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49.
अनिरुद्ध को आकांक्षा की याद सबसे ज़्यादा सताती थी। घर उसे अब काटने
को दौड़ता था। वह उसकी बहन ही नहीं अच्छी दोस्त भी थी। उसके प्रति
माँ के व्यवहार से वह बहुत दुःखी होता था। दिल के किसी कोने में अब
उसे खुशी भी थी। कम से कम नये वातावरण में खुश तो रहेगी। फिर अदिति
मासी के साथ तो उसे भी बड़ा आनंद आता था। जाते ही आकांक्षा ने
चिट्ठी लिखी थी। खूब बड़ाई की थी अदिति मासी की। परंतु अंत की लाइन
से वह पूर्णतः सहमत नहीं था... 'मैं खुश हूँ, मेरे बारे में चिंता
मत करना।'
'...तुम्हारी बहुत याद आती है।' इन शब्दों में बहुत दर्द था। उसे
भी हर बात पर आकांक्षा की बातें याद आती थीं। अंग्रेजों के ज़माने
के इतने बड़े-बड़े रेलवे के घर उसे भूत बंगले लगते थे। रात को बड़े
से बेडरूम में ऊँची-ऊँची छत को निहारते हुए पागल हो जाता था। माँ
अब अपना अतिरिक्त प्यार दिखाने की कोशिश करती थी मगर उनके हाव-भाव
में स्वाभाविकता न होने से वो अटपटा ही लगता। उसे उलटा माँ का अधिक
ध्यान रखना पड़ता था। हाँ, उन पर अब उसे क्रोध नहीं आता था। फिर वह
आकांक्षा को गाली भी नहीं देती थीं। वैसे उनकी बीमारी वह आज तक नहीं
समझ पाया था। मगर उसे भगवान से बहुत शिकायत थी।
बचपन से लेकर आज तक हर दोस्त को अपने-अपने माँ-बाप के साथ मस्ती
करते देखता तो परेशान हो जाता था। लोगों से माँ के प्यार,
लाड़-दुलार के बारे में सुनता तो मन मसोस कर रह जाता। लोगों के घर
पर त्योहार की रौनक लगी रहती तो उसके घर में अक्सर मातम ही छाया
रहता था। कई दीवाली की रात में भी वह माँ के पागलपन से दुःखी होकर,
सडक़ों पर बिना खाये-पिये निकल जाया करता था। घर पर रोना चिल्लाना
देख-देख कर कई बार परेशान हो जाता था। एक बार तो एक दोस्त के रास्ते
में मिल जाने पर उसे बहाना बनाने में भी दिक्कत हुई थी। बस इतना ही
कह पाया था,
''...शहर की रौनक देखने निकला हूँ।''
जब तक दादी ज़िंदा थी कुछ न कुछ, थोड़ी बहुत मस्ती हो जाती थी। घर
में कम से कम अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ बन जाती थीं। छुप-छुप कर चोरी
से खाने में मज़ा आता था। थोड़ी-सी खुशी में ही कुछ पल जी लेता था।
कई बार माँ थोड़ा ठीक होती तो पटाखे भी आ जाते थे। मगर डर और सहम
कर फोडऩा पड़ता। कब माँ का मिज़ाज खराब हो जाये, किस बात से हो जाये
पता ही नहीं चलता था। त्योहार में आस-पड़ोस के लोग कम ही आते थे।
माँ निकलती ही नहीं थी, कमरे से। उसे इस बात का सदैव गुस्सा रहता
कि अगर माँ की तबीयत खराब है तो उनको सोने दो, एक माँ के कारण सारा
घर क्यूँ बेकार हो जाता है। इसी बात से उसे अपने पिता पर भी नाराज़गी
रहती थी। आज तक घर में माँ की प्रमुखता का कारण समझ नहीं पाया था।
घर माँ के ही इर्दगिर्द क्यूँ घूमता है? क्या माँ ही घर की धुरी
है? इस सवाल और जवाब से वह दुःखी रहता था।
दादी जब पापा के बचपन की बातें सुनाती थीं तो उसे अच्छा लगता था।
आकांक्षा दीदी और वह दादी के दोनों ओर चिपट कर सोते थे। दादी के
मरने के बाद घर सूना लगता था तो दीदी के जाने के बाद तो कमरे की
दीवारें काटने को दौडऩे लगी थीं। रात-रात भर लेटे-लेटे उसे पुरानी
बातें याद आतीं। दीदी के साथ रहने पर उसे कभी भी अकेलापन नहीं लगता
था। कुछ न कुछ बातें करके सोते थे। बचपन में दादी के साथ अक्सर
दर्जनी मोहल्ले भी जाता था। माँ की नाराज़गी और भय हमेशा बना रहता
था। वह इस डर में जीते-जीते कभी-कभी परेशान हो जाता था। इसी डर में
जीवन बोझिल था। पता नहीं किस बात से माँ का पागलपन बढ़ जाये, डर बना
