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47.
अभी कुछ महीने ही बीते थे कि एक दिन अमित को अस्पताल में जाते ही
पता चला कि सुनीता आँटी का देहांत हो गया है। वैसे पिछले कुछ दिनों
से अदिति अस्पताल भी नहीं आ रही थी। आँटी बीमार थीं। अमित बीच में
एक बार उन्हें घर पर देख आया था। उनके चेहरे पर अब भी चमक थी मगर
शरीर अंदर से खोखला हो चुका था। और क्यूँ न हो, अदिति के लिए बहुत
चिंता जो करती थीं।
''मेरे बाद अकेली हो जाएगी।'' अदिति के सामने ही कह रही थी,
''...कितना कहा कि शादी कर ले। पहले तो हाँ नहीं की। बाद में कहती
रही आप कर दो। अब मैं कहाँ से करूँ। मेरे कहाँ संबंध हैं। उल्टा
मेरे कारण तो लोग और दूर हो जाते हैं। ...मेरे कर्मों का फल मेरी
बेटी भोग रही है। मैंने भी ऐसा क्या ग़लत किया है, मैं आज तक नहीं
समझ पायी। हाँ, इस समाज को उसका हिसाब माँगने का कोई हक़ नहीं।''
रोते-रोते आवेश में आ गई थी आँटी,
''...मैंने लंदन में कहा था, खुद ही ढूँढ़ ले कोई। कहती है ...प्यार
किया नहीं जाता हो जाता है, फिर कोई मिलना भी तो चाहिए। मैंने कितना
समझाया कि थोड़ी कोशिश कर, ढूँढ़ना पड़ता है। मगर नहीं, बस दिनभर
पढ़ाई करना और किसी से कोई मतलब नहीं। ...इसकी तो इच्छा नहीं थी,
मेरे कारण हिन्दुस्तान आई है। वहाँ इसके प्रोफेसर इसे छोडऩा ही नहीं
चाहते थे। पर क्या करूँ मैं तो यहीं मरना चाहती थी।'' पूरी रामायण
सुना दी थी उस दिन आँटी ने।
अदिति के घर पर अस्पताल के सभी डाक्टर और स्टाफ इकट्ठा हुए थे।
अदिति एकदम चुपचाप और गुमसुम थी। रह-रह कर आँखों से निकलने वाले
आँसुओं का उसे खुद पता नहीं था। उसके अंदर के खालीपन और बेचैनी को
अमित पढ़ सकता था। अनिरुद्ध और आकांक्षा को स्कूल जाकर बताया तो
दोनों स्कूल में ही रोने लगे थे। कोई भी प्यार उनके लिए ज़्यादा दिनों
तक नहीं चल पाता, इस बात का दोनों को अफसोस था। स्कूल से दोनों
अदिति आँटी के घर आ गये थे। बीते कुछ महीनों में ही दोनों इस घर का
हिस्सा बन चुके थे। अपनी दादी की मौत में तो दोनों भाई-बहन रो भी
नहीं पाये थे। उस व़क्त आकांक्षा के ऊपर घर संभालने की ज़िम्मेदारी
के साथ-साथ माँ की मानसिक बीमारी के ट्रिगर हो जाने का भय था। अपनी
दादी की मौत का गम भी माँ के भय से दब गया था। दोनों अंदर ही अंदर
गुमसुम और दुःख को पीकर रह गये थे।
यहाँ उन्हें इस घर में कुछ महीनों में ही जो प्यार मिला वह सपने से
बढक़र था। खुलकर बात कर सकते थे, हँस सकते थे, लड़ सकते थे। अपनी
पसंद-नापसंद बता सकते थे। अनिरुद्ध तो अपनी पसंद का खाना भी एक दिन
पहले बता जाता था। दूसरे दिन वही बनाया जाता था। सुनीता दादी जहाँ
सिर्फ प्यार करती थी, वहीं अदिति आँटी की डाँट में भी प्यार होता
था। यही कारण था जो दोनों बच्चों का अपने घर जाने का मन ही नहीं
