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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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56.

अनिरुद्ध को रात में अक्सर डर लगने लगा था। हॉस्टल की सीढ़ियों पर उसे लगता कि कोई उसका पीछा कर रहा है। ट्‌यूब रेल में, बस में, अक्सर उसे लगता कि कोई उसे अपने साये में समेटना चाहता है। रास्ते में पुलिस वाला मिलता तो लगता कि उससे कोई ग़लत काम हो गया है और अब पुलिस वाला उसको पकड़ लेगा। हर बात में भय सताने लगा था। वहम और शक दिल में घर कर गए थे। आत्मविश्वास की कमी हो रही थी। नकारात्मक सोच हावी होने लगी थी। एक रात हॉस्टल के कमरे में अचानक परेशान क्या हुआ कि डर के मारे रातभर सो न सका। घड़ी की आवाज़ भी शांति में उसको अशांत कर रही थी। कभी बिस्तर पर लेटता, कभी ज़मीन पर मुँह छुपाकर दीवार के सहारे बैठ जाता। बाथरूम तक जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। चेहरे पर पसीने की धारा गालों को चीरती हुई कंपकंपाते होंठों तक पहुँच जाती। अंत में हारकर बेचैनी में उसने सुबह-सुबह पाँच बजे मासी को फ़ोन कर दिया था। आकांक्षा ने फ़ोन उठाया तो अनिरुद्ध घबराते हुए बोल रहा था, ''मासी से बात करनी है।''
''क्यूँ? पहले मुझसे बात नहीं करेगा।''
''आ हाँ हाँ!!'' अनिरुद्ध डरा हुआ लग रहा था।
''क्या हुआ?''
आकांक्षा सुनकर एकदम से परेशान हो गई थी। आवाज़ सुनकर अदिति भी उठ गई थी। फ़ोन झट से अपने हाथ में लेकर कहने लगी,
''क्या बात है बेटा?''
''मासी डर लग रहा है, जल्दी आ जाओ।'' अनिरुद्ध घबराया हुआ था।
''मगर हुआ क्या?'' अदिति भी घबरा गई थी।
अनिरुद्ध रोने लगा था। थोड़ी देर बाद बस इतना कह पाया,
''मुझे रात को डर लगने लगा है ...मुझे कुछ हो जायेगा।''
''मैं अभी तेरे पास आती हूँ बेटा, तू चिंता मत करना।''
अदिति ने बिना व़क्त गँवाए, कपड़े बदले थे और आकांक्षा को बाद में ट्‌यूब रेल से आने का बोलकर, कार से ही लंदन रवाना हो गई थी। अक्सर वह ट्रेन या बस से ही लंदन जाया करती थी। ट्रेन से सीधे पेडिग्टंन के एक घंटे और बर्मिंघम के एक घंटे पंद्रह मिनट लगते थे। ट्रेन सर्विस बढ़िया थी फिर रास्ते में ट्रैफिक जाम का भी चक्कर नहीं होता था। बस भी बहुत चलती थी मगर समय थोड़ा ज़्यादा लग जाता था। बर्मिंघम के 1 घंटा 45 मिनट तक लग जाते थे। बस और ट्रेन का टाइम पूछने में वह समय नहीं खराब करना चाहती थी। उसके लिए एक एक मिनट कीमती था। ऑक्सफोर्ड सिटी सेंटर क्रास करने पर एम-40 मोटरवे पर आते ही उसे खुली सड़क मिल गई थी। लंदन कार से वह कम ही जाती थी। मगर रास्ते का उसे ज्ञान था। उसने सोच रखा था कि लंदन पहुँचकर एम-40 रोड पर वह मुड़ जाएगी।
एम-40 मोटरवे पर सुबह ट्रैफिक कम था। खुले रास्ते में दिमाग़ एक बार फिर क्रियाशील हुआ था और वह सोचने लगी थी... कहीं निकिता वाली बीमारी अनिरुद्ध को भी तो नहीं? इस सवाल के आते ही एक्सीलेटर पर पैर का दबाव अचानक बढ़ गया था। गाड़ी की गति अनियंत्रित हो पाती उसने अपने विचारों पर एक ज़ोरदार... 