| |
26.
फाइनल प्रौफ में अमित, अदिति, श्याम और राधिका तो पास हो गए मगर
निकिता ने पेपर ही नहीं दिया था। विक्रम ग्रुप से दूर हो चुका था।
वैसे भी उसके लिए सप्ली आना न आना ज़्यादा मायने नहीं रखता था।
चारों का इंटरनशिप शुरू हो चुका था। हाउस जॉब में व्यवाहारिक ज्ञान
के लिए हॉस्पिटल के वार्ड में कई-कई दिनों की ड्यूटी लगने लगी थी।
अमित को हफ्ते-हफ्ते घर जाना संभव नहीं हो पाता। ड्यूटी में
निकिता कई बार उसके पास आ जाया करती थी। अपनी फाइनल ईयर की सप्ली
की तैयारी, उसके साथ वार्ड के ड्यूटी रूम में ही कर लेती थी।
फाइनल प्रौफ में सप्ली से उसकी इंटरनशिप लेट हो रही थी।
नवदुर्गा की चहल-पहल थी। अमित हॉस्पिटल में ड्यूटी की वज़ह से,
पिछले कई दिनों से घर नहीं जा पाया था। श्याम के घर पर ही नहा-धोकर
तैयार हो जाता। हॉस्पिटल में ड्यूटी करते-करते मन ऊब गया था। एक
शाम उसने निकिता से मेडिकल कालेज के आसपास की दुर्गा जी की
मूर्तियों को चलकर देखने के लिए कहा तो निकिता तैयार हो गई थी।
श्याम और राधिका, नरसिंगपुर श्याम के माता-पिता के पास दशहरा
मनाने, छुट्टी लेकर गए हुए थे। थोड़ी देर के घूमने में ही अमित ने
महसूस कर लिया था कि निकिता को भीड़-भाड़ ज़्यादा पसंद नहीं। उसे
दुर्गाजी की प्रतिमाओं में, झाँकियों में विशेष दिलचस्पी उत्पन्न
नहीं हो पा रही थी। वह शून्य में ताकती-सी लगती। पैदल चलने वालों
का शोर और चारों ओर सजे हुए मंडप उसे आकर्षित नहीं कर पा रहे थे।
''वापस चलें?''अमित ने उसके चेहरे की निष्क्रियता को देखकर कहा था।
''जैसा तुम्हें ठीक लगे।'' निकिता ने ठंडा-सा जवाब दिया था।
''चलो मैं तुम्हें हॉस्टल छोड़ देता हूँ।''
''और तुम?''
''श्याम के फ्लैट में कुछ देर रुककर हॉस्पिटल जाऊँगा। थोड़ा फ्रेश
होना है।''
''कोई बात नहीं मुझे भी तभी छोड़ देना।''
''ठीक है।''
फ्लैट पर पहुँचकर निकिता बहुत देर तक बालकनी में खड़ी रही थी। अमित
ने चाय बनाई और बिस्किट के साथ टेबल पर रखकर निकिता को अंदर बुलाने
के लिए आवाज़ लगाई थी। निकिता अंदर आकर, उसके गोद में सीधे सिर
रखकर, अचानक नीचे ज़मीन पर बैठ गई थी। कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अमित
ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया था। उसके स्पर्श में अपनापन था। अमित
भावुक तो था ही, निकिता के खालीपन को पढ़ता रहता था। उसके दुःख से
उसे काफी तकलीफ़ होती थी। अन्य लड़कों की तरह वह भी निकिता की
सुंदरता से प्रभावित तो था, परंतु अब बुझा हुआ चेहरा देखकर उसे
दुःख होता। इतने सालों का लंबा साथ उसे प्रेरित करता था कि वह उसके
दुःख को कम कर सके।
अमित इतने नज़दीक किसी भी औरत के साथ अब तक नहीं बैठा था। निकिता के
नर्म स्पर्श और गर्म साँसों से उसके गोद में सिहरन दौड़ पड़ी थी।
शरीर के कंपन को मज़बूती से रोकता हुआ वह लगातार उसके सिर पर हाथ
फेर रहा था। मस्तिष्क अनियंत्रित और भावनाएं उग्र हो रही थीं।
थोड़ी देर बाद निकिता ने आँख उठाकर ऊपर देखा, उसकी बड़ी-बड़ी
मासूम-सी आँखों में एक खालीपन था। अमित ने नज़रें हटा ली थीं,
ज़्यादा देर तक मिलाता तो शायद आँसू जा जाते।
''तुम मुझे प्यार करते हो...?''
