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14.
कम उम्र होते हुए भी अमित अब थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था। मंदिर से
आने के तुरंत बाद माँ बिस्तर पर गिरकर मूर्च्छित हो गई थी। एक मिनट
के लिए तो वह घबराया था फिर कुछ देर बाद धीरे से उसने उसे उठाया और
मंदिर से मिला प्रसाद और खाने के पैकेट में से धीरे-धीरे अपने हाथों
से खिलाने की कोशिश की थी। मालती की आँखों में आँसू थे कि रुकने का
नाम ही नहीं लेते और उसने अपने बेटे को अपने सीने से लगा लिया था।
सिर पर हाथ फेरते हुए उसने अमित को भी खाने के लिए कहा था। अमित की
बढ़ती उम्र थी, भूख थी कि आजकल मिटती ही नहीं, सो वो अपने हिस्से
का पैकेट जल्दी ही खा गया था। बीच-बीच में अपने हाथों से सुप्रिया
को भी खिलाते जाता जिसका चेहरा भूख से सूख कर काँटा हो रहा था।
मालती को, थोड़ा-सा ही कुछ खाने के बाद, पानी पीने से नींद आ गई
थी। और फिर बहुत देर तक वह चाहते हुए भी उठ नहीं पाई थी। अधिक
कमज़ोरी में अब उसे उठने में तकलीफ़ होने लगी थी।
मंदिर... उसमें मिलने वाला प्रसाद... शुद्ध खाने का सामान ही तो
है... और जाने-अनजाने अमित को एक रास्ता मिल चुका था... मानो माता
दुर्गा ने खुद उसे दिखाया हो। अब वह रोज़ स्कूल से लौटते हुए मंदिर
में कुछ देर इंतज़ार करता, जितना भी प्रसाद मिलता स्कूल के बस्ते
में रखता जाता और फिर घर आकर सुप्रिया और माँ को खिलाता। शाम के
वक्त जब सभी मोहल्ले के बच्चे खेल रहे होते, वह पास स्थित हाईकोर्ट
में, हनुमान मंदिर जाकर प्रसाद इकट्ठा करता। माँ के पूछने पर उसने
सीधे-सीधे जवाब दिया था, फिर छिपाना भी कैसा...
''माँ रोज़ मंदिर जाता हूँ, पूजा करने, प्रसाद मिलता है तो ले आता
हूँ।''
मालती में मना करने की शक्ति नहीं थी। और इसमें ग़लत भी क्या है,
फिर भगवान नाराज़ भी तो हो सकते हैं। माँ की हालत अमित को दिखने लगी
थी। और एक शाम उसने सारी बात सुप्रिया को धीरे से बताई थी। वह वैसे
भी अपनी दिल की बात बहन से कर लिया करता था। सुप्रिया यों तो खुद
भी बहुत बड़ी नहीं थी, फिर शारीरिक रूप से मजबूर, परन्तु माँ की
परिस्थितियों और घर के हालात ने उसे मौत से पहले ही जला दिया था।
वह चुपचाप सुनती रही थी। और उस शाम के बाद से उसने 'आ आ' बोलना भी
बंद कर दिया था। एक मौन, सम्पूर्ण मौन। वैसे भी अब उसे घर पर, कई
बार घंटों अकेले रहना पड़ता था। माँ को काम की तलाश में जाना पड़ता।
पहले तो बाथरूम जाना हो या पानी पीना, आवाज़ लगाई, माँ आ जाती थी।
परन्तु अब उसे कई बार इंतज़ार करना पड़ता था। इंतज़ार करते-करते कई
बार उसे काफी दिक्कत होती और फिर रोक न पाती तो बिस्तर भी गंदा कर
दिया करती। मालती ने बिस्तर की सफ़ाई करते हुए, कभी भी किसी तरह का
क्रोध या परेशानी ज़ाहिर नहीं की थी, माँ जो ठहरी। मगर फिर भी
सुप्रिया को बहुत आत्मग्लानि होती। और वह अपने आपको अंदर ही अंदर
खूब प्रताड़ित करती।
परेशानियाँ अपनी ज़िंदगी जी रही थीं। मौत घर पर दस्तक देती उसके पहले
एक दिन अचानक गुरुजी दोपहर में घर आ पहुँचे। उनके चेहरे पर बहुत
