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अमित शायद नौ वर्ष का हो चुका था। थोड़ा-थोड़ा समझदार। अपनी बहन की
परेशानियों से परिचित था। सुप्रिया की शारीरिक सीमाओं की अमित को
बहुत छोटी उम्र से ही आदत-सी थी। वह कभी-कभी दीदी की छोटी-मोटी
परेशानियों में साथ भी दे देता था। मानव का स्वभाव, बचपन से ही
भिन्न-भिन्न होता है। वह विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रता हुआ धीरे-धीरे
अपने व्यवहार को बना लेता है। कुछ-कुछ उसका स्वभाव अपनी परिस्थितियों
के अनुरूप स्वयं भी ढल जाता है। जहाँ एक ओर अमित प्राकृतिक रूप में
बचपन से ही शांत और समझौतावादी था, वहीं सुप्रिया अपनी कमजोरियों
के चलते चिड़चिड़े स्वभाव की थी। फिर इसका एक कारण और था वह हर बात
के लिए किसी न किसी पर निर्भर जो थी। परंतु उसका चिड़चिड़ापन हानि
रहित, किसी के लिए भी परेशानी का कारण नहीं होता था। वह इस परिवार
का अंग थी। फिर जिसे आप दिल से स्वीकार करें, उससे आपको कभी तकलीफ़
नहीं होती।
मास्टर सक्सेना, प्राइमरी स्कूल के अध्यापक ज़रूर थे, परंतु अपनी
छोटी-सी दुनिया में संतुष्ट और खुश थे। मालती सक्सेना ने सुप्रिया
व अमित के अलावा, बाहर की छोड़ो, शायद अपने पति मास्टर सक्सेना जी
से भी खुलकर कभी बात नहीं की थी। उसका जीवन अपने पति और बच्चों के
लिए खाना बनाने से ज़्यादा कुछ नहीं था। सुप्रिया की देखभाल करना
मालती की दिनचर्या में आ चुका था और सुप्रिया दर्जनी मोहल्ले की
लाड़ली थी।
मध्यप्रदेश का पुराना और बड़ा शहर जबलपुर। शहर में भीड़-भाड़ वाला
इलाका, घमापुर। उसमें था एक मोहल्ला, दर्जनी मोहल्ला। पूरे 12 मकान,
ऐसा लगता है इसी कारण से इसका नाम दर्जनी मोहल्ला पड़ा होगा। एक
निम्न मध्यमवर्गीय मोहल्ला। जबलपुर कटनी राष्ट्रीय राजमार्ग के
बार-बार बनने से हाईवे की ऊँचाई तो बढ़ती चली गई, परन्तु हाईवे पर
दाहिनी ओर एक पतली गली से जुड़े हुए, पचास मीटर की दूरी पर बसे इस
मोहल्ले में कोई परिवर्तन नहीं आया था। उलटे, बरसात में पानी ज़्यादा
भरने लगा था। हाइवे के दोनों ओर दुकानें बन जाने के बाद, अन्दर जाने
वाला रास्ता काफी सँकरा हो चुका था। बारह के बारह मकान, सबकी छतें
खपरैल और साथ-साथ आपस में जुड़ी हुई थीं। अगल बगल के हर दो मकानों
के बीच की दीवार एक ही थी। मकान आपस में इतने जुड़े थे कि एक घर
में धीरे से कही गई बात पूरे मोहल्ले में दूसरे दिन आम हो जाती थी।
मोहल्ले की हालत आम दूसरे मोहल्ले से भिन्न नहीं थी। इस मोहल्ले
में हिन्दुस्तान के तक़रीबन हर क्षेत्र व प्रांत से आए हुए लोग रहते
थे। काफी साल, साथ-साथ रहने के बाबजूद भी उनका रहन-सहन अब भी
थोड़ा-थोड़ा अलग था। व्यवहार, आचरण, खानपान यहाँ तक कि बोलचाल में
भी थोड़ा बहुत फर्क महसूस होता था। सबके बीच जो एक सामान्य बात थी,
वह थी सभी का निम्न मध्यमवर्गीय होना। अधिकतर रेलवे या ऑर्डिनेंस
फैक्टरी में कार्य करने वाले चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे।
वर्तमान में नहीं तो कम से कम इनके पूर्वज इन दोनों विभाग से कहीं
न कहीं जुड़े हुए थे। सभी, वर्षों से इसी जगह पर रहते आ रहे थे।
सबसे पहला और किनारे का मकान सुनीता का था। उसका पति एक सेठ की गाड़ी
चलाता था। उसकी सडक़ दुर्घटना में मृत्यु से घर का सारा बोझ सुनीता
पर आ चुका था। सुनीता बड़ी आकर्षक और सुंदर थी। कहते हैं पति के
सेठ की निगाह उस पर पड़ी, मालिक घर से परेशान और दुःखी था। उसे यहाँ
पर एक नया सहारा, कुछ इस रूप में मिला कि वह यहाँ लगातार आने लगा।
सुनीता बदनाम तो बहुत हुई, परन्तु उसे अब कोई फर्क नहीं पड़ता। वह
सरेआम इस बात को कबूल करती है कि वह कम से कम सिर्फ एक से ही जुड़ी
हुई है। धाकड़ थी। दलील देती थी कि क्या हर औरत किसी न किसी मर्द
से नहीं जुड़ी होती। बस शादी के नाम पर उसे समाज ने पति का नाम ही
तो दिया होता है। यह बात अलग है कि सेठ की ब्याही पत्नी ने कई बार
