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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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28.

''हैलो, माँ उठी?'' आकांक्षा ने घर पर अनिरुद्ध को फ़ोन किया था।
''नहीं, यहाँ की चिंता छोड़, पापा कैसे हैं?'' अनिरुद्ध की आवाज़ में चिंता थी।
आकांक्षा फ़ोन पर ही सुबक पड़ी थी।
''अभी तो ठीक हैं पर लगता है पूरी तरह ठीक नहीं हो पायेंगे। पता नहीं, क्या होगा...? पापा के साथ ही ऐसा सब कुछ क्यों होता है।''
''अब दिनभर सुनते रहेगें, घुटते रहेंगे, तो यही होगा। कितनी बार बताया कि माँ की तबीयत को आप इस तरह से करके बढ़ा रहे हो और खुद भी परेशान हो रहे हो। मगर कहाँ माने। हम लोगों की भी साली क्या ज़िंदगी है।'' अनिरुद्ध की आवाज़ में दुःख के साथ क्रोध भी था।
''देख, अनि, तू आज माँ के उठने पर कोई गुस्सा या लड़ाई नहीं करेगा। फिर तू समझता क्यूँ नहीं। पापा परेशान होते हैं। अच्छा तूने कुछ लिया? लक्ष्मी बाई आई है?''
''हाँ, आ गयी।''
''उससे चाय बनवा ले, बिस्किट रखे हैं, ले लेना और माँ उठे तो उनको भी चाय बिस्किट के साथ ही देना। खाली चाय नुक़सान करती है। इतनी सारी गर्म दवाइयाँ खाती रहती हैं। मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ। फिर खाना बना दूँगी। तुझे स्कूल जाना है?''
''क्या बताऊँ, जाना तो ज़रूरी है, परंतु घर में ऐसी हालात में…। चल कोई बात नहीं। पर तू कैसे आयेगी, मैं आ जाऊँगा स्कूटर से तुझे लेने, ठीक है।''
''ठीक है, लक्ष्मी कहाँ है? तेरी चाय के लिए बोल देती हूँ।''
''बोल दूँगा न।'' ज़ोर से बोला था अनिरुद्ध।
''अच्छा ठीक है चिल्लाता क्यूँ है।''
आकांक्षा ने धीरे से कहा और टेलीफ़ोन रख दिया था। अनिरुद्ध और आकांक्षा में बेहद प्यार था। आकांक्षा जहाँ शांत, गंभीर, प्यार देने वाली वहीं अनिरुद्ध तेज़ गुस्से वाला। आकांक्षा पढ़ाई में कमज़ोर थी, कुछ बचपन से ही घर की भी देखभाल करनी पड़ती थी। पापा से बेहद जुड़ी हुई थी। माँ का भी ध्यान पूरा रखती, परंतु निकिता उससे दूर-दूर ही रहती और भला-बुरा भी कहती रहती। इसके बावजूद बीमारी की बात जानकर और सोचकर आकांक्षा बस रो लेती थी। अपने भाई से तो उसे विशेष प्यार था। अनिरुद्ध पढ़ाई में तेज़ था। माँ से प्यार भी बहुत मिला और माँ को चाहता भी था परंतु उनके द्वारा अक्की दीदी को कुछ बोलने पर वह उनसे लड़ जाता था। अपनी बहन से उसे विशेष लगाव था, और उस पर हक़ भी पूरा जताता। उसकी सारी बातें सुनता तो अपनी भी सारी सुनाता। दोनों अच्छे दोस्त भी थे। परंतु आकांक्षा थोड़ा डरती थी अनिरुद्ध से। भाई छोटा हो या बड़ा होता तो भाई ही है।
रेलवे के बड़े-बड़े बंगलों में अंग्रेजों के ज़माने से पीछे की ओर सर्वेंट क्वारटर्स बने हुए थे। आम प्रचलन में उन्हें आउट हाउस भी कहा जाता। डाक्टर अमित के पीछे के एक आउट हाउस में लक्ष्मी बाई रहती थी। बंगले की साफ़-सफ़ाई और ज़रूरत पड़ने पर रसोई में थोड़ा बहुत काम भी करा जाती थी। उसका पति हाईकोर्ट चौराहे पर फल की दुकान लगाता था। बच्चे छोटे-छोटे थे। सीधी-सादी और बेहद संवेदनशील। लक्ष्मी बाई ने, डाक्टर साहब के बारे में सुनकर अपनी चिंता दिखाई और पूछताछ करने पर चाय बनाकर घर पर सफ़ाई कर दी थी। अनिरुद्ध ने एक बार फिर दरवाज़ा खटखटाया, मगर माँ नहीं उठी थी। खिड़की से उन्हें सोया हुआ देखकर उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा था कि अचानक फ़ोन की घंटी ने उसका ध्यान बंटाया था... आकांक्षा का होगा सोचकर दौड़ते हुए रिसीवर उठाया तो टेलीफ़ोन पर दोस्त था,
''स्कूल नहीं चल रहा...?''
''नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं। बुखार है। अच्छा मैं बाद में फ़ोन करूँगा।'' उसे घर के ऐसे हालात में किसी बाहर वाले से बात करना अच्छा नहीं लगता और उसने बिना सामने वाली की बात सुने फ़ोन रख दिया था। पिता को देखने की इच्छा हो रही थी सो कुछ देर इंतज़ार कर, खुद ही अस्पताल के लिए निकल पड़ा था। जाते-जाते लक्ष्मी बाई को कह गया था,
''माँ उठे तो कहना बस मैं आ रहा हूँ, अस्पताल से आकांक्षा को ले आऊँ।''
उसे अपने पिता को लेकर चिंता हो रही थी। जल्द से जल्द उन तक पहुँचना चाह रहा था। स्कूटर की इंजन की भारी आवाज़ से उसकी गति का अनुमान लगाया जा सकता था। दिमाग़ इतना अधिक बेचैन था कि वह गियर बदलना ही भूल गया, और दूसरे गियर में ही अस्पताल पहुँच गया। वहाँ पहुँचा तो पिता को अस्पताल के बिस्तर पर आक्सीजन लगी देखकर विचलित हो उठा था। हाथों में ग्लुकोज़ लगा हुआ था। बहुत देर यूँ ही खड़ा रहा और फिर कुछ देर बाद अपने हाथों के स्पर्श से उसने पिता को प्यार देने की कोशिश की थी। अमित की आँखों में बेटे को देखकर आँसू उभरते उसके पहले ही उसने उसे थूक के साथ घुटक लिया था।
''माँ ठीक है? ...उनका ख़याल रखना।''
''आप उनकी चिंता छोड़िए और अपना ख़याल रखिए।''
अनिरुद्ध के शब्दों में आक्रोश उभरा था और चेहरे पर नाराज़गी दिखाई देने लगी थी। आकांक्षा ने धीरे से पापा से कहा था... बस घर जाकर कुछ काम करके, खाना बनाकर वह जल्दी आ जाएगी... और फिर माँ को भी तो उठाना है। ...और यह कहकर वह अनि के साथ घर आ गई थी।
घर पहुँची तो माँ अब तक नहीं उठी थी। वो अक्सर बच्चों के स्कूल जाने के बाद ही उठती थीं। बच्चों को तो पता ही नहीं चल पाता था। आज भी देर से दोपहर में उठी तो अनिरुद्ध ने रोष दिखाते हुए कहा था,
''आप सो रही हो, पापा को हार्ट अटैक आया हुआ है। अभी अस्पताल में हैं।''
निकिता के चेहरे पर सूजन और कमज़ोरी थी। चिंता की हल्की-सी लकीर उभरी थी। आकांक्षा दूर चाय लेकर खड़ी थी।
''माँ चाय ले लो।''
निकिता ने बड़ी हेय दृष्टि से उसे देखते हुए कहा था,
''मुझे भी मारेगी क्या...? देख तेरे कारण क्या हो गया...? वैसे तो तू अपने पापा की बड़ी लाड़ली बनती थी।''
''माँ दीदी को कुछ मत कहना।'' अनिरुद्ध ने गुस्से में कहा था।
''भाई को भी अपने तरफ़ कर लिया। सबके साथ मिलकर मुझे बर्बाद करेगी।''
आकांक्षा अनिरुद्ध को बाहर खींचकर ले आई थी। इसी बीच निकिता ने दिल्ली फ़ोन मिलाया था और अपनी माँ को रोते हुए कहने लगी,
''माँ अमित को हार्ट अटैक आया है अस्पताल में है।''
''ठीक तो है?'' उधर से तेज़ आवाज़ थी।
''हाँ, सुना है ठीक है।''
''कितनी बार समझाया कि शराब मत पियो, परंतु वह हमारी सुनता कहाँ है। यह तो एक दिन होना ही था। अगर कुछ कम ज़्यादा हो गया तो तेरा क्या होगा बेटा... हमें तो तेरी बहुत चिंता रहती है... तू कैसी है बेटा? अपना ध्यान रखाकर...''
