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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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3.

अमित एकदम शांत अस्पताल के बिस्तर पर लेटा हुआ था। उसे अब तक होश नहीं आया था। लेकिन एन्जाइम का इंजेक्शन व ऑक्सीजन के मिलते ही उसके दिल ने बेहतर कार्य करना शुरू कर दिया था और वह धीरे-धीरे संतुलित हो चला था। अमित को स्थिर देखकर अदिति ने आकांक्षा को पास के कमरे में आराम करने के लिए कहा था पर वह अपने पापा के पास ही खड़ी रही थी। अदिति अमित के हाथों को अपने हाथों में लेकर, पास ही स्टूल लगाकर, बैठे-बैठे डाक्टर खुराना का इंतज़ार करने लगी थी। उसे आज अमित पर बहुत ज़्यादा प्यार आ रहा था। बचपन का साथ है। उसकी आँखें लगातार ई.सी.जी. ग्राफ के ऊपर चली जाती थी। बचपन के साथी की ऐसी हालत देख वह विचलित थी। उसका मन कर रहा था कि वह आज अमित के चेहरे को अपने सीने से लगाकर भींच ले। कई बार उसका हाथ अनायस ही अमित के सिर पर पहुँचकर उसके बालों को संवारने लगता। वह उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर लगातार सहला रही थी। उसे आज अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था। अमित ने कई बार उससे सहारे की, अपने दर्द को बाँटने की कोशिश की थी। परंतु सदैव अदिति ने उस सहारे को प्यार, आकर्षण और ग़लत दृष्टिकोण से ही देखा था। आदमी को जीने के लिए जिस तरह से ऑक्सीजन की ज़रूरत है, उसी तरह प्यार की भी आवश्यकता होती है। और वह आज अमित के दुःख को समझ रही थी। निकिता को वह काफी दिनों से जानती थी। उसका व्यवहार अब उसके लिए कोई नया नहीं रह गया था। पर हालात इतने खराब होंगे उम्मीद नहीं की थी। वह बार-बार घड़ी की ओर देखती और फिर अमित की ओर उसकी नज़र चली जाती। अब वह चाहती थी कि उसका बचपन का साथी एक बार उठकर खड़ा हो जाये, फिर वह उसको कभी इस हालत में नहीं पहुँचने देगी। वह सोचती रही कि यह रात किसी भी तरह से बीत जाये, और दुआ करने लगी कि अमित को जल्द से जल्द होश आ जाये। आज पहली बार भगवान से कुछ माँगने लगी थी। वैसे तो ईश्वर से उसका रिश्ता कभी भी बहुत ज़्यादा मज़बूत नहीं था, उसे उस पर बहुत ज़्यादा विश्वास भी नहीं था, परंतु आज उसका मन पहली बार कुछ मांगने के लिए आगे बढ़ा था। वह भी अपने लिए नहीं किसी और के लिए। आज अगर अमित उससे कुछ भी कहता, वह सब कुछ सुनने को तैयार थी। किसी के लिए दर्द हद से अधिक बढ़ जाये तो प्यार के स्त्रोत फूट पड़ते हैं। पता नहीं कैसे-कैसे विचार उसे आने लगे थे। वह यहाँ तक सोच बैठी कि वह अब अमित को, माँगे बिना, अच्छे दोस्त का प्यार और अपनापन देगी। उस पर उसकी अपनेपन की भावना इतनी बढ़ गई कि उसने उठकर अमित के बालों को सहलाते हुए, माथे पर धीरे से चुम्बन लिया था और मन ही मन कहने लगी,
''अमित... तुम्हें कुछ भी नहीं होगा, सब ठीक हो जायेगा।''
यह सोचते हुए उसकी आँखों में कब आँसू आ गये, वह यह जान भी नहीं पाई थी। पीछे दूर खड़ी आकांक्षा सब कुछ देख रही थी। उसने सुना था कि अदिति आँटी पापा के बचपन की दोस्त हैं। पर इतना अपनापन होगा यह आज ही देखा और समझा था। तभी पीछे से सिस्टर की आवाज़ ने अदिति को अपनी सोच से बाहर किया था।
''मैडम इमरजेंसी है।''
''क्या हुआ?''
''पेशेंट सीरियस है। लूज मोशन हो रहे हैं, साथ ही खून आ रहा है। लिक्विड काफी बह चुका है। बेहोशी की हालत में है।''
''क्या उम्र है?''
''मैडम, 35 या 40 का होगा।''
''और कोई साथ में?''
''उसकी औरत है, बहुत रो रही है। लगता है कुछ ज़्यादा ही पीता है। डाक्टर अमित का पेशेंट है।''
''बेड खाली है?''
