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54.
बच्चों के कहने पर, अमित ने घर पर ही कंप्यूटर लगवा लिया था।
इंटरनेट कनेक्शन लेने से उसे ई-मेल की सुविधा हो गई थी।
अब रोज़ सुबह शाम इंटरनेट पर बच्चों की ख़बर मिल जाती थी। कई बार
निकिता के सामने भी ज़ोर-ज़ोर से बोलकर इंटरनेट खोलता था। निकिता भी
धीरे-धीरे सुनते-सुनते आदी हो चुकी थी। अमित निकिता याहू मेल डॉट
कॉम। जब भी अमित कंप्यूटर पर बैठता निकिता पीछे से कहने लगती, 'टाइप
करो पासवर्ड, ए के आई ए एन आई लव।' अमित तो 'अकि अनि लव' का मतलब
जानता था, मगर निकिता कभी समझ नहीं पाई थी। अन्यथा वह कभी पासवर्ड
ज़ोर-ज़ोर से नहीं बोलती। अमित को बच्चों के बारे में जानकारी मिलने
लगी थी। अदिति भी अलग से सारा विवरण भेजती रहती थी। बच्चों का उसे
बेहद ख़याल था। फिर भी असली पिता को वह सब कुछ बताना अपना फ़र्ज़ समझती
थी। आकांक्षा ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक कालेज से हिस्ट्री
और अंग्रेजी में तीन साल का ग्रेजुएशन कर लिया था। मॉडर्न हिस्ट्री
में आगे पढ़ने का मन बना रही थी। उसे इतिहास पढ़ने में बड़ा आनंद आता
था। भूतकाल के रोचक तथ्य उसकी जिज्ञासा को बढ़ाते थे। उसने अपने
पिता को एक बार लिखा था... मानव ने इतिहास से कभी भी सबक नहीं लिया,
न ही कुछ सीखा और इसीलिए इतिहास बनाता चला गया। इतिहास में सत्य से
दूरी उसे हमेशा तंग करती थी। जीतने वालों ने इतिहास सदैव अपने
दृष्टिकोण से लिखा था। उसे आज तक इस बात का जवाब नहीं मिला था कि
मानव झूठ किससे बोलता है? ...अपने आप से!! ...मगर क्यूँ? ...हर भाषा
का इतिहास और इतिहास का भाषा पर प्रभाव, उसे पढ़ऩा अच्छा लगता था।
भाषा के श्रृंगार और व्याकरण के अनुशासन से वह बहुत प्रभावित थी।
हर भाषा के विकास की अपनी कहानी थी। भाषा जहाँ दूसरी भाषा से लेती
है तो दूसरे को देती भी है, भाषा के सहअस्तित्व का प्रायोजन उसे
सोचने के लिए मजबूर कर देता था। मानव ने इससे सबक क्यूँ नहीं लिया?
वह तो उल्टा अपनी भाषा के वर्चस्व के लिए सदैव लड़ता रहा और लड़ रहा
है।
उसने आगे अपनी दिलचस्पी हिस्ट्री के रिसर्च में दिखाई थी। इंग्लैंड
में इसका काफी प्रचलन है और उपयुक्त वातावरण भी। आकांक्षा ग्रेजुएट
हो चुकी थी। उसने पिताजी से राय माँगी तो अमित ने जवाब देने की जगह
बच्चों से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी। उसका मन नहीं मान रहा था।
बच्चों को देखे हुए वर्षों बीत गये थे। निकिता भी अनिरुद्ध को याद
कर घंटों रोती थी। अमित ने उन्हें ज़िद्द करके बुलाया था। अनिरुद्ध
और आकांक्षा दोनों आए थे, अदिति साथ थी। अनिरुद्ध तो घर पर रुका था
पर आकांक्षा और अदिति होटल में रुके थे। बेटी को पिता ने देखा था,
माँ के समान सुंदर, पहले से ज़्यादा आकर्षक हो गई थी। मगर अमित की
झलक चेहरे पर स्पष्ट आती थी। पर थी अब भी मासूम। तभी तो कहने लगी,
''मासी, पापा अपना ख़याल बिल्कुल भी नहीं रखते हैं। ...देखो न कितने
कमज़ोर हो गये हैं।''
खूब देर तक डाँटती रही थी। शब्दों में क्रोध तो था मगर आवाज़ में
अपनापन झलक रहा था। और फिर आँखें प्रेम प्रदर्शन के लिए आतुर थीं।
अनिरुद्ध और अदिति चुपचाप सुनते रहे थे। बाद में अदिति ने भी अमित
से अकेले में कहा था,
''तुम सही में कमज़ोर हो गये हो। ...अपना ख़याल क्यों नहीं रखते?''
