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37.
अगले इतवार चारों आकांक्षा के साथ नरसिंगपुर गये थे। मालती को बहुत
मनाया मगर वह नहीं मानी और कहने लगीं,
''नहीं तुम लोग घूम फिर कर मस्ती करके आओ। मैं फिर कभी चलूँगी।''
निकिता ने एक बार भी नहीं कहा था। राधिका ही कहती रही,
''सब के साथ ज़्यादा मज़ा आता है।'' मगर माँ नहीं मानी। खुशी-खुशी
सबको विदा किया था। निकिता ने आकांक्षा का रास्तेभर कोई ध्यान नहीं
रखा था। अमित ने ही उसे गोद में उठाया था। पूरे समय निकिता खिडक़ी
से बाहर ही देखती रही। आकांक्षा के रोने पर अमित ही चुप कराता था।
राधिका से रहा नहीं गया तो कहने लगी,
''क्या बात है? दोनों बात ही नहीं कर रहे। चुप-चुप हो।''
''पढ़ाई कैसी चल रही है?'' श्याम ने बात आगे बढ़ाने कि कोशिश की
थी।
बातचीत का सिलसिला अभी शुरू हुआ ही था कि आकांक्षा ज़ोर से रोने लगी
थी, अमित ने चुप कराने की भरपूर कोशिश की थी अंत में हारकर निकिता
से कहा था, ''ज़रा देखना, क्यूँ रो रही है?''
निकिता ने आकांक्षा को अपने पास लेते ही ज़ोर से झकझोरा था। इतनी कम
उम्र में भी आकांक्षा सहम कर चुप हो गई थी, मासूम आँखों में डर उतर
आया था। अमित को प्यार आया तो उसने बेटी को निकिता के हाथों से
वापस लेकर ज्यों ही अपने सीने से लगाया आकांक्षा ज़ोर-ज़ोर से रोने
लगी थी। बीच-बीच में डर कर निकिता की ओर देख लेती। एक साल की बच्ची
इस उम्र में क्या समझती, कुछ देर बाद थककर अपने पिता की गोद में सो
चुकी थी। राधिका और श्याम को अजीब-सा लगा था। घर पहुँकर राधिका
शुरू-शुरू में अपने सास-ससुर, देवर-देवरानी से बातचीत में व्यस्त
हो गई थी। वहीं निकिता का दिल नहीं लग रहा था। वैसे तो श्याम के घर
वाले अमित और निकिता का विशेष ध्यान रख रहे थे। आकांक्षा को तो एक
मिनट के लिए भी कोई छोडऩे को तैयार नहीं था, मगर निकिता बिल्कुल भी
नहीं बोल रही थी। रात खाने में भी ज़्यादा बातचीत नहीं की। खाने के
बाद घर के बाहर बागीचे में सभी बैठे बातचीत कर रहे थे कि निकिता ने
अचानक वापस जाने की जो रट लगायी तो सुनकर श्याम हैरान हुआ था,
''अभी तो आए हैं। एक दिन तो रह लें।''
''नहीं आप लोग रहो, हम चलेंगे। ...अमित सुबह जैसे भी हो मुझे घर
जाना है।''
निकिता की बात सुनकर श्याम को बड़ा अजीब-सा लगा था। उसने अमित से
समझाने के लिए कहा था मगर वह चुप ही रहा। राधिका ने बहुत कोशिश की
थी मगर निकिता नहीं मानी। अंत में हारकर अमित को सुबह की ट्रेन से
निकिता को लेकर वापस आना पड़ा था। घर पर आकर उसने एक लंबी साँस ली
थी। मन-मस्तिष्क में कई सवाल रात से ही उभर रहे थे, मगर सबको दबाते
हुए उसने सिर्फ इतना ही कहा था,
''अगर मन नहीं था, तो हमें जाना ही नहीं चाहिए था।''
''क्यूँ? मज़ा आ रहा था तो फिर वहीं रह लेना था। सिर्फ दोस्त है
तुम्हारे लिये और हम कुछ नहीं।''
निकिता ने ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर सारा घर सिर पर उठा लिया था। जो भी
सामान हाथ में आता उसे या तो ज़मीन पर या फिर सामने की दीवार पर
फेंक कर तोड़ दिया जाता। मालती देखकर घबरा गई थी... क्या हो गया?
