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33.
अमित और मालती बहुत ही सरल स्वभाव के थे। सुप्रिया को गये पूरे छह
दिन हो गये थे। धीरे-धीरे वे इस सदमें से निकलकर निकिता की देखभाल
करने लगे। घर पर पूजा-पाठ का माहौल था। शुद्धीकरण के लिए बड़े
बुजुर्गों की सलाह पर सातवाँ दिन रखा गया था। हवन भी होना था।
उस रात, निकिता काफी परेशान थी। डाक्टरी ज्ञान और मानवीय दुःख-दर्द
का एहसास, दोनों में बहुत फ़र्क है। अमूमन डाक्टर भी एक रोगी जैसा
ही व्यवहार करता है। निकिता सब कुछ समझती तो थी। पर वह भी एक
सामान्य गर्भवती महिला जैसा ही व्यवहार कर रही थी। बीच-बीच में उसने
बच्चों जैसी भी हरकत कर दी थी।
माँ सारी रात उसके सिरहाने पर ही खड़ी थी। अमित बार-बार उसे दिलासा
दे रहा था। मगर निकिता है कि अपना बचपना कम नहीं करना चाहती थी।
रात के करीबन दो बज चुके थे। प्रसव पीड़ा अत्यधिक थी। रात है कि
बीतने का नाम नहीं लेती। मालती माँ के साथ-साथ एक नर्स का भी रोल
अदा कर रही थी।
निकिता अमित को एक मिनट के लिए भी दूर नहीं होने देना चाहती थी।
नर्सों ने मज़ाक भी बनाया था,
''मैडम, आप तो मरीज़ों को और माताओं को डाँटा करती थी। मगर आप खुद...''
''चुपकर।''
निकिता ने बड़े ही बचपने में नर्स को झिड़क के कहा था।
अमित ने भी इस मौके का फ़ायदा उठाने में चूक नहीं की थी। मज़ाक में
कहने लगा, ''तू तो बहुत हिम्मत वाली बनती थी। कहती थी, ये सब बेकार
है, क्यों अब चीर-फाड़ कर दें?''
''नहीं! नहीं!''
चूँकि पीड़ा बढ़ती जा रही थी। इसलिए डाक्टर ने ड्रिप चढ़ा दिया था।
मेडिकल कालेज की छात्रा होने से वार्ड में स्पेशल रूम मिल गया था।
निकिता की बहुत ही अच्छे ढंग से देखभाल हो रही थी। अमित और निकिता
के बीच में बंधन की एक नयी परिभाषा लिखी जानी थी। असीम सुख की
अनुभूति थी। शिशु बालक हो या बालिका इस बात में अमित की कोई खास
दिलचस्पी नहीं थी। हाँ, निकिता ज़रूर कहती थी,
''देखना माँ, लड़का होना चाहिए।''
''क्यों भई तू तो पढ़ी-लिखी है, खुद भी डाक्टर है, लड़की क्यों नहीं।''
''वो बात नहीं है माँ, बस लड़का होना चाहिए।''
''कोई बात नहीं, अच्छा, लड़का ही होगा।''
माँ उसे समझाते हुए अक्सर कहती थी। वैसे माँ की आँखों में भी अमित
ने कुछ ऐसे ही भाव देखे थे। लगता था उसकी भी चाह एक पोते के लिए
थी। नारी चाहे जितनी उन्नति कर ले, यह उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है।
स्वयं नारी दूसरी नारी को पसंद नहीं करती। लड़कियों को माँ के सामने
पिता, बहन की अपेक्षा भाई और बेटी से ज़्यादा बेटा अच्छा लगता है।
वैसे तो यही बात नर के लिए भी होती है, परन्तु उनमें तीव्रता नारी
से कम होती है।
''मुबारक हो डाक्टर साहब, लक्ष्मी हुई है।''
नर्स ने बहुत खुश होकर कहा था। एक सेकंड के लिए अमित कुछ भी समझ नहीं
पाया। जिस खुशी का आपको बेसब्री से इंतज़ार होता है वह पल आने पर आप
बहुत ज़्यादा कुछ समझ ही नहीं पाते कि उसमें कैसे और क्या किया जाये।
जितना इंतज़ार में मज़ा होता है उतना शायद उस पल में नहीं। और ऐसा ही
कुछ हुआ था। अमित खुश होकर मुस्कुराता हुआ लेबर रूम के अंदर गया तो
डाक्टर ने बताया कि सब ठीक है।
निकिता बहुत शांत दिख रही थी। उसकी आँखों में प्रसव की पीड़ा का
असर था। माँ ने भी कहा था,
