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     (मानसिक रोगी के परिवार की दर्दभरी कहानी)

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10.

एक दिन सुबह-सुबह उठकर उस भोली-भाली औरत ने सर्वप्रथम घर से बाहर पैर रखे थे। वह गुरुजी से कभी मिली तो नहीं थी सिर्फ दूर से देखा था। एक-दो बार किसी त्योहार पर अभिवादन ज़रूर किया था। मास्टर जी से उनके बारे में सुना काफी था... काफी सज्जन पुरुष हैं, ब्राह्मण हैं, धर्म से भी और कर्म से भी... साथ ही बड़े दयालु भी हैं। सबकी मदद करते हैं। मास्टर जी के स्कूल में वह प्राध्यापक थे। उन्हें सारे प्यार से गुरुजी कहा करते थे। मालती के लिए तो वह बहुत बड़े इंसान थे। मालती सक्सेना को इससे बड़ा और कोई आसरा फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रहा था। वह कितनी पढ़ी-लिखी थी, उसे इसका ज्ञान नहीं था। हाँ, अमित की हर साल की स्कूल की किताबों में से वह चित्र ज़रूर देख लिया करती थी। अपना नाम भी लिख लेती थी और टूटा-फूटा थोड़ा पढ़ लेती थी। आज तक उसने अकेले, मोहल्ले के बाहर कदम नहीं रखा था। वैसे भी सुप्रिया के पास उसे सदैव रहना पड़ता था। सुप्रिया उसके जीवन की एक धुरी और परिधि दोनों ही थी। ...तो फिर उसकी देखभाल के लिए किसी को तो छोडऩा ही होगा। और फिर अमित को साथ लेकर जाते-जाते उसने गीता से कहा था,
''तू आज सुप्रिया के पास थोड़ी देर रहना, मैं गुरुजी से स्कूल में मिलकर आती हूँ। स्कूल में शायद कोई काम मिल जाये।''
सुप्रिया बोल तो नहीं पाती थी, परंतु जो वह कहना चाहती, वो माँ और अमित को उसके चेहरे और आँखों के हाव-भाव से पूरी तरह समझ आ जाता था। मालती ने घर के बाहर कदम रखने से पूर्व बेटी के चेहरे पर एक निगाह डाली तो लगा कि मानो उसने कहा हो कि ....आप जाओ, चिंता की कोई बात नहीं। उधर, अमित को इस छोटी-सी उम्र में भी अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास था। वह उसी स्कूल में पढ़ता था। मालती को स्कूल का रास्ता भी पता न था और वह बेटे के पीछे-पीछे हो ली थी। स्कूल पहुँचकर प्राध्यापक के कमरे के बाहर बहुत देर तक दोनों खड़े रहे थे। मालती ने कई बार सिर पर पल्ला ठीक किया था। घबराहट से मुँह सूख रहा था हिचकिचाहट में पैर आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। अंत में स्कूल के चपरासी ने उसे अंदर भेजने में मदद की थी। गुरुजी दोनों को देखते ही कुर्सी से उठ खड़े हुए थे। चेहरे पर आश्चर्य था,
''बेटी!! तुम यहाँ कैसे? मुझे बुला लिया होता, मैं घर आ जाता...'' फिर कुछ देर ठहरकर बोलने लगे, ''...अच्छा पहले यहाँ बैठो और बताओ, सब ठीक तो है?''
और फिर अमित के सिर पर हाथ फेरकर उन्होंने प्यार किया था।
आँचल से सिर को ढककर, पूरे शरीर पर लिपटी हुई साड़ी ने मालती की शारीरिक अवस्था को छुपा तो लिया था, परंतु उसकी आँखों के नीचे छुपी हुई उदासी ने काफी कुछ कहने की कोशिश की थी।
''गुरुजी...''
कुछ देर रुकने के बाद हाथ जोडक़र खड़े होते हुए बस इतना ही कह पाई थी,
''...आप ही हमें बताएं कि अब हम क्या करें?''