अच्छी-खासी गई थी। ...अमित भी डर गया था कि कहीं प्रेगनेंसी पर कोई
असर न पड़े। ज़ोर से कंधा पकड़कर समझाने की कोशिश की तो निकिता ने
पागलपन में सिर से सिर दे मारा था और चीखकर बोली थी,
''मारोगे?''
निकिता के सिर से खून निकल आया तो अमित देखकर घबराया था। झट दौड़कर
बैंडेड और डिटोल की शीशी ले आया था। पट्टी करने के लिए कहता मगर
निकिता को होश नहीं था। वह लगातार चिल्ला रही थी। आकांक्षा बिस्तर
पर लेटी-लेटी ताक रही थी। अधिक डर लगता तो आँखें बंद कर लेती। मालती
ने हाथ जोड़ लिये थे,
''बेटा माफ करो, अगर कोई ग़लती हो गई अमित से तो... मगर तुम्हें ऐसी
हालात में कुछ ऊँच-नीच न हो जाए।''
''तुम लोग तो चाहते ही हो, मैं और मेरा होने वाला बच्चा मर जाए। एक
तुम्हारी बेटी मेरे घर में वापस आ गई है, मरने के बाद, मुझे मारने।''
''तुम पागल हो क्या?'' अमित एकदम से चीख पड़ा था।
अमित को माँ को बिना वज़ह हाथ जोड़ते देख बहुत कष्ट हुआ था। दूसरे
सुप्रिया की बात वो भी आकांक्षा के लिए, इस तरह से बोलने पर उस पर
क्रोध सवार हो गया था। अचानक उसका हाथ उठा और एक ज़ोरदार तमाचा
निकिता के गाल पर था। एक मिनट के लिए चारों ओर सन्नाटा फैल गया था।
अमित का गुस्सा तो एकदम से उतर गया, परंतु निकिता पागल हो गई थी।
अमित को धक्का देते हुए दरवाज़े तक ले गयी।
''निकल जाओ यहाँ से। ...मारेगा मुझे? तुम जैसे हरामियों को पता ही
नहीं, कैसे लड़की से बात करते हैं। ...मारेगा मुझे? हाँ... मारेगा...''
दरवाज़े से बाहर निकालकर उसने अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया था। माँ
अंदर ही थी। आकांक्षा की ज़ोर से रोने की आवाज़ बाहर तक आने लगी थी।
निकिता का चिल्लाना और गालियां सड़क तक पहुँचकर अमित के कानों में
शीशा घोल रही थी। वो बेचैन हो उठा था। अगले ही पल हताश होकर सिर पर
हाथ फेरा तो आत्मग्लानि दिल में उतरने लगी थी। थोड़ी देर खड़ा-खड़ा
बाहर निकल रहे आदमियों से अपनी नज़र चुराता रहा। उसे लग रहा था सभी
उसकी ओर देख रहें हैं। घर के कपड़ों में ही थोड़ा दूर चलने से पहले
उसने दरवाज़ा धीरे से खटखटाया था। परंतु खुलने के कोई हालात नहीं
दिख रहे थे। सड़क पार पान की दुकान में पहुँचकर एक सिगरेट माँगी
थी। पहले कभी-कभी उसने श्याम के साथ शौक में पी रखी थी। मगर आज उसे
इसकी अधिक ज़रूरत महसूस हुई थी।
''पास में ही रहता हूँ। पैसे लाना भूल गया, अभी दे जाऊँगा।''
पान वाले ने बड़े ग़ौर से देखा था। देखा हुआ चेहरा लगता है और उसने
उसे सिगरेट दे दी थी। बहुत देर इधर-उधर टहलने के बाद भी कुछ समझ न
आया तो वह परेशान होने लगा था। ज़्यादा आत्मग्लानि से भरने लगा तो
फिर उसका अंतर्द्वंद्व शुरू हुआ था... उसे किसी भी हालात में तमाचा
नहीं मारना चाहिए था। दूसरा मन कहता... निकिता बात कैसे करती है।
...परंतु तुम्हें तमाचा मारने का कोई हक़ नहीं। उसकी सकारात्मक सोच
ने अपनी ग़लती को स्वीकार किया तो उसे और अधिक दुःख हुआ था। निकिता
की सारी बातें भूलकर उसके मन में अपने प्रति ही गुस्सा उभरा था।
अंत में यह सुनिश्चित करके घर की ओर गया कि वह निकिता से माफी
माँगेगा और उसे और अधिक खुशियाँ देगा। हाँ, रास्ते में यह सोचकर एक
मिनट के लिए परेशान हुआ कि पता नहीं माँ का क्या हाल होगा। उस
बेचारी ने तो कभी खुशियाँ देखी ही नहीं। अचानक मन में टीस हुई थी।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। निकिता अपने कमरे में बंद थी।
