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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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4.

अमित हल्के-हल्के होश में आ चुका था। अपने हाथों में उसने गर्माहट महसूस की थी। स्वयं को अस्पताल में देखकर एक पल के लिए कुछ अजीब-सा महसूस हुआ। लाइट बंद थी और सबसे पहले अंधेरे से सामना हुआ था। हाँ, स्पर्श से पता चल चुका था कि मुँह पर ऑक्सीजन की नली लगी होनी चाहिए। बाहर के बरामदे से आती किरणों ने अँधेरों को चीर रखा था। आँखों के किनारे से उसने चारों तरफ़ नज़र घुमाई तो देखा... अदिति सामने सोफे पर सिर पीछे करके बैठी हुई थी। उसकी गोद में आकांक्षा अपना सिर रखकर सोफे पर ही सिमट कर लेटी हुई थी। उसके सिर पर अदिति का हाथ था। उसने अगले ही पल देखा कि अदिति आकांक्षा के सिर पर थोड़ी-थोड़ी देर बाद हाथ फेर देती है। जिसमें प्यार की भावना साफ़ झलक रही थी। उसने राहत की साँस ली थी। समय का ज्ञान नहीं हो पा रहा था। कुछ खोजते हुए नज़र दौड़ाई तो देखा सामने की दीवार की घड़ी पर सुबह के चार बज रहे थे। डाक्टर होने के नाते वह इतना तो समझ ही गया था कि इस बार तो वह बच गया है, पर अगली बार...?
सोचते ही बेचैनी बढ़ी थी। भूलने या बचने की कोशिश में उसे रात की बात और अधिक याद आने लग थी... उसे रात को छाती में अचानक तेज़ दर्द हुआ था। अस्पताल रात की ड्यूटी पर जाना था। वह मुँह-हाथ धोने, फिर बच्चों को खाना देने के लिए जा ही रहा था कि उसे अचानक सीने में बहुत तीखा दर्द हुआ था। जो धीरे-धीरे उसके दोनों हाथों की ओर बढऩे लगा था। वही दर्द उसके गले और पीठ तक पहुँचकर, उसे परेशान कर रहा था। उलटी के एहसास आते ही उसके अनुभव ने उसे यह बता दिया था कि उसे तीव्र हार्ट अटैक आ चुका है। बायीं ओर की उसकी आरट्रीज ब्लॉक हो रही थी। ब्लॉकिंग होने से उसकी छाती में भारीपन बढ़ रहा था। साँस लेने में कठिनाई के बढऩे पर और तेज़ पसीने से वह जान चुका था कि तीव्रता बहुत अधिक है। अपने दोनों बच्चों को देखकर, कुछ बोल पाता, उसके पहले ही उसकी आँखें कब बेहोशी में बंद हुई, उसे पता ही नहीं। ...अचानक उसे निकिता का ख़याल आया ...वह उस रात बहुत नाराज़ थी। उसने उसे जबरदस्ती ही कमरे से धक्का दे कर बाहर किया था और दरवाज़ा बंद कर लिया था। उसने नींद की कितनी गोलियाँ खायी होगी, इस बात को सोचकर उसके मन में हल्की-सी चिंता उभरी थी। आँखों ने चारों और नज़र दौड़ाई, पता नहीं किसकी तलाश थी, मगर उसे और कोई भी नहीं दिखाई दिया था। वह दो मिनट के लिए चिंतित ज़रूर हुआ, परंतु अस्पताल से कुछ भी करने की स्थिति में नहीं था। निकिता पहले भी ऐसा करती रही है। इसी बात ने राहत पहुँचाई थी। वह इतना मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुका था कि उसे अब कुछ और सूझ ही नहीं रहा था। उसका शरीर, उसकी सोच के दबाव में कार्य करने से मना कर चुका था। वह वैसे भी अब जीना नहीं चाहता था। परंतु दोनों बच्चों के प्यार, एहसास और भविष्य को लेकर मजबूर था। पिछले कुछ दिनों से आकांक्षा को लेकर बेहद परेशान और चिंतित था। मासूम बेटी से अत्यधिक प्यार था। मगर उसे अंधेरों में जाने से कैसे रोके इसका उसके पास कोई रास्ता फ़िलहाल नहीं दिखता था। उसके मन में वैसे कहीं न कहीं निकिता के प्रति जवाबदारी भी थी और प्यार भी। ...अगर उसे कुछ हो गया तो निकिता का क्या होगा?
