक्रम तुम्हें सब कुछ मिला होगा, लेकिन प्यार नहीं। और वह तुम्हें मिल भी नहीं सकता। प्यार के लिए बंधन ज़रूरी है। जिसमें तुम बँधना नहीं चाहते।''
कहकर राधिका तेज़ी से अंदर कमरे में चली गई थी और फिर विक्रम आगे कोई बात नहीं कर पाया था। जल्द ही उसने श्याम से विदा ली थी।
जबलपुर मेडिकल कालेज में 2004-05 गोल्डन जुबली वर्ष था। इतिहास के पन्नों को खंगालें तो पता चलेगा कि 1995 में कालेज की नींव पड़ी थी। उधर, अमित भी स्वर्ण जयंती के विभिन्न कार्यक्रम की तैयारी के सिलसिले में कालेज पुनः आने-जाने लगा था। बहुत अधिक सक्रियता से उसका योगदान तो नहीं रह पाता था। मगर बहुत-सी नयी बातों की जानकारी से उसकी दिलचस्पी बढ़ी थी। कालेज की पुरानी और नयी-नयी बातें जानकर उसे बेहद आश्चर्य और खुशी होती थी। कुछ-कुछ बातें उसे बड़ी रोचक भी लगती थीं। घर आकर वह निकिता को भी अक्सर बताया करता था। निकिता के मन में भी कौतूहलता रहती थी। राधिका, श्याम और राजेश सभी ने सपरिवार आने का कार्यक्रम बनाया था। परंतु अदिति बच्चों के कारण लंदन से आने में असमर्थ थी।
अमित को यह जानकर बेहद आश्चर्य हुआ था कि शुरू-शुरू में सिर्फ पच्चीस छात्रों से यह कालेज शासकीय विज्ञान महाविद्यालय (साइंस कालेज) पचपेड़ी जबलपुर में शुरू हुआ था। क्लीनिकल की पढ़ाई सेठ गोविंद दास अस्पताल में होती थी, जो की पहले विक्टोरिया हॉस्पिटल के नाम से मशहूर था। इतनी जानकारी तो उसे कालेज में पढ़ने के दौरान भी नहीं थी। यह जानकर तो उसे बड़ा गर्व हुआ था कि उसके कालेज के भवन की नींव का पत्थर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों 1959 में रखा गया था। कालेज की इमारत आगे पाँच वर्षों में बनकर तैयार हो पाई थी। इन पचास वर्षों में कालेज ने बहुत तरक्की की थी। और आज 750 अंडर ग्रेजुएट और 150 ग्रेजुएट छात्रों को सत्रह विभिन्न विभागों में प्रतिवर्ष डिग्रियाँ मिलती थीं। बीच के वर्षों से पैरामेडिकल के क्षेत्र में भी दो डिग्री, दो सर्टिफिकेट के कोर्स एवं छह डिप्लोमा के कोर्स प्रारंभ कर दिये गये थे। ...निकिता इन सब बातों को ग़ौर से सुनती थी।
हर तरफ़ कालेज में ज़ोर-शोर से तैयारियाँ चल रही थीं। उसके ज़माने का मेडिकल कालेज जबलपुर अब 1997 से नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कालेज के नाम से जाना जाने लगा था। उसके समय के कुछ प्रोफेसर आज भी थे तो कुछ रिटायर होने के बाद भी परामर्शदाता के रूप में कालेज से जुड़े थे। सभी पुराने डाक्टर उससे मिलकर अत्यंत खुश हुए थे। पुराने दोस्तों से भी मुलाकातें और टेलीफ़ोन पर बातचीत हो रही थी। विदेशों में बसे डाक्टरों से इंटरनेट पर चर्चा हो जाती थी।
अमित को कालेज के दिन याद आने लगे थे। श्याम के साथ शुरू-शुरू में हॉस्टल में कई बार रुका था। पहले वर्ष में रैगिंग भी इन्हीं हॉस्टलों में हुई थी। तक्षशिला, रॉयल और प्रिंस हॉस्टल में घूम-घूम कर उसने अपनी यादों को ताज़ा किया था। हॉस्टल की इमारत की हालत खस्ता हो चुकी थी। उनके रंग-रोगन एवं मरम्मत कराने की वृहद योजना बनी थी। जिसे एक वर्ष में पूरा होना था। गर्ल्स हॉस्टल जाते ही उसकी यादों ने उसे सपनों के महल में पहुँचा दिया था। व़क्त सब कुछ बदल देता है। निकिता का खूबसूरत चेहरा, चंचल आँखें उसके सामने से गुज़र रही थीं।
