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55.
कई जगह अमित ने आकांक्षा की शादी की बात की थी। इंटरनेट पर भी
ढूँढ़ता रहता था। कई जगह बात चली तो थी मगर बन नहीं पाई थी। कहीं
लड़का पसंद नहीं आता तो कहीं लड़के का खानदान। कहीं अगर सब अच्छा होता
तो लड़के वालों को कुछ बात पसंद नहीं आती। कोई रिश्तेदार संबंधी था
नहीं। आज के युग में अरेंज मैरिज़ कितनी मुश्किल है। चाहे लड़के की
हो या लड़की की। वर्तमान समाज में, न तो हम पूरे आधुनिक हो पाये और
न ही पूरे प्राचीन सभ्यता से जुड़े रहे। फिर माँ-बाप को भी पसंद हो
और लड़का-लड़की भी आपस में एक-दूसरे को पसंद करें, ऐसा हो पाना थोड़ा
मुश्किल है। फिर लड़की का मामला था, अमित ज़माने के चाल-चलन से
चिंतित रहता था। लड़की उसकी भोली है। कई जगह बात बनने की हालत में
पहुँची तो निकिता की बीमारी ने लोगों को पीछे कर दिया था। अमित
बहुत परेशान रहने लगा था। बहुत नाराज़गी थी उसे समाज से। समाज ने
परेशानियाँ तो पैदा कर दीं मगर उसके हल नहीं ढूँढ़े। शायद अदिति
ठीक ही कहती थी। आख़िर बीमार माँ-बाप के बच्चे कहाँ जायेंगे? वैसे
तो समाज बड़ा विकसित होने का दावा करता है मगर उसकी सोच ने विकास
नहीं किया।
एक परिवार को आकांक्षा की फोटो पसंद आई थी। लड़का बहुराष्ट्रीय कंपनी
में था। इंग्लैंड बेस्ड कंपनी थी। अमित खुश था। निकिता के बारे में
पहले ही उसने थोड़ा बता दिया था। लड़के वालों ने अपने सोच की
विशालता का प्रदर्शन किया था। और शादी के लिए हामी भर दी थी।
एक बार लड़के की माँ ने अचानक घर फ़ोन किया तो अमित घर पर नहीं था।
फ़ोन निकिता ने ही उठाया था। अपनी तरफ़ से ही बोलना शुरू किया तो फिर
रुकी नहीं,
''...आकांक्षा मेरी लड़की नहीं है। ...अगर यकीन न हो तो हमारे कालेज
में जाकर पूछ लो...''
लड़के की माँ ने बात को संभालते हुए टेलीफ़ोन बंद करने की बहुत
कोशिश की मगर निकिता आत्मविश्वास से निरंतर बोलती रही। एक ही झूठ
को कई बार कहा जाए तो सामने वाला भी सोचने पर मजबूर हो जाता है। और
कुछ नहीं तो शक की गुंजाइश से इंकार नहीं किया जा सकता। लड़के के
घर वालों ने न का अंतिम निर्णय ले लिया था। जब तक बात अमित को पता
चलती स्थिति बिगड़ चुकी थी। उसने लड़के और उसके माँ-बाप को बहुत
समझाने की कोशिश की, निकिता की बीमारी का हवाला दिया, मगर वो नहीं
माने। लड़के के पिता ने यह बोलकर पूर्णविराम लगा दिया था,
''मक्खी देखकर दूध नहीं पिया जा सकता। जहाँ लड़की की माँ ही ऐसे
विचार रखती हो तो फिर क्या पूछना।''
अमित अपना सिर पीटकर रह गया था। और बाद में, पहली बार निकिता से
खूब लड़ा था,
''...तुम्हारी लड़की नहीं है मान लिया, मगर मेरी तो है। ख़बरदार जो
आइंदा कुछ भी कहा तो।''
निकिता चुपचाप बच्चों के जैसे सुनती रही थी। मगर आँखें कहीं न कहीं
खुश होने का इज़हार करने से नहीं चूक रही थीं। तुनक कर बहुत देर बाद
बुदबुदाती रही,
''...तुम्हारे जैसी दिखती है, ...तुम्हारी ही तो लड़की है, ...मेरी
कहाँ है?''