'नहीं' कहकर रोक लगाई थी। और फिर संयमित होकर सोचने लगी कि वह ऐसा नहीं होने देगी। इसके बावजूद आज उसने कई जगह स्पीड की सीमा को क्रास किया था। यही कारण था जो आज वह साधारणतः लगने वाले समय से पहले ही पहुँच गई थी। हॉस्टल पहुँचते ही उसने दौड़ते हुए सीढ़ियों को लांघा था और बड़ी तेज़ी से अनिरुद्ध के कमरे में पहुँचकर उसे सीने से लगाया। बहुत देर तक वो उसे प्यार करती रही थी। कभी माथे को प्यार से चूमती, नहीं तो सिर पर हाथ तो लगातार सहलाने की मुद्रा में चल रहे थे। अनिरुद्ध जब कुछ ठीक-सा महसूस करने लगा तो उसे अपने पास बैठाकर उससे बात करने लगी थी। बहुत देर बाद ही वह जान पाई थी कि बचपन में भी परीक्षा में उसे सदैव अविश्वास रहता था कि उसने अपना रोल नंबर ठीक से लिखा है या नहीं।
अदिति डाक्टर थी। अमित की परेशानियों को देखते हुए मानसिक बीमारी के बारे में पढ़ती रहती थी। अनिरुद्ध की सारी बातें सुनने के बाद उसे यह सुनिश्चित करने में ज़रा भी व़क्त नहीं लगा कि यह साइकॉइट्रिक मेंटल डिसऑडर का आरंभ है। और वह एकदम से चिंता में आ गई थी। मगर उसने कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया था। पीछे से आकांक्षा जब तक पहुँचती उसने कमरे को व्यवस्थित किया था और फिर यूँ बर्ताव करने लगी कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
अदिति ने सर्वप्रथम अपने को संभाला था और फिर धीरे-धीरे आकांक्षा को विश्वास में लेकर उससे चर्चा की थी। वह जानती थी कि आकांक्षा इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। मगर आशा के विपरीत आकांक्षा ने कुछ मिनट में ही अपने आप को संभालकर अनिरुद्ध को इस बीमारी से किसी भी तरह निकालने की इच्छा ज़ाहिर की थी। अदिति ने कुछ दिनों में ही डाक्टर से विस्तारपूर्वक परामर्श लिया था। और फिर दोनों ऑक्सफोर्ड से लंदन ही शिफ्ट हो गये थे। अनिरुद्ध हॉस्टल से घर बुलवा लिया गया था। बिना उसके साथ ज़्यादा बातचीत किए उसे सदैव काम में उलझाए रखा जाता था। दिनभर उसे सकारात्मक वातावरण दिया जाता और आत्मविश्वास को बढ़ाने की कोशिश की जाती। साथ ही हक़ीक़त का सामना करने की हिम्मत भी दी जाती थी। अदिति उसे एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ती। उसकी पसंद और नापसंद का पूरा ध्यान रखा जाता। रोज़ सुबह-शाम लंबी दौड़, छुट्टियों में या तो लाँग ड्राइव या कोई न कोई खेल या पिक्चर। घर में हमेशा उत्सव का माहौल रखा जाने लगा था। अदिति किसी ग़लत बात पर अनिरुद्ध को डाँट भी लगा देती थी मगर फिर उतना ही प्यार भी किया जाता। नकारात्मक सोच को पनपने नहीं देना था।
आकांक्षा तो अपने भाई को अकेलापन महसूस ही नहीं होने देती थी। अदिति शाम को अनिरुद्ध के कालेज से आने के बाद उससे अक्सर घंटों बात करती। सदैव उसके साथ दोस्त के रूप में ही पेश आती। अदिति ने शुरू-शुरू में नौकरी से कुछ दिनों के लिए छुट्टी ले ली थी। आकांक्षा लंदन से ही आना-जाना करती थी।
अनिरुद्ध को आकांक्षा और अदिति का साथ आनंददायक एवं रोचक लगने लगा था। सदैव उत्साह में कुछ करने के लिए तैयार, वो डर अब उसके मन में पनप नहीं पा रहा था। उसके आत्मविश्वास ने नकारात्मक सोच को दबाते हुए उस पर विजय प्राप्त कर ली थी। वह धीरे-धीरे सत्य को पहचानने लगा था और जीवन की हक़ीक़त का सामना करने के लिए तैयार था। अदिति ने इस बात का ज़िक्र आकांक्षा के अलावा किसी से भी नहीं किया था। यहाँ तक कि अमित और खुद अनिरुद्ध से भी नहीं। इसीलिए हिन्दुस्तान जाने पर अमित के पूछने पर वह चुप होकर अनिरुद्ध के लिए कुछ विशेष नहीं बोल पाई थी।
