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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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45.

एक तरफ़ वेदना, कष्ट, मानसिक पीड़ा और दूसरी ओर कोई सुख-शांति नहीं। मन-मस्तिष्क और शरीर की प्यास न बुझने से, आग ने अपने ही मांस-पेशियों को जलाकर राख करना शुरू कर दिया था। अमित का शरीर अंदर से अब खोखला होने लगा था। और जीवन सिर्फ इसलिए चल रहा था चूँकि साँसे बंद नहीं हो पा रही थीं। अब कोई तमन्ना नहीं, कोई इच्छा नहीं, बस दिल में एक ही ख्वाहिश रह गई थी कि उसके दोनों बच्चे उसके जीते जी कम से कम साधारण जीवन जीने के काबिल बन जाए। बहुत अधिक की चाहत नहीं थी। आकांक्षा को लेकर वह परेशान हो रहा था। बेटी की इसमें कोई भी ग़लती नहीं है वह जानता था। परंतु उसके जीवन में अब तक जितनी भी नारियाँ संपर्क में आयीं फिर चाहे जिस किसी रूप में भी हों, परेशान और दुःखी ही रही... माँ, बहन, पत्नी और अब बेटी। जीने की तो उसकी कोई इच्छा नहीं थी पर मरने के बाद दोनों बच्चों का क्या होगा, सोच-सोच कर भयभीत हो जाता था। परंतु क्या ज़िंदा रहकर भी, वह अपने बच्चों को कुछ भी दे पा रहा है? शायद बिल्कुल नहीं। उधर, निकिता कभी थोड़ा ठीक रहती, तो कभी बिल्कुल मानसिक संतुलन से बाहर। वह तो अपनी मानसिक अस्तव्यस्तता से कुछ हद तक निकल जाती। फिर कुछ दिनों के लिए कुछ हद तक ठीक भी हो जाती परंतु उसका असर दूसरों पर बहुत दिनों तक बना रहता था। अमित को आज कोई भी रास्ता नहीं सूझ रहा था। अदिति क्या उसकी इस परेशानी को समझ पायेगी? पीछे, उन दोनों के बीच में जो कुछ भी हुआ, क्या उसके बाद वह उससे कोई भी उम्मीद कर सकता है? शायद नहीं। लेकिन अदिति के मन में आज भी उसके प्रति अपनापन है। ...मगर वो क्यूँ?
उस रात के हादसे के बाद अमित अदिति से नज़र भी नहीं मिला पाता था। वैसे भी वह बदमाश प्रवृत्ति का नहीं था। उस रात के वहशीपन के लिए उसने अपने आप को और अधिक कष्ट दिया था। यह जानते हुए भी कि उसके लिए उसके हालात भी ज़िम्मेदार थे। मगर उसने फिर भी अपने आप को कभी फिर माफ नहीं किया था। हाँ, कमज़ोरी बढ़ने से उसमें चिड़चिड़ाहट बढ़ गई थी। उधर, अदिति के लिए यह सब कुछ अप्रत्याशित था। वह अमित से सपने में भी ऐसी उम्मीद नहीं कर सकती थी। अमित के हालात उसे पूर्ण रूप से पता नहीं थे। कई सालों से विदेश में रहने की वज़ह से उसका संपर्क टूट-सा गया था। अमित के अधिक शराब पीने और शारीरिक अवस्था, गंदे कपड़े और उस रात की हरकत के बाद उसने उससे बात करना लगभग बंद कर दिया था। दुःख तो हुआ था मगर उसके सोच और विचार ने उसे और कुछ ज़्यादा तहक़ीक़ात करने की आवश्यकता पर रोक लगा दी थी।
परंतु पिछले दो दिनों से अस्पताल में अदिति ने जो भी कुछ देखा, सुना और फिर समझा, उससे उसके बर्ताव में परिवर्तन था। मगर वह अमित की परेशानियों को दूर करने के लिए अपने जीवन को बर्बाद नहीं कर सकती। उसकी इच्छाओं पर अपने उसूलों की तिलांजलि नहीं दे सकती। हाँ, एक दोस्त, अच्छे इंसान के रूप में उसके दुःख को बाँट ज़रूर सकती है। क्या यह सब करने के लिए किसी रिश्ते की परिभाषाओं का होना आवश्यक है? नहीं। फिर उसका संबंध अमित से वर्षों पुराना है, उसी ज़िम्मेदारी को प्यार सहित वह अस्पताल में निभा रही थी। अमित फिर से एक बार, एक नये सहारे की तलाश में भटक रहा था। परंतु इस बार अपने लिये नहीं। मगर वह अदिति से किस तरह से बात करे। सोचने लगा कि कई साल बीत जाने पर अदिति अब उससे काफी दूर हो चुकी है। बचपन से कालेज तक वह अपनी प्रायः हर बात बहुत साधारण ढंग से उसे बता दिया करता था। किस हक़ से यह तो वह नहीं