करता था।
घर पहुँचते ही आकांक्षा और अनिरुद्ध, अदिति से गले मिलकर बहुत देर
तक रोते रहे। भावनाएं कैसी भी हो, अच्छी हो या खराब, सुख हो या
दुःख सभी के लिए खुले वातावरण की आवश्यकता होती है। गम हो या खुशी
दोनों को व्यक्त करने के लिए भी स्वतंत्रता चाहिए। भय इनकी इज़ाज़त
नहीं देता। प्रेम इनको बढ़ाता है। दोनों अपने दुःख का भी पहली बार
इज़हार कर पा रहे थे। दोनों ने रो रोकर इतना बुरा हाल कर लिया था कि
अंत में अदिति को ही सँभालना पड़ा था। लग रहा था जैसे माँ अपने दोनों
बच्चों को सँभाल रही है। अनिरुद्ध और आकांक्षा को अदिति के घर
छोड़कर कुछ देर के लिए अमित अपने घर आ गया था। उसको घर पर हर बात के
लिए बहाना बनाना पड़ता था। तीनों मिलकर अक्सर निकिता से झूठ बोलते
थे। वो कौन-सी बात पर कहाँ उखड़ जाये, पता नहीं चलता था। जब तक
अमित वापस अदिति के घर पहुँच पाता, अंतिम संस्कार की सारी तैयारियाँ
हो चुकी थीं। सुनीता का कोई रिश्तेदार नहीं था। कुछ लोग दर्जनी
मोहल्ले से आ चुके थे। अमित ने बिना किसी के कुछ कहे हुए स्वयं अपने
हिस्से की जवाबदारी ले ली थी। आँटी का कर्ज़ था उस पर। वह जानता था
कि उन्होंने किस तरह से, क्या-क्या नहीं किया उसके लिए। कई दिनों
की भूख में उनकी प्यार से दी गई खाने की चीज़े उसे आज भी याद थीं।
उनकी आँखों में सदैव अपनापन और बातों में प्यार झलकता था। उन तमाम
बचपन की यादों और भावनाओं के कर्ज़ को वह उतार नहीं रहा था, न ही
उसका मूल्य चुका रहा था। वह तो मात्र वर्षों पुराने संबंधों के
बंधन में बँधकर अपना फ़र्ज़ अदा कर रहा था। अनिरुद्ध को कुछ दिनों से
दादी का जो प्यार मिला था उसके खोने का गम था। फूट-फूट कर रो रहा
था। मगर जब पिता ने दादी आँटी को अग्नि देने के लिए कहा तो उनसे
लिपटकर खूब रोया था। और फिर आग लगाकर बहुत देर सिर पकड़कर वहीं ज़मीन
पर बैठा रहा। उधर, घर पर आकांक्षा अदिति के साथ ही बैठी रही थी।
भावुक ज़्यादा होने पर बहुत देर तक रोती रही। कुछ देर के लिए रुकती
फिर अचानक सिसकियां लेकर रोने लगती। अदिति हर बार उसे अपने बाहों
में लेकर संभालती। इस बीच अदिति के आँखों से भी आँसू चुपचाप बह जाते
थे। और वह आकांक्षा को एक हाथ से संभालते हुए दूसरे हाथों से अपने
आँखों को पोंछती। इस दृश्य को देखते ही हर कोई आँखों से पिघल जाता।
दर्जनी मोहल्ले से अधिकतर लोग आए हुए थे। कमला आज चुप थी। जिस पर
सारी उम्र लांछन लगाती रही वह आज दुनिया से जा चुकी थी। वो बूढ़ी
तो हो गई थी मगर कभी कोई गम दिल से नहीं लगाया, सदैव दूसरों को ही
नाम रखा, इसलिये सेहत भी ठीक थी। गीता उषा के साथ आई हुई थी। वैसे
तो अमित की माँ की मौत में भी सारी इकट्ठी हुई थीं। मगर तब अमित
निकिता को ही सँभालता रह गया था। निकिता की बीमारी उस व़क्त अचानक