खुशी थी। मालती के घर से बाहर निकलते ही कह बैठे,
''आज तो बेटा चाय पिऊँगा।''
मालती दौड़ते हुए गीता के यहाँ गई और एक कप चाय बना लायी थी। चाय
पीते-पीते धीरे से गुरुजी ने कहा था,
''...बेटा अगर बुरा न मानो तो एक काम मिल गया है। नौकरी तो बहुत
छोटी है। मैनेजमेंट ने मास्टरजी के पुराने कामकाज को ध्यान रखते
हुए ...तुझे ...स्कूल में ...आया का काम देने के लिए हामी भर दी
है। ...तुझे बेटा कोई परेशानी नहीं होगी। स्कूल में ज़्यादा कुछ नहीं
थोड़ी साफ़-सफ़ाई करनी होती है। बच्चों की देखभाल करनी होती है।
ठीक-ठीक पैसे मिल जाएगें। तुझे कोई आपत्ति न हो तो, मैं हाँ कर
दूँ।''
इससे पहले पैसे के बारे में गुरुजी कुछ कह पाते। मालती ने झट हाँ
कह दी थी। अन्धा क्या माँगे, उसे तो जैसे सारे जहान की खुशियाँ मिल
गई थी। नसों में खून खुशी से दौड़ पड़ा था, चेहरे पर जीवन की उमंग
एक बार फिर उभर आई थी। वैसे भी अब उसका एक ही लक्ष्य था ज़िंदा रहने
के लिए घर में दो वक्त की रोटी, बस। वो भी बच्चों के लिए पहले। और
वो पूरी होती दिखाई दी तो मालती की खुशी का ठिकाना नहीं था। शरम तो
उसमें होती है जिसके पास कुछ छुपाने के लिए होता है। काम कोई भी
हो, काम ही होता है। फिर उसकी तो कोई सोच ही नहीं थी। गुरुजी काम
का विवरण देने से पहले हिचकिचा रहे थे कि जिस स्कूल में मास्टर जी
ने एक अध्यापक की नौकरी की हो, वहीं पर उसकी औरत आया का काम करें।
यह बात पढ़े-लिखों के लिए तकलीफ़दायक हो सकती है, परन्तु मालती के
लिए ऐसा कुछ भी नहीं था। इस हालात में वह दो बच्चों को पालने के
लिए कुछ भी काम करने के लिए तैयार थी। हाँ, सही और ग़लत के लिए उसका
एक बहुत ही छोटा पैमाना था। समाज की निगाहों में और खुद की सोच
में, बस सुनीता वाला कार्य नहीं कर सकती थी। वैसे उसे अब सुनीता
में भी कोई खोट नहीं दिखता था।
मालती के लिए गुरुजी की मदद वरदान थी। वो खुशी-खुशी घर से बाहर
वापस जाने के लिए मुड़े ही थे कि उसने झट हाथ जोड़कर झुकते हुए अपने
दिल की भावना प्रकट कर दी थी और फिर बिना मौका गंवाए कहने लगी,
''मैं कल से ही आ जाऊँगी, अमित के साथ।'' गुरुजी समझ सकते थे और
उनके चेहरे पर उभरी मुस्कुराहट ने सब कुछ बयान कर दिया था। और फिर
तुरंत आशीर्वाद के लिए हाथ भी तो ऊपर उठ गए थे।
सुप्रिया लेटे-लेटे सब सुन रही थी। उसकी खुशी का भी ठिकाना न था।
गुरुजी के जाते ही माँ-बेटी मिलकर बात करने लगे थे और अमित का
इंतज़ार हो चला था।
अमित स्कूल से आकर सुनने पर बहुत खुश हुआ था। इस छोटी उम्र में,
माँ उसके साथ स्कूल भी जाएगी। यही उसके लिए काफी था। वैसे भी वह
माँ की हालत से बहुत परेशान था।
मालती जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो रही थी कि एकदम उसे याद
आया कि घर पर सुप्रिया अकेले कैसे रहेगी। बस यह सोचते ही एक मिनट
के लिए परेशान और खामोश हुई थी। सुप्रिया शायद समझ चुकी थी तभी तो
उसने हिम्मत दिलाते हुए बहुत दिनों बाद आवाज़ निकाली थी,
''आ आ...''
मानो कह रही हो... तू चिंता न कर माँ, मैं यहाँ ठीक हूँ। मैं अपने
आप को संभाल लूँगी।
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