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31.
कोर्ट मैरिज की तारीख़ तय हो गई थी। निकिता के माँ-बाप उसी दिन सुबह
आए थे। बहुत कहने पर भी श्याम के घर पर न रुककर होटल में ठहरे थे।
दिन मे कोर्ट मैरिज के बाद मंदिर में फेरे, फिर रात का खाना होटल
में था। कालेज के लगभग सभी दोस्त, स्कूल के कुछ पुराने मित्र और
मोहल्ले के अधिकांश पड़ोसी इकट्ठा हुए थे। घर के मालती और सुनीता
के अलावा अदिति, श्याम और राधिका तो थे ही। मालती पहले मना करती रही,
सुप्रिया कारण थी। मगर सुप्रिया ने ही जाने के लिए कहा था। अमित कम
से कम शाम को होटल में सुप्रिया को भी ले जाना चाहता था। परंतु कोई
तरीक़ा नहीं सूझ रहा था। सब के लिए नये कपड़े सिलवाये गये थे। अमित
ने बहन के लिए भी नयी ड्रेस बनवाई थी। उस दिन सुबह-सुबह ही माँ ने
पहना दिया था। देखते ही अमित ने छेड़ा था,
''बड़ी सुंदर लग रही है। एकदम हीरोइन।'' सुप्रिया शरमा गई थी। और
फिर भाई को भी सजता देखकर बहुत खुश थी। देर शाम सब चले गये थे उसे
पीछे अकेला छोड़कर। आज उसे पहली बार अपने पर खीज और ईश्वर पर क्रोध
आया था। पहली बार उसे दुःख का एहसास हुआ था। आँखें इंतज़ार करतीं,
दरवाज़े पर ही टिकी थी। जैसे-जैसे रात गहराने लगी उसे थोड़ी-सी
नाराज़गी होने लगी थी और फिर वह थोड़ी-सी रूठ भी गई थी। निकिता
सुंदर-सा लाल जोड़ा पहनकर देर रात घर आई थी। माँ और अमित साथ थे।
घर में अचानक चहल-पहल हो गई थी। सारा मोहल्ला इकट्ठा था। सभी निकिता
की ओर आकर्षित थे। मगर सुप्रिया आज कोने में अकेले लेटी रह गई थी।
...और क्या करती?
'थोड़ा समझना चाहिए। नयी बहू आई है। उसकी खातिर होनी चाहिए।'
वह अपने आप को समझा रही थी। उसे भी आज आगे-आगे खड़ा रहना चाहिए था
मगर वह असमर्थ थी। वह भीड़ के पीछे एक कोने से, बिस्तर पर लेटे-लेटे
लोगों की पीठ को देख रही थी। जब दुःख हद से बढ़ गया तो उसकी अपंगता
आँखों से आँसू बनकर गिरने लगी और भावनाओं के आक्रोश में नीचे का
बिस्तर भी गीला हो गया था। नये कपड़े, नीचे से खराब हो गये थे। मगर
आज उसने आवाज़ नहीं लगाई थी। जब धीरे-धीरे सारे मेहमान चले गये तो
माँ की निगाह उस पर पड़ी थी। मुस्कुराकर पहले जैसे ही कहने लगी,
''गंदा बच्चा।'' मगर आज सुप्रिया नहीं मुस्कुराई थी। कारण था, उसका
दुःख आज माँ भी नहीं देख पाई थी।
सभी मेहमानों के जाने के बाद अमित रोज़ की तरह सुप्रिया के पास आकर
बैठा और बात कर रहा था कि अचानक बीच में निकिता हाथ पकड़कर उसे अंदर
ले गई और लिपट कर कहने लगी,
''हमसे बातें कब करोगे? बहन के पास ही बैठे रहोगे? …आज तो हमारी
सुहागरात है।''
आँखों में शरारत थी।
इन लाइनों ने अमित को सोचने पर मजबूर कर दिया था। पहले ही दिन
प्यार के इन कोमल क्षणों में उसे इस तरह की बातों की ज़रा भी उम्मीद
नहीं थी।
लेकिन जो आदमी ज़्यादा समझदार और संवेदनशील होता है वह हर चीज़ को
दूसरे के पहलू में भी रखकर सोचता है। अमित ने भी निकिता के पहलू
में रखकर सोचा... पहला दिन है, सभी औरतें अपने पति का साथ चाहती
हैं। इसलिए उसे मन में कोई भी ग़लत विचार नहीं पैदा करना चाहिए।
हाँ, अगर वह ऐसा नहीं करती या कहती तो कितना ही अच्छा होता ...और
फिर कुछ देर रुककर तो मिलना ही था। ...वैसे अगर वह भी सुप्रिया से
कुछ देर बात कर लेती तो और कितना बढ़िया होता।
निकिता उसके एकदम करीब थी लेकिन विचारों ने अभी अमित को दूर कर रखा
था। बिस्तर पर लेटकर भी दिमाग़ ही क्रियाशील था... तो क्या एक नये
बंधन में बंधने जा रही औरत, उस बंधन में पहले से बंधे हुए दूसरे
रिश्तों को तोड़ना चाहती है? ...वह मेरे पास आई मेरी बाँहों में, उसे
उसी रूप में पूर्णतः आत्मसात् किया तो क्या उसे मुझे मेरे इसी रूप
में आत्मसात् नहीं करना चाहिए? ...पढ़ी-लिखी, वो भी डाक्टर इस बात
को कैसे नहीं समझ पायी कि एक अपाहिज इंसान की क्या मानसिकता होती
है? ...एक डाक्टर और एक औरत, क्या उसके दो रूप हैं? ...हाँ, शायद।
तभी तो ऐसा हो सकता है कि वह पहले दिन मुझे किसी और से नहीं बाँटना
चाहती हो। ...पर क्या कुछ पल के लिए इंतज़ार नहीं किया जा सकता था?