''सब ठीक है। ...बधाई हो बेटा, अमित तू बाप बन गया।'' बोलते हुए
उसने बेटे के सिर पर हाथ फेरा था। अमित की आँखों में चमक उभरी थी।
एक नन्ही-सी, नाजुक-सी, गुलाब की पंखुडिय़ों-सी कोमल कली निकिता की
बगल में लेटी थी। देखते ही अमित को लगा कि जैसे सुप्रिया का
पुनर्जन्म हुआ है। बच्चे की मासूम आँखों को देखकर भावावेश में अमित
की आँखों में पानी उतर आया था। एक मिनट में निकिता, मातृत्व के सुख
में छोटे से एकदम बड़ी हो गई थी। होंठों के किनारे से निकली हल्की-सी
मुस्कराहट सारे चेहरे पर फैल गई थी। अमित ने उसके हाथों को अपने
हाथों में लिया तो इस स्पर्श में एक नये बंधन की अनुभूति थी।
अमित की आँखों में उतरे पानी को निकिता देख तो सकती थी, पर उसे पढ़
नहीं पाई थी। उसने स्पर्श को महसूस तो किया था पर उसकी गर्माहट
में, एक अलग एहसास को, समझ नहीं पाई थी। अमित के लिए पुराने बंधन
नये रूप नयी परिभाषा लेकर आए थे। यह जीवन के नये रिश्तों की शुरुआत
थी।
''लीजिए न डाक्टर साहब, गोद में लीजिए।''
नर्स ने गुडिय़ा की उठाते हुए कहा था। अमित ने निकिता की ओर देखा तो
उसने आँखों के इशारों से मना किया था। और फिर अपने पास बुलाकर उसके
कान में धीरे से फुसफुसायी थी,
''तुम्हारे हाथ गंदे होंगे, पहले धोकर साफ़ करो।''
अमित एक मिनट समझ ही नहीं पाया। फिर सोचने लगा कि बच्चा छोटा है उसे
कोई इनफेक्शन न हो जाये, इसलिए हाथ धोने को कह रही होगी। डाक्टर
है। यह सोचते ही एकदम से उसके चेहरे पर मुस्कुराहट उभरी थी। कितना
प्यार है अपने बच्चे से, एक पढ़ी-लिखी डाक्टर माँ का। उसे क्या पता
था कि यह किसी और बात का संकेत है। हाथ साफ़ करने के बाद ही, अमित
ने नन्ही गुडिय़ा को अपने हाथों में लिया था। जीवन एक अनोखा चक्र है
तो प्रकृति अपने आप में एक रहस्य। एक जीवनचक्र अभी खत्म हुआ नहीं
और दूसरे की उत्पत्ति हो जाती है। गुलाब की पंखुड़ी जैसे कोमल-कोमल
नन्हे-नन्हे पाँव और हथेलियाँ, ओस की बूंदों से नाज़ुक त्वचा और एक
अलौकिक मनमोहक मुस्कुराहट बिखेरती एक नन्ही-सी परी, अमित को जिसका
पिछले कई महीनों से इंतज़ार था, वह अब उसके हाथों में थी। यह लक्ष्मी
है या सरस्वती, पता नहीं पर उसकी बेटी ज़रूर थी। माँ, बहन और पत्नी
के बाद नारी एक नये रूप में। अमित एक नये बंधन में बंध रहा था। उसने
निकिता की ओर देखा, उसकी आँखों में प्रेम का नया दृष्टिकोण था। वह
मातृत्व की भावनाओं से एक ही पल में जननी बन चुकी थी।
नये आनंद की अनुभूति और मातृत्व के सुख का एहसास दिलाने, एक
जीता-जागता जीव, बालिका के रूप में निकिता के बगल में अठखेलियाँ
खेल रही थी। मातृत्व का सुख एक ऐसा सुख है जो सिर्फ माँ ही समझ सकती
है। जो कहीं भी, किसी भी और तरह से, जबरदस्ती अनुभव नहीं किया जा
सकता। उसके चेहरे पर भी उसी अलौकिक सुख की अनुभूति थी। अमित की ओर
मुस्कुराते हुए, उसकी आँखों ने एहसास दिलाया था। बोलती हुई नज़रें
कह रही थीं,
'हाँ, बालिका हमारे अस्तित्व की पहचान है।'
निकिता ने करवट बदली, नन्ही बालिका ने अपने कोमल-कोमल हाथों से उसे
छूने की कोशिश की थी। उन नाजुक उँगलियों ने जब निकिता के होंठों और
गालों को स्पर्श किया तो उसे लगा कि उसके शरीर का ही कोई अंग उससे
बाहर निकलकर उसे अपना स्वतंत्र अस्तित्व बताने की चेष्टा कर रहा है
और साथ ही फिर से जुडऩे की कोशिश भी कर रहा है। उसके हृदय में