जानता, परंतु अदिति से उसे विश्वास, प्यार और अपनापन प्राप्त होता था। सारी रात अस्पताल में इसी उधेड़बुन में बीत गई कि वह अदिति से बात करे या नहीं... लेकिन अदिति के अलावा उसके पास कोई और चारा भी तो नहीं था। कोई दोस्त नहीं, रिश्तेदार नहीं। श्याम और राधिका से बात की तो थी मगर वहाँ ज़्यादा संभावनाएं नहीं थी। वैसे अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारी और दूसरी व्यस्तता को देखते हुए दोनों आज भी बहुत मदद करते थे, वो भी प्यार और संपूर्ण विश्वास से। अमित को यह सोच-सोच कर बड़ा डर था कि अबकी बार तो वह बच गया लेकिन अगली बार के हार्टअटैक में शायद न बच पाये... फिर बच्चों का क्या होगा? ...और बेचारी निकिता, उसका क्या होगा? ...बाकी तो चलो कुछ न कुछ कर लेंगे मगर आकांक्षा...? फिर उसके पास सोचने के लिए व़क्त भी कहाँ था। बात ही कुछ ऐसी थी। रात बिस्तर पर कहाँ बीत गई पता ही नहीं चला। सुबह-सुबह अदिति उसके पास आई तो वह अपने आप को रोक न सका।
''मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ...''
अमित की धीमी आवाज़ बड़ी मुश्किल से अस्पताल की बेचैन शांति को चीरते हुए अदिति के कानों तक पहुँची तो थी मगर उससे अधिक उसकी आँखों ने बयां किया था।
''हाँ, बोलो...!'' अदिति की नज़र आश्चर्य में डूबकर भी कुछ पढ़ने की तलाश में अमित के चेहरे पर फिसल रही थीं।
''मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूँ।''
''मैं आज सब कुछ समझ सकती हूँ, और इसके लिए अब तुम्हें इस तरह से कुछ कहने की कोई आवश्यकता नहीं।''
अमित ने तुरंत अपनी आँखें झुका ली थीं। अदिति ने खुद उसके हाथों को धीरे से अपने हाथ में लिया तो उसकी आँखों में आँसू तैर गये थे। अदिति ने उसके आँसुओं को पोंछते हुए कहा था,
''तुम्हें हिम्मत से काम लेना होगा। इस तरह से कैसे चलेगा... और फिर मैं तुम्हारे साथ हूँ।'' अदिति बिस्तर के पास स्टूल पर बैठते हुए कह रही थी। उसने देखा अमित की आँखों में दर्द भरा हुआ था जिसे आँसुओं ने ढकने की असफल कोशिश की थी। सुबह की रोशनी काँच की खिडक़ी से छन-छन कर आ रही थी। दो दिन में बड़ी हुई दाढ़ी के बीच सफेद बाल अपनी आप बीती सुना रहे थे। अमित के हालात ने अब तक अदिति को पूरी तरह से पिघला दिया था। इतने सालों का लंबा सफर और अपरिभाषित बंधन, नयी भावना से ओतप्रोत नयी दिशा की ओर बढ़ रहे थे।
''मैंने उस रात जो तुम्हारे साथ रूखा व्यवहार किया उसके लिए... मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम मुझे समझते हो।'' अदिति की भावनाएं आँखों में उतरने के प्रयास में थी।
''मुझे तुम्हारी आवश्यकता है।'' अमित अब उसकी ओर एकटक देखते हुए बोल रहा था, अदिति की बातों को उसने अनसुना कर दिया था।
सुनते ही अदिति के हाथों ने अपनी पकड़ ढीली की थी। उसकी उँगलियां अमित के हाथों से दूर जाने की कोशिश में निकल चुकी थीं। मन की शंकाओं को दबाते हुए अदिति ने किसी तरह से कहा था, ''...मैं तुम्हारे लिये क्या कर सकती हूँ?'' अमित ने धीरे से कुछ देर मौन रहने के बाद नज़रों को छत पर दौड़ाया था चेहरे ने दृष्टि की पकड़ को मज़बूती प्रदान की थी। अदिति को अमित से किसी ग़लत बात का अंदेशा तो था मगर आज विश्वास और भावनाएं हावी हो रही थीं। और फिर सामने वाला शチस एक मरीज़ भी तो था और उसने अपने आप को किसी तरह से साथ बिठाए रखने में सफलता हासिल की थी। उधर, अमित के पास अब कोई चारा नहीं था। उसे जल्दी थी। समय उसके वश में नहीं था। आँखें नीची करके होंठों से बुदबुदाने लगा,
''...मेरी बेटी को बचा लो।'' शब्द अभी खत्म हो पाते इसके पहले ही अमित की आँखों से तेज़ आँसू बहने लगे थे।
''मैं समझी नहीं...!''