''जी।''
''एडमिट करके, ग्लुकोज़ की ड्रिप चढ़ाओ।''
''ठीक है।''
''मैं अभी पहुँचती हूँ।''
आँसू आँखों से निकलकर जगज़ाहिर हों, इसके पहले ही उसे रूमाल से पोंछकर, चेहरा और बालों को हाथों से ठीक किया गया था और फिर दूसरी सिस्टर को आकांक्षा के साथ अमित के पास छोडक़र वह उस मरीज़ की ओर बढ़ गई थी। पहुँचते ही उसने मरीज़ की औरत को बिना कुछ पूछे हुए काफी डाँट लगा दी थी। उसके रोने में कमी न होने पर, उसे बाद में महसूस हुआ कि वह आज बेवज़ह निकिता का गुस्सा उस औरत पर उतार रही है। औरत बार-बार अपने आदमी को बचाने के लिए, अदिति का गुस्सा सहते हुए, हाथ जोडक़र खड़ी थी। उस व़क्त अदिति उसके लिए भगवान स्वरूप थी। अदिति को इन सब चीज़ों को देखने की आदत-सी हो चुकी थी। परंतु एक ख़याल ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था। एक तरफ़ अमित था और एक तरफ़ यह आदमी। कहाँ वह एकदम अकेला, कहाँ इसके साथ खड़ी हुई उसकी धर्मपत्नी।
''कार्ड और केस पेपर कहाँ है सिस्टर?''
केस पेपर देखने पर अदिति को पता चला कि वह अल्सरेटिव कोलॉइटिस का पुराना मरीज़ है। कोलोनोस्कोपी हो रखी थी। बड़ी आँत के आधे भाग में अल्सर मिले थे। सल्फर ड्रग मीसाकोल का ट्रीटमेंट दिया गया था।
''दवाई नहीं खा रहा था क्या?''
अदिति ने उस औरत से पूछा था।
''लेते तो थे। बीच-बीच में अस्पताल में दवाई नहीं मिल पाती थी...।'' कहते-कहते औरत ने निगाहें नीची की थी और फिर सिर के पल्ले को आँखों से आगे लाकर दबी ज़ुबान से आगे कह गई थी, ''...कभी-कभी मार्केट से खरीदने के लिऐ पैसे नहीं होते थे, डाक्टर साहिब।''
औरत ने हाथ अब अदिति के आगे समर्पण में जोड़ लिये थे।
''पूरी ज़िंदगी दवाई देनी होगी, बंद नहीं करना है।''
वह यह जानती थी कि वह जो कह रही है उसका कितना मतलब है। और यह कितना संभव होगा मरीज़ के परिवार वालों के लिए, इस पर भी उसे संदेह था। ऊपर से, एक तो सरकारी अस्पताल में दवाई मिलती नहीं और जो मिलती है उसकी गुणवत्ता पर शक बना ही रहता था। फिर जिस घर में खाना ठीक से दोनों व़क्त नहीं बन पाता, उस घर पर इतनी महंगी दवाई बाहर से खरीदना, क्या संभव है? फिर उसके पैसे लेने के लिए चक्कर लगाओ।
''बड़ी आँत का नली डालकर टेस्ट हुआ था। उसकी रिपोर्ट कहाँ है?''
अदिति ने औरत से पूछा तो उसने हाँ कहते हुए सिर हिला दिया था।
''कल सुबह ले आना। तला मसाला मत दिया कर, पीना बंद।''
''आजकल कभी-कभी ही पीता है।'' औरत ने सफ़ाई दी थी।
''बिना पिये मरेगा नहीं, पियेगा तो जल्दी मरेगा, समझी।''
औरत के हाथ अदिति के पैर तक चले गये तो वह बोल उठी,
''ठीक है ठीक है, अच्छा चिंता मतकर, ठीक हो जायेगा।''
फिर सिस्टर से कहने लगी, ''स्टिरॉयड ज़रूरी है। शुरू कर दो। कल कोलोनोस्कॉपी की रिपोर्ट ले आए तो दिखा देना।'' इसी बीच बी.पी. चैक किया तो वो काफी कम था। स्टेथिस्कोप कान से हटाया और मरीज़ की घरवाली से बोलने लगी,
''खिचड़ी वो भी सादी देना, छिलके वाली नहीं। दूध, चाय सब बंद। दही खिला सकती हो। ...मीट-मच्छी तो नहीं खाता? ...सब बंद, समझी।''
मरीज़ और उसके घर वाले क्या दे सकते हैं और क्या नहीं, यह डाक्टर अगर ज़्यादा सोचने लगे तो काम करना ही संभव नहीं। उसे तो अपनी तरफ़ से सब कुछ बताना है। मरीज़ की औरत हाथ जोड़े, आँखों में आँसुओं के साथ, डाक्टर की हर बात बड़े ग़ौर से सुनकर सिर हिला रही थी। कितना उसे समझ आ रहा था, कितना वह कर पायेगी, यह तो शायद वह खुद भी नहीं जानती थी। हाँ, अदिति सारी बातें बेड हैड टिकट में दर्ज करके तुरंत वापस आई.सी.यू. में आ गई थी।
कमरे में लाइट जल रही थी। सिस्टर और आकांक्षा पास ही खड़ी हुई थी। पीछे से डाक्टर खुराना पहुँच चुके थे और अमित को स्टेथिस्कोप से चैक कर रहे थे। अदिति को देख कर पूछने लगे,
''अदिति, क्या हुआ था?''