आकांक्षा बाहर के कमरे में बिस्तर पर गुमसुम लेटी थी। माँ रसोई में
थी। माँ-बेटे ने एक-दूसरे से नज़रें चुराई थीं। कहना तो दूर एक-दूसरे
के सामने पड़ने की हिम्मत भी न थी। हाँ, बेटी को जैसे ही अमित ने
सीने से लगाया वह डर कर अपना मुँह और छुपाने लगी थी।
देर शाम निकिता ने दरवाज़ा खोला तो अमित ने तुरंत कई बार सॉरी कहा
था। आँखें ज़ुबान से अधिक कह रही थीं। सुनते ही निकिता फिर से
सामान्य तो हो गई परंतु अमित अंदर से नॉर्मल नहीं हो पाया था। उधर,
माँ ने एकदम से खामोशी की चादर ओढ़ ली थी। निकिता अब हर बात पर अपनी
ही चलाती थी। अमित की हर बात का उल्टा ही करती। और उधर माँ आकांक्षा
को संभालती रहती।
अमित निकिता की खुशी के लिए उसे एक बार दिल्ली ले गया था। घर पर सभी
थे बड़ा भाई, भाभी, बहन, माँ-बाप। बहन बहुत खुश हुई थी। जीजा से
मज़ाक भी करती। अपनी तरफ़ से अमित ने सभी को इ़ज़्ज़त मान और खुशी देने
की कोशिश की थी। निकिता अपने घर में मस्त थी। सब पर खूब आदेश चलाती
पर लोग उसे ज़्यादा तवज्जह नहीं देते थे। घर के लोग अमित के साथ भी
बस ठीक-ठीक ही व्यवहार करते थे।
एक दिन घर पर कम्पोज और एंटी डिप्रेशन टेबलेट को देखकर अमित ने बहन
प्रणिता से पूछा था,
''ये टेबलेट कौन लेता है?''
''पापा, जब उन्हें नींद नहीं आती।''
थोड़ा आश्चर्य हुआ था उसे। एक शाम सभी घर की महिलाएं बैठी थी तो
अमित को भी वहीं चाय दे दी गई थी। भाभी पूछने लगी थी... कैसी है
हमारी निकिता,
''बहुत अच्छी है, बढ़िया है, मगर थोड़ा ज़िद्दी बच्चा है।''
अमित ने बड़े मज़ाक में निकिता को छेड़ते हुए कहा था। मगर निकिता
सुनकर एकदम से उखड़ गई थी। अचानक चिल्लाकर बोलने लगी,
''इन लोगों से शादी करके तो मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गयी। एक ये, और
एक इनकी माँ, बड़ी सीधी बनती है। मगर दिनभर कान भरते रहती हैं। दोनों
माँ-बेटे मिलकर दिनभर तंग करते रहते हैं। छोटे शहर के छोटे लोगों
से उम्मीद ही क्या कर सकते हैं। इनकी सोच भी छोटी होती है। इन्हें
पता ही नहीं बहुओं को कैसे रखा जाता है।''
निकिता ने माँ, आकांक्षा और उसे खूब गालियाँ दी थी। सारे सुनते रहे
थे। अमित सुनकर भौचक्का रह गया था। मानसिक रूप से अत्यधिक कष्ट हुआ
था। पत्नी के शब्द तीर के समान लग रहे थे और वह लहूलुहान हो रहा
था। उसका मन किया कि वह वहाँ से भाग जाये। आकांक्षा बिस्तर पर रो
रही थी। बीच में निकिता की माँ ने बड़े साधारण ढंग से कहा था,
''हमारे अड़ोस-पड़ोस में लोग रहते हैं। निकिता, धीरे बोलो। क्या
सोचेंगे लोग? अपने घर जाकर लडऩा। जो कुछ है तुम्हीं ने खुद पसंद
किया था।''
''इसलिए तो कह रही हूँ कि मेरी किस्मत ही खराब कर दी इन लोगों ने।
मुझे सब मिलकर मारना चाहते हैं।''
कहते-कहते वह और ज़ोर से रोने लगी थी। उसकी माँ और भाभी उसे चुप करा
रहे थे। प्रणिता भी उसे देख रही थी। अमित की ओर किसी का ध्यान ही
नहीं गया था। वह यह सब देखकर दंग रह गया था। उसे कुछ समझ ही नहीं
आया कि एक मिनट में क्या हो गया। परंतु आज उसे क्रोध नहीं, हताशा
हो रही थी। बिखरने के कगार पर खड़ा था। सोचने समझने की शक्ति खत्म
हो चुकी थी। अपने को समेटने की कोशिश में सोचता रहा... ससुराल में
सुना था, सबसे ज़्यादा प्यार और इज़्ज़त मिलता है, वहीं उसकी इतनी
बेइज़्ज़ती होगी, सोचा नहीं था। मगर किसलिए? उसका कसूर क्या है? अब
वह इतना ग़रीब भी नहीं। फिर उसकी बेइज़्ज़ती सासूजी ने कैसे होने दी?