कई सवाल और उनके जवाब आने लगे थे। अमित ने सुप्रिया की आँखों में
निकिता के लिए असीम प्यार और आशा देखी थी। मगर वह इंतज़ार ही करती
रह गई थी। निकिता ने अपने दो पल भी उसे नहीं दिए थे।
अमित के मौन ने निकिता को थोड़ी देर में ही विचलित कर दिया था।
दूसरी तरफ़ से कोई पहल न होती देख उसे अपनी बाँहों में लेकर कहने लगी,
''मुझे तुम्हारे बिना एक पल भी अच्छा नहीं लगता।''
निकिता के प्यार के आगोश में अमित धीरे-धीरे पिघलने लगा था। घर
में, आगे और पीछे के कमरे एक के पीछे एक थे। आगे के कमरे वालों को
पीछे बाथरूम जाने के लिए पीछे के कमरे से जाना होता और पीछे के कमरे
वाले को बाहर आगे आने के लिए आगे के कमरे से होकर जाना पड़ता। ऊपर
से पीछे के कमरे में रसोई। माँ ने पीछे जाने की सोची तो निकिता और
अमित को इतनी जल्दी इस हालात में देखकर शरमा कर फिर आगे के कमरे
में आ गई थी। पूरी रात वह न तो रसोई में जा सकती थी और न ही पीछे
शौचालय। पूरी रात बैठी रही थी। उस रात ही उसने सोच लिया था कि वह
आगे का कमरा बेटा और बहू को दे देगी। वह और सुप्रिया पीछे के कमरे
में रह लेगें। फिर अमित या निकिता को पीछे जाना हो तो जा सकते हैं।
अमित अगले दिन जल्दी ही उठ गया था। निकिता सोती रही। माँ ने
धीरे-धीरे रसोई में काम किया था। बहू है, बड़े घर की, नयी-नयी है,
आराम चाहिए। उसे याद आ रहा था कि उसके और आज के ज़माने में कितना
फ़र्क आ चुका है। निकिता ने सुबह उठकर, बैठे-बैठे ही अमित को पुकारा
था। सुप्रिया के पास बैठा अमित पेपर पढ़ रहा था।
''हाँ, बोलो''
''मेरे पास आओ...''
पेपर उठाकर अमित निकिता के पास पहुँचा तो वो मुस्कुरा रही थी। पास
ही माँ रसोई में काम कर रही थी। निकिता ने सास की ओर ध्यान ही नहीं
दिया था। अमित ने मौन ही रखा था। बिस्तर पर एक किनारे बैठकर एक नज़र
निकिता पर डाली ज़रूर मगर कुछ और सोचने लगा था... अगर निकिता दो पल
माँ का हाथ बंटाए तो कितना अच्छा लगेगा। मगर... उसने तो अभी तक माँ
या सुप्रिया से बात भी नहीं की है... कोई बात नहीं... सोचा निकिता
के भी कुछ ख़्वाब होंगे, आजकल तो पति-पत्नी कई-कई दिनों तक शुरू में
अकेले हनीमून पर जाते हैं। यहाँ तो घर भी छोटा है और ऊपर से माँ और
बहन। ...लेकिन क्या निकिता कुछ दिन इंतज़ार नहीं कर सकती? ...कुछ
कमाने लगेगा तो मकान भी ले लेगा। ...परंतु इसमें निकिता का क्या
कसूर, इस तरह से तो उसकी उम्र ही निकल जाएगी। ...अमित के मन में
सवाल और जवाब का दौर शुरू हो चुका था। संवेदनशील जो था। जो भावुक
होगा वह सभी रिश्तों में, बंधन में, संवेदना दिखायेगा। अमित एक बार
फिर अखबार पढ़ने लगा था। उसके पास हर सवाल का जवाब नहीं था।
धीरे-धीरे यूँ ही दिन गुज़रने लगे और रात जवान होती रही। अमित ने एक
बात ज़रूर नोट की थी कि निकिता कभी बहुत गुमसुम हो जाती और शून्य
में ताकती रहती तो कभी माँ से खूब बातें करती। हाँ, सुप्रिया के
साथ मुस्कुराकर सिर्फ हालचाल पूछ लेती थी। उसके पास बैठकर कभी-भी
बातें नहीं करती थी। अमित ने इसका कारण जानने की कोशिश की मगर इसकी
कोई वज़ह नहीं समझ आ रही थी।
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