निकिता बच्चों के समान रो रही थी।
''देख यहाँ तेरे पिताजी की तबीयत ठीक नहीं रहती। फिर तेरे भाई के पास काम कितना ज़्यादा है। ...देखती हूँ दोनों में से कोई तैयार होगा तो मैं किसी को भेजती हूँ ...तेरा दिल न लगे, तो तू कुछ दिनों के लिए यहाँ आ जाना। स्टेशन भेज दूँगी किसी को लेने। चिंता मत करना। क्या करें बेटा। फिर अमित किसी से ठीक से बात भी तो नहीं करता। ख़ैर, भगवान सब ठीक करेंगे। अच्छा अपने पापा को मत बताना नहीं तो परेशान होंगे। ठीक है, ध्यान रखना।''
दूसरी तरफ़ से फ़ोन रख दिया गया था। अपने कमरे में अनिरुद्ध पैरलल में लगे हुए टेलीफ़ोन से सारी बात सुन रहा था। गुस्से से आग बबूला हो उठा, बड़बड़ाते हुए आकांक्षा को कहने लगा,
''शरम नहीं आती इन लोगों को। यहाँ मेरे पिताजी मौत के मुँह में बैठे हैं और ये लोग कहते हैं कि शराब से हुआ है। अरे शराब क्यों पीते हैं ये कभी सोचा है इन लोगों ने। करना-धरना कुछ नहीं बस वहाँ बैठकर हुक्म चलाते रहते हैं। क्या करें अपनी माँ की कमज़ोरी है अब तक समझ ही नहीं पायी। बीमारी का बहाना करती हैं, क्यूँ, अपने माँ-बाप के घर जाकर तो ठीक रहती हैं। वहाँ अपना रूप दिखाए। वहाँ तो बड़ी अच्छी बन जाती हैं। ...इतना भी नहीं कि कोई अस्पताल में भर्ती हैं तो आयें और देख जायें। कह रहे हैं अपनी परेशानी है। फिर भी अच्छे बने रहेंगे। मतलबी और बड़े तेज़ लोग हैं।''
''ऐसे नहीं बोलते, बड़े हैं। नाना-नानीजी हैं।'' आकांक्षा ने अनिरुद्ध को संभालने की कोशिश की थी।
''अरे किस बात के नाना-नानी। बचपन से देख रहा हूँ पापा को क्या-क्या नहीं कहते। भरते रहते हैं माँ के कान...।'' अनिरुद्ध गुस्से में उल्टा-सीधा बक रहा था। पीछे से कमरे में कब माँ आ गई, दोनों ने देखा ही नहीं था। वो तो आवाज़ सुनी तो पलटकर देखा था, निकिता आँख निकालकर बोल रही थी, ''देख मेरे माँ-बाप को कुछ मत कहना।''
''उनसे भी कह दो मेरे पापा को कुछ न कहें।'' अनिरुद्ध का गुस्सा उबल रहा था।
''सब इस लड़की ने सिखाया है, दिनभर मेरे और मेरे घर वालों के खिलाफ, सब को भरती रहती है।'' निकिता ने आकांक्षा की तरफ़ घूरते हुए कहा था। आकांक्षा हाथ जोड़कर माँ को मनाने लगी तो अनिरुद्ध फिर बोल पड़ा,
''देख माँ दीदी को कुछ मत कहना नहीं तो...''
''नहीं तो क्या करेगा, मारेगा?''