...अमित वैसे बहुत शांत और सरल स्वभाव का था पर आज उसे क्रोध आ रहा
था। परंतु एक बार क्रोध में की गई गलती से आत्मग्लानि होते, वह देख
चुका था। इसलिये किसी तरह वह चुप ही रहा। मगर सबके सामने अपमानित
होने से वह अंदर तक टूट गया था। वह फिर इस बात को पूरी ज़िंदगी नहीं
भूल पाया था। वह आज तक नहीं समझ पाया कि उसका अपमान क्यूँ और
किसलिये किया गया था। निकिता का व्यवहार वह पहले भी देख चुका था।
मगर जो उसके अपमान में दर्शक बने थे, क्या वह उसके किए जवाबदार नहीं
थे? चाहते तो रोक सकते थे, कम से कम डाँट सकते थे। उनकी बेटी है
ज़रूर असर पड़ता। क्या उसका कोई वजूद नहीं? क्या उसकी कोई इज़्ज़त नहीं?
क्या वह निकिता और उसके घर वालों के लायक नहीं? क्या वह इतना
पढ़ने-लिखने के बावजूद, समाज में आज भी बेकार है? ऐसा अब लगता तो नहीं।
निकिता और उसके बीच में अब कोई ज़्यादा फ़र्क नहीं महसूस होता। तो
फिर क्या यह उसकी शराफत और सीधा बने रहने का इनाम है? शायद.. तो
फिर क्या करे, दूसरों की तरह वह भी बेज़्ज़ती करने लगे? नहीं! नहीं!
अपनों से ऐसा नहीं किया जाता। मगर सामने वाला तो समझ ही नहीं रहा।
इस अंतर्द्वंद्व में उसके मन में आया कि वह भी ससुराल में सब को कहे
कि तुम्हारी बेटी को मैंने नहीं फँसाया, उल्टा बचाया है, और सारी
कहानी सुना दे। मगर ऐसा वह कर नहीं पाया। यह उसकी फ़ितरत में शामिल
नहीं था। और वह बाकी व़क्त चुप ही रहा। निकिता एक बार पुनः सामान्य
हो गई थी। जैसे कुछ हुआ ही नहीं। घर वालों के लिए अमित का कोई
अस्तित्व ही नहीं था। चलते व़क्त सास ने, माँ के लिए साड़ी और अमित
के लिए शर्ट दिया तो चुपचाप लेकर वह विदा हुआ था। वापसी में निकिता
अपने माँ-बाप और भाई-भाभी की तारीफ़ करती रही तो अमित सुनता रहा था।
अपने अपमान की कीमत उसे एक साड़ी और शर्ट के रूप में मिली थी। यह
सोचकर एक बार अंदर ही अंदर हँसा ज़रूर था, और फिर एक बात का प्रण
ज़रूर कर लिया था कि अब वह कभी दिल्ली नहीं जायेगा। जहाँ प्यार नहीं
वहाँ अपमान के लिए क्यूँ जाना। निकिता की बात और है, उसने उसे दो
पल का प्यार और आकांक्षा जैसी बेटी और एक बंधन, आख़िर कुछ तो दिया
है। मगर जिन्होंने कुछ भी नहीं दिया, उन्हें उसे अपमानित करने या
उसमें भागीदार होने का कोई हक़ नहीं।
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