इसके लिए गुरुजी पूर्ण रूप से तैयार नहीं थे। आदमी दूसरे की परेशानियों को जानता तो है, कई बार समझता भी है, परंतु जब तक खुद पर न बीते तब तक उसकी तीव्रता नहीं महसूस कर पाता। फिर उसके बारे में बहुत अधिक विचार करने की तो ज़रूरत भी नहीं समझता। और अगर विचार किया भी तो सिर्फ विचार-विमर्श के लिए, किसी ठोस समाधान के लिए कभी नहीं सोचता। जिस सहजता और सरलता से मालती सक्सेना ने गुरुजी के सामने कहा था उसमें कोई भी किसी तरीके का आडम्बर नहीं था। न कोई नाटक न ही दुःखों का जबरन प्रदर्शन। एक हक़ीक़त थी, जिसे उसने स्वीकार किया था और वह उसी में रहना भी चाहती थी। वैसे जीने की उसकी कोई उमंग नहीं थी, परंतु मरना उसके बस में नहीं था। यूँ तो शायद मर भी जाती, परंतु दो बंधन उसके साथ इस तरह से बंधे हुए थे कि वह उसे किसी भी कीमत पर तोडऩा नहीं चाहती थी। उसके बच्चों के बंधन उसके लिए बोझ नहीं थे यह तो सहज ही उसके जीने का एक मक़सद बन गए थे। जो जी रहा है उसे कोई न कोई बंधन चाहिए, कोई न कोई मंज़िल चाहिए। मालती को अब बच्चों के प्यार के साथ-साथ उनकी ज़िम्मेदारी भी थी। उसे इस बात का एहसास था। इन कुछ महीनों में ही वह अचानक कई साल बड़ी हो चुकी थी। उसके चेहरे पर मासूमियत की जगह परिपक्वता ने ले ली थी। गुरुजी उसके चेहरे के अंदर हो रहे परिवर्तन को महसूस कर सकते थे। वह दार्शनिक, सुलझे हुए, कर्मशील व्यक्ति थे। परंतु इस समस्या और उसके हल के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। वह ऐसे भी नहीं थे कि इस मुसीबत से छुटकारा कर लें। चाहते तो कह सकते थे कि इसमें हम क्या करें। परंतु दो मिनट के मौन के बाद कहने लगे,
''...बताओ बेटा तुम क्या चाहती हो?''
इस सवाल के लिए मालती सक्सेना तैयार नहीं थी और न ही इसका जवाब देना चाहती थी। अभी तक जो कुछ हुआ उसकी उसे कोई चाहत नहीं थी। उसने यह तो नहीं चाहा था। फिर आगे वह क्या चाह सकती है। अब उसके चाहने की कोई बात कहाँ रह जाती है। उसका मौन गुरुजी को काफी हद तक समझ में आ गया था।
''अच्छा बेटी तुम घर चलो। हम आपके लिए कुछ न कुछ...''
गुरुजी इसके आगे कुछ भी कहने में असमर्थ थे। वह यह भी नहीं जानते थे कि वह किस कोशिश में हैं और वह क्या कर पायेंगे। मालती ने हाथ जोड़ा, आँखें नीची की और अपने सिर के पल्लू को ठीक करके कमरे से बाहर आ गई थी। पथराई आँखों में, अब आँसुओं की कोई जगह नहीं थी। चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं तो कोई बेचैनी भी नहीं थी। उसके पास खोने के लिए अब और कुछ नहीं था। रास्ते में किराने की दुकान से उसने दो दिन का राशन लिया तो साहू ने कहा था,
''आप चिंता न करो बहन, जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, तब दे देना।''
अब बनिया भी क्या करे, धर्मशाला तो खोली नहीं। दुकान तो चलाना है। सामान देने के साथ ही रुक न पाया तो बोल ही दिया। मालती के पास इसका कोई जवाब नहीं था, अगर मना भी कर देता तो कोई जबरदस्ती नहीं करती। उसने सामान दे दिया तो उसे चुपचाप लेकर घर पहुँची थी। गीता सुप्रिया के साथ बातें कर रही थी। माँ और भाई को वापस देख सुप्रिया के चेहरे पर रौनक लौट आई थी। मालती बिना किसी उत्साह के उसके पास जाकर बैठ गई थी। चेहरे की उदासी को मुस्कुराहट ने जबरन हटाने की कोशिश की मगर वो असफल हुई थी। माँ को हताश देख अमित ने कहा था,
''माँ तू चिंता न कर, एक बार मुझे बड़ा होने दे, मैं डाक्टर बनकर सब ठीक कर दूँगा... पहले दीदी का इलाज़ करूँगा... फिर तुझे कोई परेशानी नहीं होने दूँगा...''