ईसीजी मॉनिटरिंग पर अपने ही हृदय के स्पंदन को देखकर बहुत अजीब-सा लगा। इसी अस्पताल में पिछले कई सालों में उसने कई मरीज़ों को मरने से बचाया था, तो कई को वह मौत के मुँह में जाने से नहीं रोक पाया था। जीवन और मौत उसके लिए रोज़मर्रा की कहानी हो चुकी थी। मगर स्वयं उस दौर से गुज़रने का एहसास आज भिन्न था। अब उसे किसी की मौत से न तो दुःख होता था और न ही किसी को जीवन देने में कोई खुशी। हाँ, हर बार, हर केस में अपनी ओर से कोशिश ज़रूर करता कि किसी भी तरीके से मरीज़ को बचा ले। वह एक संपूर्ण समर्पित ज़िम्मेदारी से भरा हुआ डाक्टर था। नीरस जीवन में ज़िम्मेवारियों को निभाते-निभाते उसकी भावनाएं और आत्मा पूरी तरह मर चुकी थी। फिर कोई खुशी भी तो नहीं थी। उस मरी हुई आत्मा में, उसने अपने जीवन जीने की इच्छा को भी मार दिया था। उसे जीने की अब कोई चाहत नहीं थी और मरने से कोई घबराहट नहीं। वह एक विचित्र अवस्था में पहुँच चुका था। जहाँ जीना और मरना कोई मायने नहीं रखता। इन भावनाओं के निकलते और गुज़रते, उसकी निगाह फिर से अदिति पर पड़ी थी। उसे अदिति की परेशानियों और दुःख का भी एहसास था। परंतु अदिति ने कभी भी अपने अकेलेपन का, ग़मों का, अपने दुःखों का, उससे ज़िक्र तक नहीं किया था। तो फिर वह दुःखों से इतना परेशान क्यूँ?
पिछले कुछ दिनों से उसने अदिति से दूरी बना ली थी। पहले उस पर वह अपना थोड़ा बहुत हक़ दिखा लिया करता था। एक बार उस हक़ की परिधि बढ़ जाने पर अदिति ने उसे टोक दिया था। उस दिन अमित को काफी तकलीफ़ हुई थी। वह आज तक नहीं समझ पाया कि उस रात उसने ऐसा किस भावनाओं के तहत किया था। मगर अदिति ने ठीक ही किया था। शरम के मारे वह उससे दूर-दूर रहने लगा था। अदिति भी उस दिन से कम ही बात किया करती थी। पहले भी उसने कई बार अपने दुःख अदिति से बाँटने चाहे थे। परंतु अदिति की तरफ़ से बहुत अधिक सहयोग न मिलने पर वह आगे नहीं बढ़ पाया था। अदिति ने कभी भी उसकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया था, न ही उसे कोई तवज्जह दी थी। उलटा हर बार अदिति के रूखे व्यवहार ने उसे चोट ही पहुँचाई थी। वह किसी और से बात करने के लिए तो उत्सुक नहीं रहता, परंतु अदिति को देखकर उसके मन में आज भी कहीं न कहीं कुछ कहने की इच्छा उठती थी।
कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर, उसने उस ओर अपनी आँखों की पुतलियाँ घुमाई थीं। सिस्टर धीरे से उसके बेड की ओर बढ़ रही थी। यह देख उसने तुरंत आँखें बंद कर ली थीं। मगर मस्तिष्क क्रियाशील व कान चौकन्ने थे। सिस्टर ने ईसीजी मॉनिटरिंग रिकार्ड करने के बाद ब्लड प्रेशर चैक किया। और फिर बेड हैड टिकट पर सब कुछ लिखने के बाद, अदिति को रिपोर्ट करके पुनः बाहर की ओर जा चुकी थी। अमित ने पलकों के बीच से धीरे से झांका तो पाया आकांक्षा शायद उसी की ओर देख रही थी और उसने एक बार फिर आँखें बंद कर ली थी। अदिति और आकांक्षा फिर से धीरे-धीरे उसके बारे में बातें करने लगीं थीं। शब्द उस तक पहुँच रहे थे जो उसके दर्द में मरहम का काम कर रहे थे। आज पहली बार निकिता ने उसे विचारों में आकर कष्ट नहीं दिया था। ऐसा नहीं कि निकिता से वह भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ा था, पर उसके द्वारा कहे गये कुछ शब्दों ने उसे हर बार जीवन से दूर किया था। वहीं अदिति की बातों ने हर बार उसे जीवन की वास्तविकता से परिचय कराया था। और आज भी तो वह उसकी बेटी को ढाढ़स बंधा रही थी... जीवन की हक़ीक़त बताकर... कुछ छिपाते हुए कुछ समझाते हुए...
