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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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39.

रातभर अमित सोचता रहा। उसने कितना ग़लत समझ लिया था अदिति को। कितना अपनापन है उसमें। बचपन के संबंधों को निभा रही है। बिना किसी बंधन के। माँ को भी याद कर रही थी। ठीक ही कह रही थी बच्चे अपनी दादी से हिले हुए थे और क्यूँ नहीं हिलते, बचपन से पाला था उसने। दादी के साथ-साथ माँ भी बनी हुई थी। सारा बुढ़ापा उसने बच्चों के नाम कर दिया था। आज उसे भी अस्पताल के बिस्तर पर माँ की कमी महसूस हुई थी। अगर वह होती तो मेरे पास ही खड़ी रहती। माँ के अलावा लोगों की पत्नियाँ उनके साथ हर सुख-दुःख में होती हैं। पत्नी जहाँ प्रेमिका और उर्वशी है वही जीवनसंगिनी भी और साथ ही माँ का रूप भी। औरत अपने आप में संपूर्ण है। ...न चाहते हुए भी उसे पुरानी यादों ने फिर घेर लिया था। माँ की याद आते ही दुःख बढ़ गया था। ...माँ को क्या मिला? पूरी ज़िंदगी सिर्फ दुःख झेला। जब वह जबलपुर से दूर भुसावल में था तो यहाँ माँ अकेली थी। बुढ़ापे में अकेली। इस उम्र में अकेले जीवन। कोई काम नहीं, कोई उद्देश्य नहीं, कोई चाहत नहीं। बस जीना है इसलिये कि मर नहीं सकते। महीने के महीने पैसे भेज देता था। वह भी निकिता से छुपाकर। उसके मन में डर था। निकिता मानसिक रूप से बीमार सही, लेकिन उसकी बातों का दुःख तो होता ही था। जो भी वह कहती, उन शब्दों के बाण उसे घायल कर देते थे। फिर ये मन कहाँ तक समझे कि यह औरत जो कह रही है इसकी बातों पर मत जाइये। यह तो बीमार है। मन परेशान तो हो ही जाता था। जब भी फ़ोन करता, माँ को, अपनी उदासी छुपाने कि कोशिश ही करता रह जाता।
जबलपुर लौटने से बहुत फायदे हुए थे। कम से कम माँ आँखों के सामने रहती और बच्चों की देखभाल होने लगी थी। घर की उसे चिंता कम रहती थी। बस अब एक ही चीज़ का डर रहता, निकिता का ऑफ मूड। उसकी बीमारी का साइकिल था। कभी बहुत लो, बिल्कुल शांत गंभीर, कभी हाई एकदम गुस्सा, तेज़ बोलना। अप साइकिल आता तो वह सारी बातें, हरकतें मालती और आकांक्षा पर निकालती। मालती खून के आँसू रोती और आकांक्षा दादी को देखकर रोती। मालती बेटे से अक्सर बहुत कुछ छुपा लेती। मगर आकांक्षा के मन में भय समा गया था। छोटी-सी उम्र में माँ को अटैक आने पर सहम जाती थी। बिल्कुल नहीं रोती। जैसा उसकी माँ कहती सब पर हाँ हाँ करके सिर हिलाती रहती। आँखें भयभीत हो जाती। अपनी माँ के ग़लत शब्दों को सुन-सुन कर बड़ी हो रही थी। लेकिन फिर माँ की आँखों से दूर होते ही जैसे ही दादी मिलती उससे लिपटकर रोने लगती। रात दादी से चिपक कर सोती। हाँ, माँ के रौद्र रूप में जब कभी बर्दाश्त नहीं होता तब दादी के पीछे छुप जाती थी।