''एक्यूट एम.आई. लगता है सर। वामिटिंग सेन्स हुआ था। मुँह में झाग और पसीना भी था। साँस में रुकावट थी। कुछ हद तक बेहोशी है। ब्लड प्रेशर बहुत लो है।''
''क्या-क्या दे दिया?''
''नाइट्रोग्लिसिरीन, मारफिन और एन्जाइम दे दिया है और एसप्रिन ओरल दे दी थी।''
''ई.सी.जी. दिखाना।''
पुरानी ई.सी.जी. रिपोर्ट देखते हुए डाक्टर खुराना ने ई.सी.जी. मॉनिटर की ओर देखा। फिर कुछ सोचते हुए आकांक्षा से पूछ बैठे,
''कैसे हो बेटा?''
आकांक्षा रूआँसी हो रही थी। कुछ बोल नहीं पाई तो सब कुछ समझते हुए उसके सिर पर हाथ फेरते हुए वह कहने लगे,
''चिंता की कोई बात नहीं। समय पर ट्रीटमेंट मिलने से सब ठीक है। बेटा हिम्मत से काम लो और, मम्मी ठीक है...?''
''जी।''
अदिति की ओर मुडक़र डाक्टर खुराना थोड़ी देर बात करते रहे और अंत में ब्लड टेस्ट करने के लिए कहा था फिर ब्लड प्रेशर चैक करने के लिए सिस्टर से कहने लगे। ब्लड प्रेशर देखकर, अदिति को ब्लड रिपोर्ट लेकर सुबह बात करने को कहा और सभी ऑब्ज़र्वेशन एडमिट कार्ड में लिखकर वापस चले गये थे। तभी सिस्टर ने धीरे से अदिति के कान में कहा था,
''मैडम घर से कई बार फ़ोन आ चुका है।''
''कह दो मैं ठीक हूँ, और अब सुबह ही आऊँगी ।'' सिस्टर से बोलकर अदिति ने आकांक्षा की ओर देखा फिर धीरे से कंधे पर हाथ रखकर कहने लगी,
''बेटा तुम सो जाओ। पापा अब ठीक हैं।''
''नहीं आँटी, मैं पापा के पास ही रहूँगी।'' सुनकर अदिति ने प्यार से आकांक्षा के गालों को सहलाया था।
तभी प्रसूति गृह की सिस्टर ने बीच में आकर धीरे से कहा था, ''मैडम डिलीवरी है।''
''कौन है?''
''मिसेज श्रीवास्तव हैं, सिग्नल इंस्पेक्टर की वाइफ।''
''कहाँ हैं?''
''लेबर रूम में।''
''पूरा पेन है?''
''नहीं।''
''ड्रिप चढ़ाओ, मैं आती हूँ।''
''श्रीवास्तव जी आपके लिए बार-बार पूछ रहे थे।''
''कह तो दिया, आ रही हूँ।''
''जी मैडम। डाक्टर साहब कैसे हैं?''
''अभी अंडर ऑब्ज़र्वेशन हैं।''
अदिति ने सिस्टर को बाहर भेज दिया था। आकांक्षा का हाथ पकडक़र सोफे पर बैठाया और पास ही बैठ गई थी,
''तेरे पापा को कुछ नहीं होगा, बहुत हिम्मती हैं। मैं उन्हें बचपन से जानती हूँ।''
''पर पापा के साथ ही इतना सब कुछ क्यों होता है?''
