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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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2.

अनिरुद्ध एम्बुलेंस के जाते ही, माँ को उठाने के लिए दरवाज़ा खटखटाने लगा था। आज शाम भी माँ पिताजी से खूब लड़ी थी। पिताजी के कोई भी जवाब न देने से वह अक्सर ही अपने आप से नाराज़ हो जाया करता था। उसे अपनी माँ से प्यार तो था, मगर उनका व्यवहार जहाँ उसे अनुचित लगता वहीं पिता का चुप रहना उसे बहुत अधिक खलता था। वह कुछ भी नहीं समझ पाता। वह चाहता था कि पापा माँ से थोड़ा डाँट के बात करें। परंतु आज पिता की चुप्पी उसे बहुत खली थी। माँ के द्वारा बहस और चिल्लाने पर भी पापा अक्सर कुछ नहीं कहते। माँ का गुस्सा कुछ देर बढ़कर अपने आप कम हो जाता। मगर आज पिता की एक लाइन,
''अच्छा तुम थक रही हो अब सो जाओ।'' ने तो, माँ के गुस्से को सातवें आसमान पर चढ़ा दिया था। और वो लगभग चीख रही थीं,
''...तुम तो यही चाहते हो कि मैं पूरी तरह से सो जाऊँ।''
और फिर, शायद कुछ ज़्यादा ही नींद की गोलियाँ माँ ने खा ली थीं। पापा रोज़मर्रा की तरह परेशान होते हुए धीरे से उन्हें मना कर रहे थे कि अनिरुद्ध ने अपने कमरे से झाँककर देखा... माँ ने पापा को कमरे से बाहर धक्का देकर निकाला और दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया था। पापा ने दो-चार बार बंद दरवाज़े को धीरे से धक्के से खोलने की कोशिश की फिर खटखटाते हुए कह रहे थे,
''निकिता, ...आई एम सॉरी, दरवाज़ा खोलो।''
अनिरुद्ध को एक बार फिर पिता की बातें कानों में सीसा घोल रही थीं। चिड़चिड़ाहट क्रोध में परिवर्तित हो रही थी। पिता का व्यवहार वह आज तक समझ नहीं पाया था। जबकि अब वह कुछ-कुछ बड़ा हो गया था। और उसकी अपनी सोच विकसित हो रही थी। वह यह सवाल अपने आप से हमेशा पूछता कि उसके पापा माँ के सामने इतना झुकते क्यों हैं? जवाब न मिलने पर वह अपने आक्रोश को खुद ही पी जाता। पापा रोज़ की तरह उनके कमरे में धीरे से आए थे और यों प्रदर्शित कर रहे थे कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं। आकांक्षा और अनिरुद्ध को इन सब बातों को देखने की आदत-सी पड़ गई थी। जब से होश संभाला, माँ को या तो गुमसुम देखा या चीखते-चिल्लाते। वे अकसर डर कर दुबक जाया करते थे और कई बार भाई-बहन मिलकर रो भी लेते थे। पर कभी भी उन्होंने इस बात का ज़िक्र किसी और से नहीं किया था और न ही घर की बातें बाहर बताकर किसी से सहारा लेने की कोशिश की थी। आज भी अनिरुद्ध थोड़े से गुस्से में और आकांक्षा बड़े भावुक ढंग से पिता की ओर देखकर, अपनी-अपनी टेबल पर पढऩे के लिए बैठ गये थे। आकांक्षा की आँखों में अक्सर आँसू आ जाते, जिसे देखकर अनिरुद्ध को अपनी बहन पर प्यार आता था। पापा शायद मुँह धोने के लिए बाथरूम की ओर बढ़े ही थे कि उन्होंने आवाज़ लगाई थी,
''आकांक्षा, बेटा वॉमीटिंग और सीने में बहुत...''
और इसके बाद वह आगे कुछ नहीं बोल पाये थे और दोनों ने पापा को ज़मीन पर गिरते हुए देखा था। दोनों जब तक लपककर उन तक पहुँच पाते वह बेहोश हो चुके थे, साँसें चल रही थी तो चेहरे पर पसीना झलक रहा था।
...सोचते-सोचते अनिरुद्ध की आँखों में आँसू आ चुके थे, अब उसे अपने पिता पर प्यार आ रहा था। ...पता नहीं अस्पताल में किस हाल में होंगे? वह फिर से दरवाज़े को ज़ोर से खटखटाने लगा था। भीतर से कोई भी जवाब न मिलता देख, उसने बाहर बागीचे के रास्ते से, खिड़की से कमरे में झाँकने की कोशिश की थी। अंदर अंधेरा था, कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। लाइट बंद थी। ध्यान से देखने पर लग रहा था कि कोई बिस्तर पर है, परछाई से वह समझ गया था कि माँ लेटी हुई हैं। तेज़ साँसें चलने की आवाज़ से उसे यकीन हो गया था कि वो गहरी नींद में सो रही हैं। फिर भी उसने धीरे से आवाज़ लगायी थी,
''माँ, उठो, दरवाज़ा खोलो, पापा की तबीयत खराब है। उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। ...माँ!!''
कोई जवाब नहीं मिलने पर वह अंदर आकर, रेलवे अस्पताल फ़ोन करके पापा के बारे में जानने की कोशिश करने लगा था। आज उसे पहली बार पापा पर प्यार के साथ-साथ दया भी आ रही थी।
अस्पताल सिस्टर ने बताया था,
''आपके पापा पहुँच चुके हैं... आई.सी.यू. में हैं... डाक्टर चैकअप कर रहे हैं... और चिंता की कोई बात नहीं...''
सुनकर अनिरुद्ध हारा हुआ-सा, माँ के कमरे के बाहर ही बरामदे में कुर्सी लगाकर बैठ गया था। क्या करता। नींद भी नहीं आ रही थी। ऐसे हालात में आज सो भी कैसे सकता था। बचपन में, जब से होश सँभाला है, माँ को यूँ ही लड़ते हुए देखा। छोटी-मोटी बात पर तो कई बार अपने कमरे की लाइट बंद करके सो जाता। कई बार चुपचाप लेटे-लेटे सारा कुछ सुनते रहता, तो कई बार हालात ज़्यादा बिगड़ जाने पर, छोटी उम्र में वह रोने भी लगता था। मगर आजकल न तो वह रोता, न ही किसी बात को ज़्यादा दिल से जोड़ता, पर पढ़ाई में व्यवधान तो पड़ता ही था। लेकिन आज तो हालात भिन्न थे। पापा अस्पताल में, जाने किस हाल में और माँ बेखबर कमरे में सोयी पड़ी हैं। वह जल्द से जल्द ये खबर उनको देना चाहता था। कुछ ऊँच-नीच न हो जाये, भगवान को विनती करने लग पड़ा था। उसका क्रोध, झल्लाहट और आत्मग्लानि में परिवर्तित हो रहा था। ...क्या जीवन है!! ...उसके सारे दोस्त कितने खुश और मस्त रहते हैं। उन्हें तो वह अपना दुःख नहीं बताता, उलटा अपनी झूठी खुशियों की बात ज़रूर सुनाता रहता। पर कई बार घर पर हालात इतने बिगड़ जाते कि कई-कई दिन बिना खाये-पिये गुज़ारने पड़ते। ...उसके साथ ही ऐसा क्यों? ...उसका क्या कसूर है? सोचते-सोचते वह बहुत दिनों बाद आज अचानक एक बार फिर रो पड़ा था। सारा दुःख, आँसू बनकर आँखों से बहने लगा था।



 

 


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