इस तरह से आकांक्षा का व्यक्तित्व एकदम दब्बू और अंतर्मुखी बन गया था। हीन भावना घर कर गई थी। ज़रा-ज़रा सी बात पर रोने लगना। फैशन का तो सवाल ही नहीं, कपड़ों तक का ध्यान नहीं रहता था। कहाँ आजकल की लड़कियाँ इतनी तेज़ और आधुनिक पर वह एकदम घर घिस्सु बनती जा रही थी। छोटी-सी उम्र में ही दादी के साथ किचन में हाथ बँटाने लगी थी। पढ़ाई का न तो टाइम होता न ही माहौल और कई बार तो कई-कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाती थी। घर भी देखना होता था। दादी के कहने पर आकांक्षा बचपन से ही अपने पिता का ध्यान रखती थी। उनकी सुबह की चाय और कपड़े सब वही निकालकर देती। खाना परोसने में तो होश संभालते ही हाथ बँटाने लगी थी। मगर स्कूल में एकदम फिसड्डी थी। न पढ़ाई में न खेलकूद में, न ही कोई कार्यक्रम में हिस्सा लेती। उसका स्कूल में कोई अस्तित्व ही नहीं था। डर से वह अपनी माँ से कम बात करती थी। परंतु उनकी गाली सुनने के बावजूद उनका ज़्यादातर काम वो ही करती थी। हाँ, अनिरुद्ध, अपने छोटे भाई से उसे विशेष प्यार और लगाव था।
अनिरुद्ध किस्मत वाला था, बचपन से ही माँ का लाड़-प्यार भरपूर मिला था। मगर ज़्यादा व़क्त तो दादी के साथ ही गुज़रता। माँ का दादी और दीदी को भला-बुरा कहना उसे अच्छा नहीं लगता था। इस बात पर अक्सर वह माँ से नाराज़ हो जाता। निकिता उससे लाड़-प्यार में कुछ भी नहीं कहती थी। यहाँ तक कि उससे थोड़-थोड़ा डरती भी थी कि कहीं नाराज़ न हो जाये। माँ के आकांक्षा से दसियों बार हाथ धुलवाने पर अनिरुद्ध झिड़क देता तो उसे कुछ नहीं कहती। अनिरुद्ध पढ़ाई में ठीक-ठीक था। परंतु हालात के कारण कई बार परेशान हो जाता था। ज़िद्दी और चिड़चिड़ा स्वभाव का हो गया था। माँ की बीमार हालत में दादी और बहन के साथ ही व़क्त गुजारता इसलिये दोनों से बहुत नज़दीक था। अपने पिता से उसे प्यार तो था मगर वह अक्सर उनसे भी नाराज़ रहता। उसे बड़ी तकलीफ़ होती जब माँ दादी और बहन को उल्टा-सीधा कहती और उसके पिता चुप रहते। पिता का ऐसा व्यवहार उसकी समझ से बाहर था।
निकिता पर दवाई का असर रहता था। भुसावल से आने पर जबलपुर में ट्रीटमेंट व्यवस्थित ढंग से चल रहा था। ज़्यादातर व़क्त वह अपनी दुनिया में ही रहती, कम चिल्लाती कम गुस्सा होती। परंतु अपने बिस्तर और कमरे से बाहर कम ही निकलती थी। कोई घर पर बाहर वाला आये उसे अच्छा नहीं लगता था। पड़ोसियों का उसे चेहरा भी पसंद नहीं था। एक-दो बार किसी कार्यक्रम में गई भी तो जल्दी ही वापस आ जाती थी। फिर भी कभी ठीक रहती तो बच्चों से, माँ से बात करती, कभी-कभी मार्केट भी चली जाती, पर भरोसा नहीं रहता कि कब मूड डिसऑडर में चला जाये। बच्चे सदैव उससे सहमे ही रहते थे। ऐसा लगता किसी कैद में बंद हो। रात को दादी से चिपककर सोते। अपनी दादी से ही लड़ते-भिड़ते और प्यार भी उसी से करते थे। दोनों धीरे-धीरे कब बड़े हो गये पता ही नहीं चला।
एक दिन माँ ने अमित से कहा था,
''आकांक्षा जवान हो रही है। ज़रा ख़याल रखो।''
वह समझा नहीं था। माँ को भी बेटे से झिझक हो रही थी फिर भी किसी तरह धीरे से कहा था, ''...बड़ी हो गई है, ...स्त्री गुण ...मासिकधर्म शुरू हो चुके हैं।''