अनि के साथ सदैव बातचीत करते हुए, बहुत नज़दीक से हमेशा उस पर नज़र रखी जाती। जब अनिरुद्ध कालेज जाता तब अदिति लंदन के साइकेट्रिरक इंस्टिच्यूट में जाकर वरिष्ठ डाक्टरों से परामर्श लेती थी। कई तरीक़े के सॉइकोथेरेपी की विस्तृत जानकारी इकट्ठी कर ली थी। टॉकिंग थेरेपी, बिहेवियर थेरेपी के साथ-साथ सॉइको डायनामिक थेरेपी को उसने अमल में लाना शुरू कर दिया था। योग विद्या एवं योगासन की भी बारीकियों को समझकर सुबह-सुबह मेडिटेशन करने के लिए अनिरुद्ध को प्रेरित किया जाता। अक्सर तीनों योगासन भी साथ-साथ करते थे। अदिति के दिल में विचार आता कि अगर वह डाक्टर होते हुए भी अपने बेटे को ठीक नहीं कर पायी तो सब व्यर्थ है। ईश्वर पर उसे बहुत अधिक विश्वास नहीं था। मगर इस दौरान उसने उसका लाख-लाख शुक्रिया सैकड़ों बार किया था कि शुरुआती दौर में ही उसे अनिरुद्ध की बीमारी का ज्ञान हो गया और बीमारी बढ़ने से बच गयी। और अंत में उसकी मेहनत रंग लायी थी। अनिरुद्ध थोड़े दिनों में ही पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया था।
अनिरुद्ध को अपनी मासी और बहन पर गर्व और उनसे बेहद प्यार था। वह स्वयं भी अब तक स्वीकार कर चुका था कि वह एक बेहद संकीर्ण और अँधेरे रास्ते में जाने से बच गया था। मगर उस रास्ते के मोड़ को उसने देखा ज़रूर था। उसकी आँखों में उस बात की चिंता ज़रूर उभरती मगर मस्तिष्क एवं इच्छाशक्ति ने उस पर काबू पा लिया था। मासी के कहने पर मेडिटेशन उसकी रोज़ की दिनचर्या में शामिल हो चुका था। योग करने से उसके शरीर का स्वास्थ्य उत्तम रहता था। जीवन को सदैव आनंद और सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की सोच उसने मासी से सीखी थी। जीवन की सत्यता को स्वीकार किया था, हारने का गम नहीं और दूसरे की सफलता से ईर्ष्या नहीं। जीवन जीने के लिए है काटने के लिए नहीं। जैसा भी मिले उसे स्वीकार करना है। इन सब दौर के गुज़र जाने के बाद, उसे अपनी माँ की बीमारी एवं रोग का एहसास हो गया था। अब उसे अपनी माँ पर दया एवं पिता पर प्यार और गर्व था।
अदिति अनिरुद्ध के कालेज के कई वरिष्ठ प्रोफेसर को जानती थी। उनसे भी सदैव अनिरुद्ध के लिए चर्चा करती रहती थी। बाद में उसने उसी कालेज के हॉस्पिटल में जॉब भी ज्वाइन कर ली थी। उधर, घर पर भी अनिरुद्ध को अकेले कम ही छोड़ा जाता।
एक दिन हिन्दुस्तान से आने के बाद अनि ने स्वयं अदिति से बात करके कहा था,
''मैं साइकॉलॉजी एवं सॉइकॉइट्रिस्ट विभाग में साइकोथेरेपी में आगे स्पेशिलिस्ट कोर्स करना चाहता हूँ। मुझे खुशी होगी कि मैं इस क्षेत्र में कुछ कर पाऊँ। मुझे अपने स्वयं के अनुभव से फायदा होगा। मैं रोगी को बेहतर तरीक़े से समझ सकूँगा और उनके रोग का शायद इस तरह से बेहतर निदान कर पाऊँ।''
अदिति को सुनकर बेहद खुशी हुई थी। अनिरुद्ध के आत्मविश्वास को वह बढ़ाना चाहती थी। इसमें उसे कोई भी बुराई नहीं दिखाई दी थी। अँधेरे में रहा हुआ अँधेरे को अच्छी तरह से समझ सकता है और उसे आसानी से दूर भी कर सकता है। और अनिरुद्ध उजाले में आ चुका था।




 

 


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