निकिता ने धीरे से पूछा तो वह कोई जवाब नहीं दे पाया था।
''...तुम्हारे प्यार की मुझे ज़रूरत है।''
कहते हुए, निकिता ने खड़े होकर, उसके सिर को अपने आगोश में लेकर
मज़बूती से उसे पकड़ लिया था। निकिता के हृदय की धड़कन अमित को आज
स्पष्ट सुनाई दे रही थी। धड़कन की तीव्रता को उसने महसूस किया था जो
उसके मस्तिष्क को विचार शून्य कर रहे थे। बांहों के घेरे उसे
उष्णता प्रदान कर रहे थे जिससे उसे अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त हो रही
थी। शरीर की खुशबू उसे प्रेरित करने लगी, आगे बढ़ने के लिए, और अमित
उसे रोक नहीं पाया था। और अंत में स्वयं उसमें सहयोग करता चला गया।
अमित को एक असीम सुख की प्राप्ति हुई थी। उसे यकीन ही नहीं था कि
प्राकृतिक सौंदर्य की ऐसी सुखद अनुभूति भी होती है। सब कुछ उसकी
कल्पना से कहीं बढ़कर था। घंटों लेटे रहे थे दोनों। निकिता अब भी
पूर्ण रूप से उससे लिपटी हुई थी। प्यार के बाद अमित ने उसके पूरे
शरीर को स्पर्श के द्वारा अपने होने का एहसास दिया था तो निकिता ने
उसे शारीरिक के साथ-साथ मानसिक आनंद की अनुभूति।
''तुम्हें हॉस्टल छोड़ देता हूँ।'' उसके सिर को धीरे से चूमते हुए
अमित ने कहा था।
''नहीं।'' निकिता ने कहकर उसे और मज़बूती से पकड़ लिया था।
''मुझे हॉस्पिटल जाना है।'' अमित के स्वर में कोमलता के साथ आग्रह
था।
''ज़रूरी है, तो जाओ, पर जल्दी आ जाना।'' निकिता ने उसकी छाती में
एक प्यार भरा चुंबन दिया था।
''तुम यहाँ अकेले रहोगी। डर नहीं लगेगा?'' अमित ने अपनेपन से कहा
था।
''नहीं अब तुम्हारी खुशबू मेरे साथ है।'' निकिता ने उसकी आँखों में
झांकते हुए बड़े प्यार से मगर धीरे-धीरे कहा था।
अमित का यह पहला-पहला एहसास था। छोड़कर नहीं जा पाया था। रोक न सका
तो दोनों ने फिर प्यार किया था ...और फिर यह सिलसिला रातभर चला था।
सुबह अमित की नींद खुली तो देखा निकिता बगल में चैन की नींद सो रही
थी। उसने उठकर बाहर बालकनी से आसमान को देखा। आज की सुबह में अलग
ताज़गी थी। भोर की हल्की ठंडक उसे गुदगुदा रही थी। मगर जैसे-जैसे
दिन के उजाले उस पर पड़ते गए, उसके मस्तिष्क ने उसे हक़ीक़त का एहसास
कराना शुरू किया था... क्या यह ठीक है? ...मदद और सहारे के नाम पर
कहीं बेईमानी तो नहीं? ...दिल कहने लगा, 'नहीं, यह प्यार है।'
...पर क्या वह निकिता के लायक है? ...और फिर विक्रम का प्यार?
...दिल ने समझाया था कि वो भूतकाल की बातें हैं, निकिता उसको भूल
चुकी है। ...मगर क्या उसके लिए ये सब ठीक है? ...उसे निकिता से बात
करनी चाहिए। ...सवाल और जवाब के कश्मकश में था कि निकिता ने आकर
पीछे से उसे पकड़ लिया।
''मुझे छोड़कर मत जाना।''
''नहीं, नहीं...।''
इसके आगे वह कुछ भी नहीं कह पाया था। इस हालत में अपने दिमाग़ में
उठ रहे सवाल को पूछना उसे ठीक नहीं लगा। नहा-धोकर बाहर निकला तो
देखा निकिता उसे निहार रही थी, देखकर शरमा गया था।
''मुझे शाम को घर जाना होगा। कई दिन हो गए, माँ और दीदी इंतज़ार कर
रहे होंगे।''
''ठीक है, फिर कब मिलोगे? कल सुबह?''