उसने दूर से आकांक्षा को देखा था... कब उसकी लाड़ली, कोमल-सी बेटी बड़ी हो गई उसे होश ही नहीं था। निकिता के पास से कम ही उठ पाता था। उसके सामने आकांक्षा से कम ही बात करता था। आकांक्षा भी अपने पापा से बेहद प्यार करती पर बोलने में झेंप, शरम और डर सभी का मिश्रण होता। मगर उस दिन तो पिता को देख आकांक्षा ने आँखें नीची कर ली थीं।
''अमित, बेटा ज़रा किसी को कह देना, इसे ठीक से समझा देगी। आजकल जो नयी चीज़े आई हैं, ला देगी और थोड़ा बता भी देगी। बेटा मुझे कुछ कम ज्ञान है। हमारे समय में ये सब नहीं था। फिर मुझे पता भी नहीं कहाँ मिलती हैं।''
बहुत सकुचाते हुए माँ ने कहा था। वह सुनकर हैरान हुआ था। माँ को उससे इतनी सब बातें करनी पड़ी थीं। अमित को उस दिन बहुत आत्मग्लानि हुई थी। देर रात उठकर धीरे से उसने बेटी के सिर पर हाथ फेरा था। आकांक्षा आँखें बंदकर जाग रही थी। उसके चेहरे पर डर और शरम की छाया स्पष्ट दिखाई दे रही थी। आज चाहकर भी वह अपने पिता से नज़र नहीं मिला पाई थी। इतने वर्षों में उसने अपने पिता को स्पर्श नहीं किया था। मन किया कि वो घंटों उसके पास ही बैठे रहे। उसकी बातें सुनें। पिता को देख उसे सुरक्षा का एहसास होता। मगर पापा तो उसे टुकड़ों में मिले थे और... उसने अपनी हाथों की कसी हुई मुट्ठियों में अपनी भावनाओं को जकड़ लिया था। किसी के कदमों की आहट ने उसका ध्यान खींचा था, आँखें धीरे से खोली तो पिता को कमरे से बाहर जाते देखा था। बस उनको पीछे से निहारती रही थी। और उनके ओझल होते ही भावनाएं आँसू बनकर आँखों से लुढक़ गई थी। और फिर उनके स्पर्श की अनुभूति को वो अंधेरे में ढूँढ़ने लगी थी।
निकिता के लिए भी अमित ही नेपकिन लाकर दिया करता था। मगर इस बार बीवी से छुपाकर बेटी के लिए लाने में उसे शरम महसूस हुई थी। निकिता को कहता तो पता नहीं कैसी प्रतिक्रिया करती। डर से चुप रहना ही उचित समझा था। पहले दिन उसे ऐसा करने में बड़ा अटपटा लगा था। चुपके से खरीदकर लाना और फिर धीरे से माँ को पकड़ाना। अजीब-सी परिस्थिति थी। युवावस्था के आते ही आकांक्षा और ज़्यादा डरपोक हो गई थी। उसका व्यक्तित्व निखर नहीं पा रहा था। किचन से बाहर निकलने का उसका दिल ही नहीं करता था। हाँ, दादी से ज़रूर कभी-कभी ज़िद्द कर लेती थी। थोड़ा लड़ भी लेती। जब माँ का मन अच्छा होता तो उससे भी थोड़ा बहुत बात कर लेती। और अक्सर अंत में उल्टी बातें सुन भी लेती थी।
बच्चों के स्कूल में अमित कभी-कभी ही जा पाता था। एक-दो बार निकिता को भी ले गया था। एक बार छोटी उम्र में आकांक्षा ने अपनी दादी को स्कूल ले जाने की ज़िद्द की थी। निकिता थोड़ी ठीक थी उस व़क्त। स्कूल में कार्यक्रम था। पहली बार आकांक्षा को भी मौका मिला था। बहुत खुश थी। उसका दिल किया कि सभी स्कूल आये। उसे क्या पता था कि यह उसका पहला ही नहीं आख़िरी कार्यक्रम भी होने वाला है...



 

 


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