रहता। मगर इतना डरने के बाद भी माँ तो ठीक रहती ही नहीं थी। उससे,
उसे और ज़्यादा तकलीफ़ होती थी। मन करता घर से भाग जाये। पहले दादी
के प्यार से फिर दीदी के साथ से वह आज तक टिका हुआ था।
उसे याद आया कि वह अक्सर दीदी को अक्की और आकांक्षा उसको अनि
पुकारती थी। उसने अंधेरे में आज फिर से दीदी के पलंग की ओर देखा
था। वहाँ कोई नहीं था। बिस्तर पर सब कुछ वैसा ही व्यवस्थित था मगर
चादर पर सिलवटें नहीं थीं। दीदी के टेबल पर किताबें सजी थीं। मगर
कोई भी खुली नहीं थी। उसे चिट्ठी से पता चला था कि दीदी इतिहास और
अंग्रेजी में ग्रेजुएशन कर रही हैं।
एक रात उसके अकेलेपन में बेचैनी भी थी। अचानक उसे लगने लगा कि यह
कमरा उसे निगल जायेगा। घबराहट इतनी बढ़ चुकी थी कि ठंड के मौसम में
माथे पर पसीना टपकने लगा था। पिता जी तो माँ के पास होंगे। उन्हें
वह जगा भी नहीं सकता था। बहुत कोशिश की मगर डर जा ही नहीं रहा था।
बहुत समझाया मन को... इतनी बड़ी उम्र का हो गया है, अब डरेगा तो
कैसा लगेगा। परंतु अकेलापन कब बेचैनी से डर में बदल गया पता ही नहीं
चला। घबराहट बर्दाश्त से बाहर हो गई तो वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। तभी
रात के काले साये उसे सताने लगे थे। एक परछाई एकदम नज़दीक आने लगी
तो उसने उठकर झट लाइट जला दी थी। चोर निगाहों से चारों ओर देखा वहाँ
कोई न था मगर लगा कि साये शरीर के अंदर प्रवेश कर गए थे। अपनी ही
परछाई से कहीं दूर भाग जाने का मन किया था। और उसने एक लंबी साँस
ली थी। रसोई तक अंधरे में जाने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी जबकि
प्यास तेज़ लग रही थी। उधर, चारों दीवारें उसे मारने की तैयारी में
जुट चुकी थीं। तभी सामने दीवार पर लटकी माँ दुर्गा की फोटो ने उसका
ध्यान आकर्षित किया था। दादी ने बचपन में बताया था, जब भी डर लगे
दुर्गा माँ को याद कर लो। वह तुरंत दुर्गा माँ की फोटो के सामने
जाकर, हाथ जोड़कर, आँखें बंद करके खड़ा हो गया था। कब वह डर-डर में,
माँ से प्रार्थना करने लगा उसे पता ही नहीं चला। धीरे-धीरे उसके
आत्मविश्वास ने फिर से उसे सहारा दिया था। थोड़ी देर बाद वह बड़ी
मुश्किल से सो पाया था। सुबह उठा तो प्रण कर चुका था कि वह भी इस
घर को छोड़ देगा, दीदी के पास चला जायेगा। यहाँ नहीं रहेगा। उसका
मन उचट चुका था। अब नहीं रुकेगा। माँ और पापा को जैसे रहना है रहें।
क्या उसकी कोई ज़िंदगी नहीं है। ...और मन एक नयी खुशी की तलाश में
भटकने लग था।
अनिरुद्ध ने कड़ी मेहनत की थी। अदिति मासी का लंदन से पूरा सहयोग
मिला था। बचपन से ही पढ़ाई में बढ़िया था। मगर घर के हालात के कारण
मेहनत नहीं कर पाता था। अब उसके पास मंज़िल थी। खूब लगन से पढ़ाई
की। अमित भी अंदर ही अंदर खुश था। अनिरुद्ध की मेहनत ने रंग दिखाया
और मासी की मदद से उसका लंदन के मेडिकल कालेज में दाखिला हो गया
था। अनिरुद्ध की ज़िद्द और जुनून में अमित कुछ भी नहीं कह पाया था।
निकिता को ज़रूर दुःख हुआ तो अमित ने समझाया था,
''बेटा है, पढ़ेगा नहीं तो क्या करेगा। अच्छा है आगे पढ़े बढ़े इसी
में माँ-बाप की खुशी है।''
अमित के अंदर के दुःख को अनिरुद्ध नहीं जान पाया था, मगर बेटे के
दुःख का बाप को पता था। वैसे भी वह कुछ अधिक कर भी नहीं पाता था।
अच्छा है दूर सही, खुश तो रहेगा। यही सोचकर बाप ने संतोष कर लिया
था। और फिर मस्तिष्क ने मन को समझाया था... भलाई हो तो प्यार में
बाँधने से अच्छा है, त्याग में दूर कर देना... खुशी जिसमें भी मिले,
वही उत्तम है।
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