यह सुनकर अदिति आश्चर्यचकित हुई थी। सही तो कह रही है आकांक्षा, और वो अगले कुछ पल के लिए अमित के बचपन को याद करने लगी थी। कुछ देर बाद लंबी साँस छोड़ते हुए उसने एक बार फिर कोशिश की थी,
''तुम यहीं पर पैर ऊपर करके लेट जाओ बेटा। थक रही हो, थोड़ा आराम कर लो। हॉस्पिटल में हम सब हैं तो देखने के लिए।''
''और आँटी आप?''
''मुझे बेटा डिलीवरी कराने जाना होगा। थोड़ी देर में आ जाऊँगी। चिंता मत करना, सिस्टर यहीं है।''
''आप नहीं थकती आँटी?''
''थकती तो हूँ पर आदत हो गई है। डाक्टर की लाइफ अपने लिये कहाँ रह जाती है। पैदा होने वाले और बीमारी का कोई व़क्त तो होता नहीं। फिर हर कोई चाहता है डाक्टर उसे पर्सनली पूरा देखे। कहाँ संभव है बेटा, और फिर ज़रूरी भी नहीं होता। पर जहाँ तक संभव होता है हम लोग अपना समय देते हैं। ...तुम्हारे पापा तो एक-एक मरीज़ के लिए खूब परेशान रहते हैं। बहुत पॉपुलर हैं। सारे लोग उन्हीं से इलाज़ कराना चाहते हैं। उनका हाथ अच्छा माना जाता है। शायद तुम्हें अपने पापा के बारे में पता नहीं।''
अदिति ने लेबर रूम के लिए जाते-जाते, बड़ाई करते हुए आकांक्षा का मन जीतने की कोशिश की थी। प्रशंसा से परस्पर विश्वास पैदा हो जाता है और फिर यह झूठ भी तो नहीं था। अमित का जीवन अदिति की आँखों के सामने टुकड़ों में आ जा रहा था यही कुछ सोचते-सोचते लेबर रूम पहुंची तो मिसेज श्रीवास्तव इंतज़ार ही कर रही थी, चैक किया तो अभी व़क्त था। अदिति को झुंझलाहट हुई थी।
''कहा था न आपसे, काम कीजिये। मगर आप लोग काम करती नहीं हैं इसलिये ऐसे समय में दर्द होने पर तकलीफ़ होती है। अभी पेन और लेना होगा।''
''किया था डाक्टर।''
''क्या किया? कुछ नहीं। पोंछा लगाना था पूरे घर में? और झाड़ू...? यह सब ज़रूरी है। इसमें शरम वाली कोई बात नहीं होती। लगता है मि. श्रीवास्तव ने कुछ ज़्यादा काम करने नहीं दिया। घर पर खलासियों की फौज लगा रखी होगी, क्यूँ मिसेज श्रीवास्तव?''
लेटे-लेटे मिसेज श्रीवास्तव हँसने की कोशिश कर रही थी। उनसे ज़्यादा दर्द मि. श्रीवास्तव के चेहरे पर पढ़ा जा सकता था। डाक्टर को आता देखकर वह भी वहाँ पीछे-पीछे पहुंच गये थे। उनका बस चलता तो अंदर तक चले आते लेकिन डाक्टर अदिति के स्वभाव को जानते थे और बाहर ही खड़े रहे थे।
''मैडम कोई चिंता की बात तो नहीं है?'' अदिति जैसे ही लेबर रूम से बाहर निकली, परेशान होते हुए इंस्पेक्टर ने पूछा था।
''हर चीज़ में चिंता क्यों लाते हैं आप लोग। थोड़ा इंतज़ार कीजिए। प्राकृतिक रूप से हर चीज़ होने के फायदे हैं। लंबे समय तक साथ देते हैं। चीरा-फाड़ी करना तो बहुत आसान है। प्राइवेट हॉस्पिटल होता तो फट से पेट काट देते। पैसे भी अच्छे लेते। अस्पताल में कई दिन भर्ती रखते तो आप लोग खुश रहते हो। और यहाँ पर परेशान होने लगते हो। इंतज़ार कीजिये, सब ठीक हो जायेगा, मैं अस्पताल में ही हूँ।''
मि. श्रीवास्तव ने भी हाथ जोड़ लिये थे। अदिति सिस्टर को समझाकर एक बार फिर वापस आई.सी.यू. में आ गई थी। समय अपनी रफ्तार से बीत रहा था। आकांक्षा को झपकी आ रही थी। मगर उसने लेटने से मना कर दिया था। वह एक मिनट के लिए भी पापा को नज़रों से दूर नहीं होने देना चाहती थी। हाँ, अदिति अमित का बचपन याद कर रही थी। बीच-बीच में आकांक्षा को कोई मज़ेदार किस्सा होता तो ज़रूर सुना देती।



 

 


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