और निकिता ने अपनी चप्पल उठाकर अपने सिर पर ज़ोर-ज़ोर से मारनी शुरू कर दी थी। आकांक्षा ने रोकने की कोशिश की तो धक्का देकर गुस्से में अपने कमरे में जाकर अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया था। बहुत देर तक बिस्तर पर हाथ-पाँव पटकने की आवाज़ आती रही थी। आकांक्षा सहम गई थी, रोती हुई दरवाज़ा खटखटाने लगी। नहीं खुलने पर, दौड़कर बागीचे की ओर से खिड़की से झाँका, अंदर माँ अपने सिर के बाल नोचते हुए बड़बड़ा रही थी और गुड़ी-मुड़ी होकर बिस्तर पर उठ-बैठ रही थीं। आकांक्षा ने खिड़की में से शब्द अंदर धीरे से फेंके थे,
''माँ, मैं सॉरी बोलती हूँ। अनि थोड़ा गुस्सैल है, मगर आपको बहुत प्यार करता है। वैसे ही बोल गया। अच्छा दरवाज़ा खोलो। मुझे जो कहना है कह लो। मैं तो सही में...।''
''बोल दे उसको मेरे माँ-बाप को कुछ नहीं कहेगा।'' अंदर से लेटे-लेटे निकिता ने कहा था।
''ठीक है, मैं कह दूँगी। नहीं कहेगा। बच्चा है, समझता नहीं।'' आकांक्षा बोलते बोलते अचानक ज़ोर से रो पड़ी थी। और फिर दौड़कर अंदर बंगले में वापस आ चुकी थी। बहुत देर तक दरवाज़े के बाहर ही खड़ी रही, न खुलने पर अंत में अनिरुद्ध को समझाया था... ऐसे नहीं बोलते। अब तक अनिरुद्ध का गुस्सा माँ के रौद्र रूप से हवा हो चुका था। उलटे आत्मग्लानि होने लगी थी। डरता था, माँ कुछ उल्टा-सीधा न कर ले। पापा भी अस्पताल में हैं। ...और फिर वो भी अचानक रो पड़ा था। हाथों से आँखों को पोंछता मगर आँसू थे कि रुकने का नाम नहीं लेते थे, बोलने की कोशिश में शब्द भी साथ बहने लगे थे,
''इनको अभी भी अपने माँ-बाप की चिंता है। हम लोग तो माँ के लिए कुछ भी नहीं। ये कैसी बीमारी है।'' आकांक्षा ने अनिरुद्ध को संभालने की कोशिश की थी, और समझाते हुए धीरे से कहा था,
''सब ठीक हो जाएगा।''
अनिरुद्ध शांत हुआ तो आकांक्षा ने उसे नहाने के लिए भेजा और खुद खाना बनाने लगी थी। हाँ, बीच में किसी को फ़ोन करके ज़रूर कहा था कि आज भी स्कूल नहीं जा पायेगी। खाना बना चुकी तो बड़ी मुश्किल से माँ का दरवाज़ा खुलवाया था और फिर धीरे से कहने लगी,
''माँ नहा लो, ...भूख लगी होगी, फिर कुछ खा लेना ...मुझे अस्पताल भी जाना है।''
निकिता आकांक्षा की ओर देखे बिना उठकर बाथरूम चली गई थी। आकांक्षा ने तुरंत खाने की थाली लगाकर उसे माँ के सिरहाने वाली टेबल पर रख दी थी। पानी का गिलास के अतिरिक्त एक जग भी भरकर रख दिया था। दवाइयों का असर रहता है जो माँ को प्यास अधिक लगती है... यह वह जानती थी। और फिर दरवाज़े को भेड़ते हुए खुद धीरे से तैयार होने अपने कमरे में आ चुकी थी। अस्पताल पहुँचने में उसे देरी होने लगी तो अनिरुद्ध से स्कूटर पर छोड़ने के लिए कहा था। अनिरुद्ध अब तक पूरी तरह शांत हो चुका था। फिर भी रास्ते में उसे समझाती रही थी,
''देख, माँ को कुछ मत कहना। पापा ने कितनी बार कहा है कि माँ की दिमाग़ी हालात ठीक नहीं। ...हम उन्हें प्यार देंगे तो वो ठीक हो जाएंगी। ...और फिर उनसे ऐसी बातें नहीं कहते, माँ है हमारी। ...और सुन, अब तू कोई नया बखेड़ा मत करना।''
अनिरुद्ध चुपचाप सुनता रहा था। अस्पताल में नीचे छोड़कर ही वापस चलने लगा तो आकांक्षा ने पीछे से कहा था,
''ज़्यादा नहीं सोचते, अपना ध्यान रखना।''
आकांक्षा लिफ्ट के सामने पहुँची तो देखा वो ऊपर की दिशा में जा चुकी थी। उसके वापस आने का कौन इंतज़ार करे और उसने दौड़ते हुए सीढ़ियों का रास्ता चुना था। लगभग दौड़ते हुए दूसरे फ्लोर पर पहुँची तो देखा डाक्टरों का दोपहर वाला राउंड खत्म हो चुका था। डाक्टरों और नर्सों का झुंड लिफ्ट के इंतज़ार में खड़ा हुआ था। कुछ एक को वह जानती थी। नज़रें झुकाए भीड़ को चीरते हुए वह कमरे में पहुँची तो पापा लेटे हुए थे। आँखें दरवाज़े पर ही टिकी हुई थी, लग रहा था इंतज़ार ही कर रहे थे। देखते ही पूछ बैठे,
''माँ कैसी हैं?''