बहुत बढ़ गई थी। दवाइयों का असर भी नहीं था। सारा समय चिल्लाती रहती
थी। यही कारण था कि जो आए भी थे जल्द ही वापस चल दिये थे। अमित किसी
से भी मिल नहीं पाया था। मगर आज वह सभी से अदिति के बचपन का साथी
होने की हैसियत से मिल रहा था। सेठ जी के लड़के भी आए थे। उनके मन
में भी शायद धीरे-धीरे सुनीता और अदिति के लिए नफरत खत्म हो चुकी
थी। अपने पिता की आख़िरी इच्छा भी पूरी करने आए थे। देर शाम तक सब
वापस जाने लगे तो अदिति एकाएक बहुत बड़ी हो गई थी और अंत में एकदम
अकेली। उसको ऐसी हालत में देखकर अमित अपने आप को रोक न सका।
आकांक्षा को अदिति के पास ही छोड़ दिया था। जानता था निकिता
चिल्लाएगी। मगर अबकी बार उसने हिम्मत से काम लिया था और घर आकर
निकिता से स्पष्ट बताने की कोशिश की थी,
''सुनीता आँटी का देहांत हो गया है। मैं आकांक्षा को वहीं छोड़ आया
हूँ।''
पूरी रात निकिता ने कुछ नहीं कहा था। लो डिप्रेशन का फेज़ था। सुबह
उठने के साथ ही कहने लगी,
''उसको कह देना अब घर नहीं आयेगी। मेरे बारे में सब कुछ अदिति को
बताया होगा उसने। और अदिति ने मेरे कालेज के बारे में उस लड़की को
बताया होगा। और फिर दोनों ने मिलकर मेरी बुराई की होगी। खबरदार जो
घर आयी। जान ले लूँगी।''
आकांक्षा अदिति के घर में पूरे पंद्रह दिन तक रही थी। इन पंद्रह
दिनों में रिश्ते मज़बूत बंधन का रूप ले चुके थे। घर पर हवन,
शुद्धीकरण, लोगों का आना-जाना लगा रहा। आकांक्षा ने बेटी की तरह
बखूबी सब कुछ सँभाला था। बीच-बीच में अनिरुद्ध भी आ जाया करता था।
पंद्रह दिन बाद घर वापस जाने की बारी आई तो आकांक्षा उदास थी। माँ
की याद तो आती, घर पर खाने का कौन ध्यान रखता होगा, सोच-सोच कर
चिंता भी करती मगर फिर भी वापस जाने का मन न था। अदिति ने ही जाने
के लिए कहा था। वह इस बात के लिए स्वार्थी नहीं बनना चाहती थी और
फिर दिल पर पत्थर रखकर उसने आकांक्षा को विदा किया था।
सहमते हुए आकांक्षा घर पहुँची तो मुँह छुपाते हुए अपने कमरे में
घुसकर दुबक गई थी। और फिर तुरंत रसोई में पहुँचकर बर्तनों से भीड़
गई थी। निकिता के कान में किचन से बर्तनों की आवाज़ आई तो वह लपककर
वहाँ पहुँची थी। आकांक्षा को देखा तो उसने बहुत हल्ला मचाया था।
बहुत देर तक नाटक करने के बाद ही कुछ शांत हो पाई थी। आकांक्षा कई
रात रोती रही थी। अमित ने किसी तरह बात सँभाली थी। उधर, अदिति का
मन पूरी तरह से शहर से उचट गया था। उसके पास अब यहाँ पर रहने के
लिए कुछ भी नहीं था। कुछ दिनों बाद अस्पताल में भी अनमने ढंग से ही
आई थी। अमित ने महसूस किया था कि अदिति को बच्चों का साथ अच्छा लगता
है। तभी तो वो बच्चों के बारे में बार-बार पूछती रहती थी।
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