मोहल्ले में आकर काफी बदतमीज़ी करने की कोशिश की थी। परन्तु सुनीता
को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। हाँ, सुनीता ने कभी भी उसकी बातों का कोई
जवाब नहीं दिया था। चुपचाप सदैव मुस्कुराकर सुनती रही। पर सेठ के
लिए उसके दरवाजे सदैव खुले रहते थे। परंतु कोई और उसकी ओर आँखें
उठाता तो लगता था आँखें फोड़ देगी। जब औरत खुल जाये तो अच्छे-अच्छे
मुँह नहीं लगते।
सुनीता के बगल में कमला गुप्ता लगभग 45 वर्ष की काफी तेज़-तर्रार,
हो भी क्यों न, गुप्ता जी जो बहुत सीधे थे। प्रकृति भी अजीब है।
अनोखा जोड़ा बनाती है। इस उम्र में भी सजना, तैयार होना। बड़े बेटे
दोनों शादी लायक, बेटी की शादी हो गई थी। अपने घर जा चुकी थी।
परन्तु कमला की उम्र बढऩे का और शौक कम होने का नाम ही नहीं लेते
थे। मालती के एक तरफ़ कमला गुप्ता थी तो दूसरी ओर गीता, बिल्कुल
सीधी-साधी। परन्तु पति देव शुक्ला साहब थोड़े मनचले। चार बच्चे होने
के बाद भी कोई परिपक्वता नहीं थी। गीता, मालती की बहुत पक्की और
अच्छी सहेली बन गई थी। दोनों के आचार और विचार काफी मिलते थे। काफी
समानता थी दोनों में। गीता के दूसरी ओर अलका अपनी बूढ़ी माँ के साथ
रहती थी। तीन भाई-बहनों को पाल-पोस कर बड़ा किया था, पढ़ाया-लिखाया
था। अपने पैरों पर खड़ा करवाया, सभी की शादी की, परन्तु तब तक खुद
की शादी की उम्र ही निकल गयी। फिर बूढ़ी माँ को कौन देखता। शादी के
बाद हर एक का अपना परिवार होता है, अपनी परेशानियाँ और अपनी दुनिया।
यों तो तीनों भाई-बहन बहुत इज्जत करते, समय-समय पर आते रहते, परन्तु
अब तो अलका को सारी ज़िंदगी अकेले ही काटनी है। हाँ, जब तक माँ ज़िंदा
है तो यह जीने का कारण बना हुआ है। उसके बाद क्या होगा, उसे पता नहीं।
आगे के दो घरों में दक्षिण भारतीय परिवार रहते थे। एक मद्रासी और
एक मलयाली, परन्तु कहलाते दोनों ही मद्रासी थे और उसके बाद खटीक
परिवार। फिर था सैनी परिवार, सैनी परिवार की बहू उषा जो कि सैनी की
बहू के नाम से ही मोहल्ले में जानी जाती थी। वह भी मालती की अच्छी
सहेली थी। मालती, गीता और उषा जब भी मिलते दिल खोलकर बातें करते।
कमला उम्र में बड़ी होने के बाबजूद भी इन लोगों के बीच आकर बैठ जाती
और अपनी धाक चला लिया करती थी। उसकी धाक तीनों सुन भी लिया करती
थीं। कभी-कभी तो मालती कमला की बातों को स्वीकार भी कर लेती थी।
सैनी के परिवार के बाद सोनकर, पटेल और फिर बंगाली परिवार। बंगाली
परिवार ने दुर्गा पूजा शुरू की या नहीं यह तो किसी को पता नहीं,
परन्तु जबलपुर के हर दुर्गा पूजा के समय में इस मोहल्ले की दुर्गा
भी अपनी रौनक बिखेरती थी और उसमें बंगाली परिवार बढ़-चढ़कर हिस्सा
लेता था।
सभी बारह मकान एक से थे। शुरू में छोटा-सा बरामदा फिर एक बड़ा कमरा,
उसके पीछे थोड़ा छोटा कमरा जिसमें सभी ने रसोई भी बनाई हुई थी और
उसके पीछे छोटा-सा आँगन और आँगन के आख़िरी हिस्से में शौचालय। अब तो
सभी ने अपनी-अपनी लैट्रिन बना रखी थी। सुना था पहले तो सभी पीछे,
नाला पार जाते थे, औरतें अंधेरे में और आदमी सुबह के उजाले में। सभी
घरों में मेल-मिलाप तो था पर समय-समय पर टकराव और मोहल्ले की
लड़ाइयाँ बीच सड़क पर भी आ जाती थीं। परन्तु बाहरी हस्तक्षेप होने
पर, किसी भी विपत्ति पर, बारह के बारह परिवार एक साथ खड़े हो जाते
थे। एक साथ मुसीबत का सामना भी करते थे। सब का अपना मिज़ाज, सब के
अपने विचार, सबके अपने तौर-तरीक़े, पर एक अनोखा बंधन। उनकी लड़ाई भी
उनके आपस के संबंधों को बताती थी। वे लड़कर भी एक थे। सुख हो या
दुःख, सभी में वो सब एक थे। अमित के कालेज जाने तक मोहल्ले में, एक
छोर पर, एक ही नगर निगम का नल था। जिसमें सुबह एक घंटे और शाम को
एक घंटे पानी आया करता, पर सभी लोगों को पानी, आपसी तालमेल से
भरपूर प्राप्त हो जाता था।
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