अदिति का चेहरा पुतलियाँ बहुत नीचे करने के बाद भी, वह कुछ कुछ ही देख पा रहा था। एक शांत, साँवला, गोल चेहरा, जिस पर बड़ी-बड़ी आँखें अच्छी लगती थीं। बीच में एक छोटी-सी काली बिंदी उसके सौंदर्य को सौ गुना बढ़ा देती थी। उसी अलौकिक सौंदर्य को, रात के अँधेरे में, अपनी धुँधली आँखों से वह देखने की कोशिश कर रहा था। क्या यह वही अदिति है, जिसे उसने बहुत छोटी उम्र से देखा हुआ है? आज कितनी बड़ी और समझदार, और एक वह स्वयं, कितना कमज़ोर। यह सोचते-सोचते, धीरे-धीरे भूतकाल में वहाँ तक चला गया, जहाँ से उसके जीवन की शुरुआत हुई थी। उसने होशा संभाला था। पीछे जाने पर उसे यों लगा कि जैसे उसका जीवन व्यर्थ में किसी ने लिखा था। मरने की अवस्था में, इंसान को पीछे मुडक़र देखने में जो कुछ दिखाई देता है, उसे बयान नहीं किया जा सकता। सिर्फ महसूस किया जा सकता है। मगर जो भी महसूस होता, वह विरक्तिपूर्ण और सत्य होता है। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में कहीं भी ऐसा नहीं पाया कि उसका जीवन शांत, सुन्दर और खुशियों से भरा हुआ हो। अगर कोई छोटी-मोटी खुशियाँ मिली भी तो कुछ थोड़े से पल के लिए, परंतु साथ ही साथ बड़ी मुसीबतों का पहाड़ उसको एक पुरस्कार के रूप में सदैव मिला। जिससे वह धीरे-धीरे टूटता चला गया। उसे आज यकीन ही नहीं हो पा रहा था कि वह इतने दुःखों और परेशानियों को झेलता आ रहा है। वह कैसे इतनी लम्बी उम्र तय कर गया, उसे पता ही नहीं चला। मगर अभी तो उसने 40 का आंकड़ा भी पार नहीं किया था। तो फिर उम्र के इस पड़ाव पर ही ऐसा क्यों लगने लगा जैसे कि वह बहुत लम्बा जीवन जी चुका है। कहाँ से, क्या, कब, कैसे शुरू हुआ, पता नहीं। उसके हाथ में तो कुछ भी नहीं था। वह तो बस बढ़ता चला गया।
जैसे-जैसे वह पीछे जा रहा था, उसने महसूस किया कि उसके दिल का दुःख, धीरे-धीरे पुनः बढ़ता जा रहा था। पर वह आज कष्ट कम दे रहे थे। दिल का गुबार बढ़े और उसे रास्ता न मिले, तो वो आँखों के सहारे आँसू बनकर निकल पड़ते हैं। आज उसकी आँखों में भी पानी भर आया था। पलक बंद करते ही आँसू, पलकों के किनारे से लुढ़ककर बिस्तर पर फैल चुके थे। उन आँसुओं के बहाव के साथ-साथ बह रहे अपने जीवन के पुराने टुकड़ों को वह समेटता हुआ, अपने आप को ढूँढऩे लगा, और वहीं पहुँच गया जहाँ से उसके जीवन की शुरुआत हुई थी। वहाँ तो दुःखों का अम्बार था। देखकर एक अजीब-सी कसमसाहट हुई थी। पर उसे कभी भी बचपन में, दुःख का एहसास क्यों नहीं हुआ? उलटे बचपन की बड़ी-बड़ी परेशानियों में भी वो उन्हें पार करता हुआ आगे बढ़ता चला गया था। कैसे? ...शायद उसके साथ उसको आगे बढ़ाने के लिए, प्रोत्साहित करने के लिए, प्यार भरे कई हाथ उसके सिर पर सदैव हुआ करते थे। वहीं आज ऐसा कुछ नहीं था। कहाँ बचपन में कुछ न होते हुए भी सब कुछ था। वहीं आज सब कुछ होते हुए भी शायद कुछ नहीं। जाने-अनजाने ही आज के एहसास में उसे अपने बचपन की परेशानियों पर फख़र होने लगा था। इन सब टूटी हुई यादों से वह कब बचपन की ओर बढ़ गया उसे याद ही नहीं रहा। आँखें बंद करके उसे अपने बचपन का वह मोहल्ला याद आया, जिसे इसी शहर में रहते हुए अब उसने वर्षों से नहीं देखा था... दर्जनी मोहल्ला, घमापुर। ...और सारी धुंधली पड़ी यादें ताज़ा होने लगी। माँ, बाबूजी, सुप्रिया...



 

 


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