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सारा बिस्तर और निकिता के कपड़े गंदे हो चुके थे। श्याम और अमित
हॉस्पिटल से डाइलेटर, क्यूरेटर और काटन वगैरह ले आए थे। साथ में
ज़रूरी इंस्ट्रूमेंट, लोकल एनीस्थिसिया और दवाइयाँ भी रख ली गई थी।
राधिका के साथ अमित ने भी सहयोग किया था। विक्रम और निकिता के
प्रेम का बंधन, जुड़ने से पहले ही खून बनकर बह चुका था। निकिता की
आँखें पथराई हुई थीं। सदमा चेहरे पर साफ़ झलक रहा था। ऐसा लग रहा था
सब कुछ खो चुकी है। दिल की धड़कन चल रही थी परंतु उसमे कोई जीवन नहीं
था। संवेदना पीड़ा के साथ हदें पार कर जाये तो भाव शून्यता प्रवेश
कर जाती है।
राधिका निकिता की हालात देखकर, बाहर आकर श्याम से लिपटकर रोने लगी
थी। अमित ने खून से सने हाथ वॉश बेसिन में धोकर सामने शीशे में देखा
तो अचानक निकिता का प्रतिबिम्ब सामने उभरा था... लगा कि शीशे में
से झाँक रही है। घबराकर वापस कमरे में आया था। दो-चार लंबी सांसे
लेने तक कुछ देर यूँ ही खड़ा रहा था। निकिता लेटे-लेटे विपरीत दिशा
में शून्य की ओर ताक रही थी। अमित से रहा न गया तो उसने सांत्वना
प्रकट करते हुए धीरे से निकिता के सिर पर हाथ रखा था। उसने सपने
में भी नहीं सोचा था कि वह निकिता को इस हालत में देखेगा। मौन चारों
ओर पसरा हुआ था। मस्तिष्क अब भी स्तब्ध था। पता नहीं क्यूँ उसे
महसूस हो रहा था कि जैसे वो ही अपराधी हो... कुछ भी तो नहीं कर पाया
था। अपना एक साथी... जिसको वह कई वर्षों से नज़दीक से देख रहा
है..., जो उससे बच्चों के जैसे ज़िद्द करती, लड़ती, हक़ बताती... उसकी
वह कुछ भी मदद नहीं कर पाया था। बड़ा और पुरुष होते हुए भी वह
असहाय महसूस कर रहा था। भावुक तो था ही मगर हारा हुआ क्यों महसूस
कर रहा था, इसका कारण भी नहीं जान पा रहा था।
कुछ देर बाद श्याम ने अंदर कमरे में आकर, निकिता को ढाढ़स बंधाने
की कोशिश की थी। धीमे मगर स्पष्ट शब्दों ने वातावरण की शांति भंग
की थी,
''सब ठीक हो जायेगा... ऐसा हो जाता है... अमित ने तो बहुत कोशिश
की... पर ख़ैर... तुम चिंता मत करो...''
मगर निकिता में कोई हलचल नहीं थी। श्याम की कोशिश असफल थी। निकिता
अब भी लगातार शून्य में ताक रही थी। अमित हारा हुआ-सा उसके बगल में
ही बैठ चुका था। श्याम कुछ समझ पाने की स्थिति में नहीं था... आगे
क्या करना चाहिए? एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर उभरा था। थोड़ी देर कमरे
में रुकने के बाद, बाहर आकर बालकनी में टहलता रहा। राधिका थक कर
बाहर के कमरे में कुर्सियों पर ही सो चुकी थी।
रात की अंधियारी घड़ियों ने टिक-टिक करते हुए सुबह के तीन बजा दिये
थे। नींद ने अपना प्रभाव श्याम और अमित पर भी दिखाने की कोशिश की
थी मगर निकिता की आँखों में पत्थर थे जो पिघलने का नाम नहीं ले रहे
थे। चिड़ियों की कहीं से हल्की आहट हुयी तो अमित ने ही श्याम से कहा
था,
''...उसे बता देना चाहिए। इस वक्त निकिता को उसकी ज़रूरत है। जो वह
चाहता था अब हो तो गया... देखें अब क्या चाहता है?''
श्याम ने सहमति व्यक्त की थी पर उसे जाने से मना किया था। दोनों
दोस्तों की फुसफुसाहट सुनकर राधिका भी जाग चुकी थी। सुबह की पहली
किरण के साथ ही बड़ी आशा के साथ श्याम घर से निकला तो हवा में ताज़गी
थी।
बहुत उम्मीद से गया था। मगर विक्रम के घर से दस मिनट में ही वापस
लौट आया तो राधिका को आश्चर्य हुआ था। बाहर के कमरे में ही इंतज़ार
कर रही थी। श्याम को देखते ही पूछने लगी,
''...क्या हुआ? ...विक्रम नहीं आया?''
''नहीं।''
''फिर भी, क्या बोला?'' आशा से आँखें उसकी अब भी चमक रही थी।
''पागल हो गया है । कहता है, नॉट इंटरेस्टेड, इट्स ऑल ओवर।''
राधिका ने सुना तो चेहरे का उजाला बुझकर रात का आभास देने लगा था।
शब्द धीमे मगर अंदर के कमरे तक पहुँचने के लिए काफी थे। अमित
बिस्तर के पास पड़े स्टूल पर जड़वत बैठा रह गया था। निकिता ने करवट
पलटकर उसकी ओर पीठ कर ली थी। अमित ने उठकर उसके हाथ को अपने हाथ
में लेकर जैसे ही कहा,
''हिम्मत से काम लो।''
निकिता फूट-फूट कर रो पड़ी थी। उसने लेटे ही लेटे मज़बूती से अमित
का हाथ पकड़ा और अपनी छाती में भींच लिया था। रोने की आवाज़ में तेज़ी
थी, सुनते ही श्याम और राधिका दौड़कर अंदर आए थे। निकिता को टूटकर
बिखरता हुआ देख श्याम की आँखें भी भर आई थीं तो उधर राधिका अपनी
सहेली के सिर पर हाथ रखकर सिसक कर एक बार फिर रोने लगी थी।
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