''देखता हूँ।''
अमित, निकिता को श्याम के स्कूटर पर हॉस्टल छोड़ने गया था। आज
निकिता स्कूटर पर पूरी तरह से उससे सटकर बैठी थी। एहसास हो रहा था
कि वह अब उससे दूर नहीं होना चाहती। उतरकर उसने उसे जी भर कर देखा
और आँखों से ही कहा था,
''जल्दी आना।''
देर शाम घर पहुँचकर वह बहुत देर तक सोचता रहा था। सोचते-सोचते दिल
और दिमाग़ के अंतर्द्वंद्व में, उसे पूरी रात नींद नहीं आई थी। और न
ही जवाब मिला। दिल जो करता है उसमें दिमाग़ काम नहीं करता। दिमाग़ जो
सोचता है उसका दिल नहीं होता। आज फिर उसके दिल में निकिता का सुखद
स्पर्श उसे बेचैन कर रहा था। दिल दिमाग़ पर छाया हुआ था। माँ अब उसे
देखकर हैरान थी। दूसरे दिन सुबह उठा तो शरीर की भूख अचानक फिर उभरी
थी। उसने उसे दबाने की असफल कोशिश की थी। देर शाम सीधे अस्पताल
ड्यूटी पर पहुँचा तो थोड़ी देर में ही देखता है कि निकिता उसके
पास ही चली आ रही थी।
''कब आये?'' उसकी आँखें अमित के चेहरे से हट नहीं रही थीं।
''बस अभी-अभी आया हूँ।'' अमित ने नज़रें चुराने की कोशिश की थी।
''मुझसे नहीं मिले?'' उसके सवाल में प्रेम के साथ हक़ भी था।
''बस देर हो गई थी।'' अमित चाहकर भी नज़र नहीं मिला पा रहा था।
''चलो कॉफी हाउस चलते हैं, मुझे भूख लगी है।''
उसे वह हाथों से पकड़कर ले जाने लगी तो वह रोक नहीं पाया था। कॉफी
हाउस में भी उसने उसका हाथ नहीं छोड़ा था और बगल में सटकर बैठ गई
थी। कॉफी हाउस में अक्सर चहल-पहल रहती मगर शाम को तो भीड़ कुछ
ज़्यादा ही हो जाती थी। इतने लोगों में कोई किसी को ध्यान नहीं
देता, परंतु अमित को लग रहा था कि मानो सारे उसी को देख रहे हैं।
''घर चलो न।'' धीरे से निकिता ने उसके कान के पास आकर बुदबुदाया
था।
''घर! कौन-सा?'' अमित ने पहली बार उसकी तरफ़ भरपूर निगाहों से देखा
था।
''श्याम के।'' निकिता की आँखें नीची हो रही थी। हाथों का स्पर्श
प्यार देने के लिए तत्पर था।
''इस वक्त !! ड्यूटी पर हूँ।''
''कह दो न राजेश से, देख लेगा, थोड़ी देर, प्लीज़।'' निकिता ने उसके
हाथ को मज़बूती से पकडक़र कहा था।
निकिता के स्पर्श ने अमित को जाग्रत क्या किया, वह अपने आप को रोक
नहीं पाया था। बाँध से पानी निकलने के लिए बेताब था। कोई रास्ता न
मिले तो बाँध भी पानी के दबाव से टूट जाता है। अमित अपने को रोक न
सका था और जल्द ही दोनों श्याम के घर पर थे। अमित निकिता में पूर्ण
रूप से अस्तित्व विलीन हो रहा था और निकिता उसे आत्मसात् कर रही
थी। अमित इस नये-नये और सुखद अनुभव में एक बार फिर पुनः डूब रहा
था। दोनों के हृदय का स्पंदन साथ-साथ कदमताल कर रहे थे।
अब यह लगभग रोज़ का सिलसिला हो चुका था। सुबह की भूख खत्म नहीं होती
तो दोपहर की भूख लग आती थी। रात तो सारी जागने में ही बीत जाती।
नींद तो अपना अस्तित्व ही भूल चुकी थी। प्रेम का प्रवाह उग्र था,
बाँध टूटा तो तेज़ी इतनी थी कि रुकने का नाम ही नहीं। फिर नदी की
धारा तेज़ हो तो समुद्र तक मिलने से कौन रोक सकता है। टूटे हुए बाँध
को नहीं बाँधा जा सकता। आठ दिन कहाँ बीत गए पता ही नहीं चला।
राधिका श्याम के साथ नरसिंगपुर गई हुई थी। अपने भविष्य के संबंधों
को मज़बूत नींव प्रदान करने, मगर यहाँ पर अमित और निकिता संपूर्ण
बंधन में बंध चुके थे। निकिता और अमित वहीं मिलकर किसी तरह