''अब मुझे कोई चिंता नहीं है। तुम हो तो बच्चों की देखभाल करने के
लिए।''
अमित ने मुस्कुरा कर कहा था। और फिर थोड़ी देर मौन रहने के बाद कहने
लगा,
''आकांक्षा बड़ी हो गई है उसकी शादी के लिए बात करनी है। बस
एकमात्र यही मेरी आख़िरी इच्छा रह गई है।''
आवाज़ में गंभीरता थी। अमित के चेहरे के हावभाव को देख अदिति भी
सोचने के लिए मजबूर हुई थी। माहौल में शांति के बीच में भारीपन
तैरने लगा था। और फिर कुछ देर ठहरकर अदिति ने धीरे से कहा था...
''ठीक है, मैं उससे बात करूँगी। तुम भी चाहो तो लड़का ढूँढ़ना शुरू
कर सकते हो।''
''और अनिरुद्ध कैसा है?''
''अब तो काफी ठीक है, नहीं तो...'' अदिति ने अचानक बात का रुख़ बदलने
की कोशिश की थी।
''...नहीं तो क्या?''
अचानक अमित के चेहरे पर चिंताओं की लकीरें और अधिक गहरी हुई थी।
''नहीं कुछ नहीं। असल में पढ़ता ज़्यादा है। सेहत का ध्यान नहीं रखता।
ख़ैर, अब ठीक है।''
अदिति ने बातों को साफ़ ढंग में चतुराई से मोड़ दिया था। उसे अपनी
ज़िम्मेवारी का एहसास था।
पंद्रह दिन कहाँ गुज़र गये पता ही नहीं चला। एक बार आकांक्षा ने देर
रात माँ को सोते हुए दूर से देख लिया था। मिलने की इच्छा को बड़ी
मुश्किल से रोका था। जाने से पहले आकांक्षा अमित से लिपटकर खूब रोई
थी। ज़िद्द करने लगी लंदन आने के लिए। आख़िरी तक कहती रही,
''माँ को भी साथ लाना।''
''ज़रूर आएंगे।''
दूसरी तरफ़ अनिरुद्ध एकदम शांत और गंभीर हो गया था। इस बार उसने माँ
से लड़ाई भी नहीं की थी। अबकी बार उसकी आँखों में माँ के लिए प्यार
और पिता के लिए इज़्ज़त दिखाई दी थी। अमित बेहद खुश था। अदिति का
धन्यवाद कैसे करे समझ ही नहीं पाया। हाँ, किसी की आँखों ने कहा था
तो किसी की आँखों ने समझा था।
बच्चों के जाने के बाद, कुछ दिनों तक अमित और निकिता उदास ही रहे।
मन बहलाने के लिए अमित निकिता के साथ दक्षिण भारत घूमने निकल पड़ा
था। समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरों और विशालता में दोनों घंटों बैठे
रहते थे। निकिता अब एकदम शांत रहने लगी थी। दवाई का असर था। पहले
वाला गुस्सा और तेज़ी के सिमटम धीरे-धीरे खत्म हो रहे थे। नयी दवाइयों
से साइड एफेक्ट भी कम था। मगर जो शरीर खराब हो चुका था, वह और अधिक
उम्र के साथ-साथ टूटता जा रहा था। उधर, अमित पचास में ही बूढ़ा लगने
लगा था। अब एक ही इंतज़ार था, आकांक्षा की शादी का, आँखों में पिता
की चिंता साफ़ झलकती थी।
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