स्पंदन था। निकिता ने महसूस किया कि माँ बनने का सुख, मानव के जीवन
में शायद सबसे अमूल्य, अद्वितीय, अनोखा और अद्भुत है।
बालिका की कोमल मुस्कुराहट, उसका आँखें बंद करके एक ही पल में सो
जाना। निकिता ने पहली बार महसूस किया कि आज कोई उसके संरक्षण में
है। और वहीं से एहसास हुआ, बड़े होने का। पहली बार निकिता ने जीवन
में, उम्र के इस मोड़ पर अपने आपको परिपक्व समझा था। बड़ी लाइन के
सामने छोटी लाइन की उत्पत्ति हो चुकी थी। एक बेटी, एक बहू, एक पत्नी
अब माँ भी बन चुकी थी। इस बंधन के लिए वह कितने दिन से तड़प रही
थी। ...किसी ने कभी इस नये बंधन के लिए मना किया था और होने नहीं
दिया था। ...नहीं-नहीं कुछ नहीं हुआ था। वह तो कोई बुरा सपना था।
अब सब ठीक है। पर हुआ क्या था? ...निकिता की आँखें अचानक चारों ओर
घूमने लगी थीं। बालिका के हाथ वक्षस्थल पर बार-बार पड़ रहे थे।
अमित की ओर देखते हुए, उसने बालिका को अपने पास इतने नज़दीक चिपटाया
कि कब बच्चा उसके शरीर को चूसने लगा उसे होश नहीं था। इसी बीच उसका
मस्तिष्क अनियंत्रित और अव्यवस्थित होने लगा था, अचानक उसकी भावनाएं
समाप्त हो रही थी और वह पुनः भावविहीन होकर शून्य में ताकने लगी
थी।
अमित सब कुछ अपनी आँखों से देख तो रहा था साथ ही अनुभव करने की
कोशिश भी कर रहा था। वह दोनों के बीच था भी और नहीं भी। निकिता की
तरफ़ से दी गई सबसे अनमोल भेंट में उसका अंश भी था। उसका उससे
जुड़ाव था, मानसिक रूप से भी और भावनात्मक रूप से भी।
''देखो मेरे पेट में, वह यहाँ से वहाँ चला गया।''
निकिता ने एक बार कहा था। अमित ने तुरंत उसे टोका था,
''तुम ऐसा क्यों कहती हो कि यहाँ से वहाँ चला गया। यहाँ से वहाँ चली
गई, ऐसा क्यों नहीं कहती?'' अमित याद कर रहा था कि उसने बालिका को
निकिता के गर्भ में कई महीनों तक महसूस किया था। वैसे तो निकिता ने
उसे अपने शरीर के अंदर विकसित किया था, परंतु उसकी अनुभूति अमित ने
हर पल महसूस की थी।
माँ और बच्चे का बंधन शायद प्रकृति के सभी अन्य रिश्तों व संबंधों
में, न केवल महत्वपूर्ण बल्कि सम्पूर्ण भी है। यह न केवल भावनात्मक
है, बल्कि शारीरिक और एहसास का भी बंधन है। शिशु अपनी माँ से उसके
अंश के रूप में जुड़ा रहता है। कैसी भी माँ हो और कैसा भी बच्चा,
प्राकृतिक रूप से माँ अपने बच्चे की आवाज़ और स्पर्श मात्र से सब
कुछ समझ जाती है। परंतु निकिता की मानसिक अवस्था भिन्न हो चुकी थी।
वह कुछ ही पल में माँ के दायरे से बाहर थी। शून्य में ताकते-ताकते
उसे पता ही नहीं चला कि बालिका के मुख से दुग्ध स्त्रोत, उसका स्तन
हिलकर छिटक चुका है। मालती ने सोचा कम उम्र की है अभी समझ नहीं है।
उसने अमित को शरमाते हुए बाहर किया और निकिता को दूध पिलाने का
तरीक़ा बताकर अपना फ़र्ज़ अदा करने लगी। और निकिता एक बार फिर वापस
अपनी दुनिया में थी।
माँ ने थोड़ी देर बाद बाहर आकर अमित से कहा था,
''बेटी का जन्म बड़े शुभ मुहूर्त में हुआ है। आज ही सुप्रिया के
नाम का घर पर हवन भी है। हमें उसे खुशी-खुशी मनाना चाहिए। धर्म और
कर्म भी यही कहता है। ब्राह्माण को घर जाकर भोजन कराके, मंदिर में
दुर्गा माता के दर्शन कर लेना। सुप्रिया वापस हमारे बीच में
है...'' और बोलते-बोलते माँ की आँखों में खुशी के आँसू छलक उठे थे।
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