कच्चा-पक्का बनाते और खाते फिर प्यार में लीन हो जाते। शरीर की
प्यास, पेट की आग से ज़्यादा तीव्र थी। अमित बीच-बीच में हॉस्पिटल
बड़ी मुश्किल से जा पाता। निकिता उसे कहीं और जाने नहीं देती थी।
राधिका जब तक लौट के आती, निकिता बदल चुकी थी। काफी खुश नज़र आ रही
थी। अमित को भी श्याम ने थोड़ा बदला हुआ महसूस किया था। पूछने पर
दोनों ने बस इतना ही कहा था... नवदुर्गा में जबलपुर में पूरा मज़ा
किया। श्याम के लौटने पर अमित और निकिता के मिलने का स्थान खत्म हो
गया था। हॉस्पिटल के बाद शाम को निकिता के साथ वह कॉलोनी के मंदिर
चला जाता और एक-दो बार कालेज के सामने की पहाड़ी पर स्थित पिसनहारी
की मढ़िया को भी देखा आया था। पिसनहारी की मढ़िया, जैनों का जबलपुर
में प्रमुख तीर्थ स्थान है। ऐसा कहा जाता है कि किसी बुजुर्ग जैनी
महिला ने, चक्की पीसकर, यहाँ जैनो का मंदिर बनाया था। छोटी-सी
पहाड़ी पर होने के कारण कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं और ऊपर से
आसपास का प्राकृतिक नज़ारा अच्छा लगता है। निकिता ज़्यादातर जगह पर
उसका हाथ पकड़कर चलती थी। उसे किसी प्रकार का संकोच नहीं था। मगर
अमित डर और शरम के मारे उससे थोड़ा-सा दूर ही रहना चाहता था। लोगों
की निगाह से बचता था। मन में चोर हो तो सारी निगाहें घूरती-सी लगती
हैं। दो रात उसने हॉस्पिटल में ही बिताए। कुछ देर के लिए निकिता आ
जाती थी। अमित उसे वापस हॉस्टल जाने के लिए कहता परंतु निकिता का
मन नहीं होता था।
एक रात तक़रीबन ग्यारह बजे, अमित घर आया हुआ था आने से पहले निकिता
से नहीं मिल पाया था। खाना खाकर आराम कर रहा था। तभी श्याम ने घर
के बाहर से आवाज़ दी थी। अमित एकदम से घबराकर उठा था। हड़बड़ा कर
दरवाज़ा खोला तो देखा सामने निकिता थी, श्याम के साथ।
''क्या हुआ?''
''ज़िद्द करने लगी निकिता कि मुझे अमित से मिलना है। बहुत समझाया
नहीं मानी तो ले आया। मैं चलता हूँ। फ्लैट पर राधिका अकेली है।''
श्याम बोलकर वापस जाने लगा था।
''और तुम?'' अमित कुछ समझ नहीं पा रहा था। दरवाज़े पर खड़ी निकिता
को देखकर कहने लगा। माँ के सामने अचानक घर के अंदर भी उसे कैसे
बुलाये।
''मैं अभी चली जाऊँगी। बस तुमसे मिलना था।'' निकिता ने पूरी नज़र से
उसे देखकर कहा था। मालती पीछे से उठकर तब तक आ चुकी थी। निकिता की
बात सुनते ही बोलने लगी,
''ऐसे कैसे जाओगी, चाय पीकर जाना। पहली बार आई हो, चलो अंदर।''
श्याम वापस जाने की जल्दी में था। कहने लगा,
''अमित, राधिका घर पर अकेली है। निकिता के साथ हॉस्टल से घर आ गई
थी। मुझे जाना होगा। आँटी मैं फिर कभी आ जाऊँगा। फिर मैं तो आता
रहता हूँ।''
''ठीक है तू जा बेटा। वैसे भी लड़की का इतनी देर रात जाना ठीक नहीं।
क्यूँ बेटी तुझे तो जल्दी नहीं है? तू अब सुबह ही जाना।''
माँ ने कंधे के सहारे निकिता को अंदर आने के लिए कहा था।
निकिता को बात पसंद आई तो अचानक उसके चेहरे पर खुशी दौड़ पड़ी थी।
श्याम उसे अंदर जाता देखकर मुस्कुरा रहा था और अमित समझ नहीं पा
रहा था। हाँ, सुप्रिया ने ''आ आ'' कहकर स्वागत किया था। उस रात
निकिता माँ से घंटों बात करती रही और उन्हीं के साथ सो गई थी। अमित
को उसकी आवाज़ की मिठास दूसरे कमरे में भी देर रात तक सुनाई दी थी।
|
|