''ठीक हैं, पूछ रही थीं। आपके लिए परेशान थीं।'' आकांक्षा ने पिता के सिर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा था। अमित बेटी की बातों को सुनकर मुस्कुरा दिया था। उसे पता था कि इसमें कितना झूठ है। और फिर बाप-बेटी के बीच में खामोशी ने एक बार फिर जगह बना ली थी। समय पर खाना और ठीक टाइम पर दवाई... आकांक्षा ने नर्स से सब कुछ समझ लिया था। ...शाम होते-होते अदिति आई तो साथ में सुनीता आँटी भी थीं। आकांक्षा ने देखा तो पहचान नहीं पाई थी, एक तो बहुत दिनों बाद देख रही थी... शायद साल ही हो रहा हो... बूढ़ी और बीमार लग रही थीं। अदिति ने आते ही आकांक्षा से पूछा था,
''कैसी है?'' और फिर अमित की ओर देखते हुए मुस्कुराई थी... ''ठीक हो?''
अमित ने धीरे से सिर हिलाया था। पीछे खड़ी सुनीता आँटी ने अब तक आकांक्षा के चेहरे पर हाथों को फेरकर भरपूर प्यार किया और फिर अमित के नज़दीक आकर झुकते हुए कहने लग पड़ी,
''बेटा, ये क्या हाल बना रखा है। ...मैंने जब से सुना तब से मुझे तो बड़ी चिंता हो रही थी। रहा न गया तो इसीलिए चली आई हूँ। ख़ैर, चिंता करने की ज़रूरत नहीं, सब ठीक हो जाएगा, वो है न ऊपर वाला। ...तुम तो मुझसे मिलने आते ही नहीं, मैं ही अदिति से पूछती रहती हूँ। अब की बार अस्पताल से निकलने के बाद मुझसे मिलने नहीं आए तो तुम्हारी ख़ैर नहीं...।''
और फिर पीछे खड़ी आकांक्षा की ओर मुड़कर उसके सिर पर फिर से बड़े प्यार से हाथ फेरा था।
''बिल्कुल अपनी बुआ पर गई है। सुप्रिया जैसी लगती है, बड़ी प्यारी है...'' कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू थे। अमित ने आँखें बंदकर चेहरा दूसरी ओर कर लिया था। अदिति ने तुरंत बात संभालते हुए माँ को गुस्से से देखा था और इशारे ही इशारे में चुप रहने के लिए कहा था। एक बार फिर कमरा सन्नाटे से भर गया था।
थोड़ी देर बाद, अदिति ने माँ को घर छोड़कर आने की बात कहकर, आकांक्षा और अमित से जाते-जाते कहा था,
''माँ को घर छोड़कर थोड़ी देर में आती हूँ। बेटा, कोई चीज़ की ज़रूरत हो तो घर फ़ोन कर देना। ...अच्छा अमित, मेरी राधिका से बात हो गई है। चिंता मत करो सब ठीक है।''
सुनीता आँटी के शब्द अमित के कानों में अब भी गूँज रहे थे। अदिति के जाने के बाद उसने आकांक्षा की ओर ध्यान से देखा था... सही में, सुप्रिया जैसी लगती है। ...बहन की याद आते ही उसके दिल में पीड़ा-सी उठी थी। उसे सब कुछ याद आ रहा था। आँखें बंदकर भूलने की कोशिश की तो सुप्रिया की धुँधली-सी तस्वीर उभरी थी...




 

 


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