सुनते ही अमित सिर पकड़कर बैठ गया था। क्या जीवन के इस क्षेत्र में
भी वह हार जाएगा? जवाब नहीं था उसके पास। अमित ने सारी बात अदिति
को मेल में भेजी थी। अदिति ने चिंता करने के लिए मना किया था।
अदिति ने हिन्दुस्तान से आने के कुछ दिनों बाद आकांक्षा से शादी के
संदर्भ में बात की थी। किसी पुरुष मित्र के होने की संभावना के बारे
में भी पूछताछ की थी। '...अगर कोई हो तो बता दे' ...मासी की तरफ़ से
खुला निमंत्रण था। मगर आकांक्षा ने ऐसी किसी भी बात से साफ़-साफ़
इंकार किया था। यहाँ तक कि सबसे नज़दीकी मित्र मैथ्यू के लिए भी उसने
ऐसे किसी बात के लिए मना किया था। मैथ्यू ब्रिटिश छात्र था आकांक्षा
का सबसे अच्छा दोस्त। जितना सुना और देखा उसके हिसाब से समझदार और
परिपक्व, पढ़ने में होशियार, संवेदनशील। अदिति के कई बार कुरेदने पर
भी आकांक्षा ने प्यार जैसी किसी भी बात से साफ़ मना किया था। अदिति
ने थोड़ा ज़ोर देकर पूछा तो कुछ पल के लिए आकांक्षा झुँझलाई थी और
फिर बड़ी विरक्तिपूर्ण भाव से शादी के लिए इंकार करने लगी। सुनकर
अदिति ने उस रात उसे बहुत प्यार से समझाया था।
''स्त्री-पुरुष का संबंध... जिसका सामाजिक नाम है शादी, ...जीवन और
प्रकृति का सत्य है। इसके बिना जीवन ही अधूरा है। समाज और परिवार
की बुनियाद इसी बंधन की डोर पर टिकी है। स्वतंत्रता में उमंग हो
सकती है पर जीवन का रस, आनंद बंधन में ही है। बिना बंधन और त्याग
के प्यार, प्यार नहीं, वासना होती है...''
अदिति की बात आकांक्षा ने चुपचाप सुनी थी,
''...पढ़ाई-लिखाई ज़रूरी है, नौकरी, करिअर सब ठीक है मगर किसी कीमत
पर नहीं। अगर जीवन में खुशी और आनंद ही नहीं तो यह सब बेकार है।
आख़िरकार आप कब तक अपने लिये जियोगे। एक दिन थक जाओगे। किसी और के
लिए जीने का आनंद ही कुछ और है। यह औरत आज समझ नहीं पा रही है। आदमी
की बराबरी करते-करते आदमी तो बन नहीं जाएगी, रहेगी तो औरत ही। अगर
यही सत्य है तो फिर औरत बनकर ही क्यूँ नहीं जिया जाये। फिर आदमी तो
कभी औरत की बराबरी नहीं करता। औरत की संपूर्णता माँ बनने में है।
माँ शब्द की उत्पत्ति ही पीड़ा से हुई है। पीड़ा को सहना सिर्फ औरत
के बस में है। औरत परिवार और समाज की धुरी है, केन्द्र है। फिर वह
धुरी छोड़कर खुद घूमने निकल जाये यह सरासर बेवकूफी होगी। हाँ, इस
धुरी को मज़बूत और स्थायी होना चाहिए। नहीं तो परिवार का संतुलन और
समाज में सामंजस्य खत्म हो जायेगा। वैसे भी उसकी महानता और
प्राकृतिक व्यवहार प्यार देने में है, लेने में नहीं। देने वाला
सदैव ऊपर होता है। हाँ, अगर उसके प्यार को कोई तिरस्कृत करे तो फिर
उसका जवाब देना उसे आना चाहिए। पढ़ना-लिखना इसलिए ज़रूरी है। जीवन के
छोटे-छोटे सिद्धांत है, प्रकृति के अपने नियम हैं उसके बाहर जाना
बुद्धिमानी नहीं। आदमी प्यार का भूखा होता है और औरत का काम है उस
प्यास को बुझाना। औरत प्यार दे तो क्या मज़ाल कि आदमी उसके बंधन को
तोड़ दे। अब देखो, तुमने अपने प्यार के बंधन में सब को बाँध रखा
है। तुम एक अच्छी बेटी और बहन तो बन गई, क्या माँ बनने का सुख नहीं
देखना चाहोगी? ...फिर तुम मुझे देखो, अगर तुम दोनों बच्चे नहीं होते
तो मेरे जीवन में क्या था।''
आकांक्षा ने आँखें नीची कर ली थी।
''मैंने जीवन में सब कुछ पाया मगर पत्नी और माँ नहीं बन पायी। जब
तक सोच और समझ पाती तब तक उम्र निकल गई थी।''
''और मैं मासी?''
''तू तो मेरी प्यारी बेटी है।''
''फिर आप भी तो मेरी माँ ही हो।''
आकांक्षा यह कहकर अदिति से लिपट गई थी।
''मैं आपको छोड़कर कभी नहीं जाऊँगी।''
''नहीं, बेटी अपने घर पर खुश रहे सभी माँ-बाप यही चाहते हैं। जब
चाहो मिल सकती हो इस बात की छूट भी है और तुम्हारा हक़ भी।'' और अंत
में आकांक्षा ने अदिति मासी की बातों को स्वीकार कर लिया था।
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