स्वतंत्र (आटोनॉमस) संस्था बनने के बाद कालेज में और भी परिवर्तन आए थे। नयी-नयी मशीनों का जाल, नये लैब, नये विभाग बनाये गये थे। नया आईसीयू, सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ कुछ वर्षों पहले ही बनाया गया था। जो अति आधुनिक था। सभी आठों बड़े ऑपरेशन रूम का नवीनीकरण हुआ था और अब डीन ऑफिस को बेहतर किया जा रहा था। रंग-रोगन का काम ज़ोर-शोर से था।
प्रमुख कमेटी की मुख्य मीटिंग के लिए अमित को कालेज जाना था। उस दिन निकिता को भी साथ ले गया था। पहले से काफी बेहतर हो गई थी। शांत चेहरे के पीछे अब शांत दिमाग़ भी था। लगता था जीवन के सत्य से थोड़ा-थोड़ा जुड़ गई थी। जाते समय, रास्तेभर नवदुर्गा की सजावट को देखती रही। पहुँचकर कालेज के सामने घंटों खड़ी रही थी। फिर हॉस्टल के पास घूमती रही। वापस लौटने पर उसके चेहरे पर खामोशी थी। वापसी में कार में बैठे-बैठे उसने बिना अमित को देखे, धीरे से कहा था,
''यह जीवन तो बेकार गया। शायद मेरी ही ग़लती थी।''
चेहरे की खामोशी उदासी में बदल रही थी। जीवन में अपनी ग़लतियों को स्वीकार करने में ही जीवन की सत्यता है। अमित को लगा कि निकिता का यह कहना इस बात का सूचक हो सकता है कि वह अब काफी हद तक ठीक हो चुकी है। रात हो चुकी थी। घर पहुँचने से पहले उसी उदासी को चीरते हुए निकिता ने फिर धीरे से कहा था,
''विक्रम सभी से सही कहता था, सब मुझ पर ठीक ही हँसते थे।''
अमित को लगा कि जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं था। जो सुना वह सत्य नहीं। और उसने अनसुना करने की कोशिश की थी। वह निकिता की बातों से आहत तो होता था मगर सहन कर जाता था। घर पहुँचते ही निकिता ने बिना कपड़े बदले बिस्तर पर लेटते हुए उसे खामोशी से पहले घूरा था, फिर शून्य में देखते हुए कहने लगी,
''...तुम्हीं ने मेरे बच्चे को मारा था। ...मुझे पाने के लिए विक्रम को दूर किया। ...अगर तुम नहीं आते तो विक्रम नहीं जाता। ...तुम आए ही क्यों?''
नाइट सूट पहनकर अमित बिस्तर पर लेट चुका था। उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। इस तरह के विचार निकिता के दिलोदिमाग़ पर कहाँ से, कैसे और क्यूँ आये? कब से आ रहे हैं? इसका अंदाज़ वह कुछ-कुछ लगाने की कोशिश कर रहा था। क्या वह इसलिए मेरा हाथ धुलवाती थी? हो सकता है प्यार न करती हो, मगर क्या उसे सहारे के रूप में भी नहीं देखती थी? चलो यह भी मान लेते हैं तो क्या फिर वह उसे, उसके होने वाले बच्चे का... कातिल समझती है?
आख़िरी शब्दों ने दिलोदिमाग़ को बुरी तरह ज़ख़्मी कर दिया था। सदमे में वह भूल गया कि निकिता मानसिक रूप से बीमार है और उसके विचारों में विकृति है। वह आज पूर्ण रूप से हार चुका था। दूसरी तरफ़ मुँह करके बिस्तर पर पहली बार लेटा था। सामने एक दीवार थी। जिसके आगे कुछ नहीं था। कब उसकी आँखें बंद हुई, पता ही नहीं चला।



 

 


1  2   3   4   5   6   7   8   9   10   11   12   13   14   15   16   17   18   19   20   21   22   23   24   25   26   27   28   29   30   31   32   33   34   35   36   37   38   39   40   41   42   43   44   45   46   47   48   49   50   51   52   53   54   55   56   57   58   59  
 

Copyright © 2008-15 ManojSingh.com All rights reserved.