''मेरी बेटी को बचा लो ...नहीं तो वो बर्बाद हो जाएगी।''
फफक कर रोते हुए अब उसने अपना मुँह दूसरी ओर फेर लिया था।
अदिति बहुत देर तक समझ ही नहीं पाई थी। कुछ देर तक जड़वत्‌ बैठे रहने के बाद उसने बहुत ही प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा था।
''...सब ठीक हो जाएगा। तुम पहले ठीक तो हो जाओ। आकांक्षा को कुछ भी नहीं होगा।'' अदिति कह तो गई परंतु कुछ समझ नहीं पा रही थी। ...निकिता की वज़ह से घर पर परेशानी है परंतु आकांक्षा को ऐसा क्या हो गया या हो जायेगा जिसकी वज़ह से अमित इतना परेशान है? अमित से ऐसी हालत में ज़्यादा कुछ पूछना भी उसे ठीक नहीं लगा था। कुछ देर यूँ ही बैठे रहने के बाद जैसे ही कमरे से बाहर निकली तो देखा, सामने से आकांक्षा भागी चली आ रही थी। एक हाथ में थरमस और दूसरे हाथ में बैग... शायद खाना हो...
''नमस्ते आँटी, कैसे हैं पापा?''
''ठीक हैं। स्कूल नहीं गई?''
आकांक्षा ने सिर हिलाते हुए आँखे नीचे की थीं।
अदिति ने आकांक्षा के अंदर तक झांक कर उसे पढ़ने की कोशिश की तो पाया एक मासूम-सा उदास चेहरा जिसमें थकावट और दर्द टपक रहा था। इसकी उम्र की लड़कियाँ कितनी हँसती बोलती और फैशन करती हैं और कहाँ इस पर इतना सारा बोझ। अदिति ने आकांक्षा को कंधे से पकड़कर अपने सीने से लगाया और सिर पर एक चुंबन लिया था।
''तेरे पापा जाग गये हैं, चल तेरे साथ चाय पीती हूँ।''
अंदर कमरे में पुनः आकांक्षा के साथ आकर, वह पास ही सोफे पर बैठ गई थी। आकांक्षा अमित के पास जाकर दो मिनट खड़ी रही, दोनों बाप-बेटी ने एक-दूसरे को देखा और फिर एक धीमी-सी मुस्कुराहट के साथ वह वापस सोफे पर आकर अदिति आँटी के पास ही बैठ गई थी। थरमस से चाय निकालकर देने लगी तो अदिति ने उसे ध्यान से देखा था।
अदिति पूरा दिन इसी बात को सोचती रही कि ऐसी क्या बात हो सकती है जिसे सोच-सोच कर अमित अंदर ही अंदर घुट रहा है। अब जब भी आकांक्षा अस्पताल आती अदिति उसे सदैव अपने साथ ही रखती और फिर उसे उसके घर के बाहर तक छोडऩे भी जाती। अमित, अदिति और आकांक्षा को एक साथ देखकर संतुष्ट होने लगा था। बेटी को देखकर उसकी आँखों में चिंता उभरती और फिर उसे अदिति के साथ होने पर एक विश्वास आता जो चेहरे से झलकने लगता था। दोनों बाप-बेटी में अटूट प्यार है अदिति देख लेती थी। बाप-बेटी के बीच के अनकहे शब्दों को वह अब सुन और समझ लेती थी। आकांक्षा की मासूमियत पर उसे प्यार आने लगा था। अमित की आँखों में आकांक्षा के लिए सदैव प्यार और चिंता देखकर अदिति को प्रसन्नता होती थी। ...यही तो है बाप का प्यार जो उसे नहीं मिला।



 

 


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