''हाँ! हाँ!'' सुप्रिया ने सुनकर अपनी खुशी का इज़हार किया था। मालती के चेहरे पर आश्चर्य फिर चमक उभरी थी और फिर उसने अमित को खींचकर अपनी छाती से लगा लिया था। साथ ही सुप्रिया के सिर पर हाथ फेरना नहीं भूली थी। गीता को घर पर काम था बिना ज़्यादा कुछ बात किए वापस तो चली गयी मगर फिर बहुत देर तक मालती की दयनीय अवस्था उसे सोचने के लिए मजबूर करती रही थी।
कुछ देर यूँ ही शून्य में बैठे रहने के बाद मालती ने उठते हुए धीरे से कहा था,
''अमित, चल बेटा मुँह-हाथ धो ले, तुम लोगों के लिए कुछ बना देती हूँ।''
जीने के लिए तो खाना ज़रूरी है। पेट को नहीं पता चलता कि उसको खिलाने वाला मर चुका है। उसे तो भूख लगती है। अब वह कैसे खत्म होगी, उसे सोचने की ज़रूरत नहीं होती। माँ ने चावल-दाल बनाये थे। अमित को बहुत तेज़ भूख लग रही थी।
''बेटा ज़रा तू ही दीदी को भी खिला दे।''
अमित एक ही थाली से सुप्रिया को भी खिलाता जा रहा था और खुद भी खा रहा था कि अचानक बीच में बोल पड़ा,
''माँ तू भी खा ले।''
''हाँ, मैं भी लेती हूँ।''
''माँ ले ले न।'' अमित प्यार से कह रहा था।
मालती की भूख खत्म तो नहीं हुई थी पर मन नहीं था। स्कूल से आने के बाद आज पहली बार माँ ने अमित की कही बात को बड़े ग़ौर से सुना था और इस लाइन ने उसको पहली बार एक जीने का विश्वास दिया था। एक आशा की किरण। उसे पहली बार यह एहसास हुआ कि उसके पास भी एक शक्ति है, अगर उसकी एक परेशानी है तो दूसरा उसको सँभालने के लिए, उसको चलाने के लिए, उस परेशानी से बचाने के लिए एक सहारा भी है। उसके पास एक भविष्य है। पहली बार उसे लगा था कि वह भी कुछ कर सकती है। उसके भविष्य के गर्भ में भी कुछ न कुछ छुपा हुआ है। और उसके मन में भी कुछ करने की इच्छा जाग्रत हुई थी। अपने लिए नहीं सिर्फ अमित के लिए। वह यह भी जानती थी, उसने बचपन से देखा था कि अमित सुप्रिया को न केवल प्यार करता था बल्कि उसकी बहुत देखभाल भी करता था। सुप्रिया उस पर हुक्म चलाती रहती। उस पर अपना हक़ समझती थी। उस पर अपना अधिकार जताती थी। यहाँ तक कि अपनी चिड़चिड़ाहट भी अमित पर ही निकालती थी। अमित छोटा होते हुए भी उसकी सारी परेशानियों, सारी चिड़चिड़ाहट को बड़ी शालीनता से स्वीकार करता था। वही शालीनता उसका मौलिक स्वभाव बनता जा रहा था। उसमें सुप्रिया के प्रति कोई करुणा नहीं थी, कोई दया नहीं थी, यह उसका प्रेम था। बहन के लिए प्रेम, एक बंधन, जिसमें उसे आनंद आता था। उसकी देखभाल करना वह अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी ही नहीं अपना धर्म भी समझता और यह उसकी दिनचर्या में शामिल था।
''...माँ तू चिंता न कर, मुझे एक बार बड़ा होने दे, देख मैं डाक्टर बनूँगा। दीदी को भी ठीक करूँगा और तुझे फिर कोई परेशानी नहीं होने दूँगा।''
ये शब्द कानों में लगातार बज रहे थे जो हर बार मस्तिष्क को झकझोर देते। उसे लगा कि उसकी सूखी हुई आँखों में, उसके पथराये हुए भविष्य पर मानो किसी ने पानी के छींटे डाले हों और उसमें कोमल-सी घास अंकुरित होना शुरू हो गई हो। उसने पहली बार किसी भविष्य की परिकल्पना की थी। उसे पहली बार कोई मंज़िल प्राप्त हुई थी। उसे पहली बार ऐसा लगा कि हाँ, मुझे बच्चों के लिए जीना है। उसे पहली बार ऐसा लगा कि उसे यह कार्य करना है। उसे पहली बार ऐसा लगा कि घर में खाना बनाने के अलावा भी कोई कार्य है। ...और अचानक मन भावनाओं में बहने लगा और उसकी आँखों से बह रहे आँसुओं ने उसके अंदर के आत्मविश्वास को संचारित किया था। एक बार फिर अमित को उसने खींचकर अपनी बाँहों में ले लिया। सुप्रिया शारीरिक रूप से अपाहिज थी, परंतु मानसिक रूप से नहीं। वह माँ और अमित के इस मिलन को देखकर टूट पड़ी और उसकी आँखों के आँसुओं ने सारी सीमाएं तोड़ दी थीं। वह अपनी कमज़ोरी, अपनी मुसीबतें कभी भी ज़ाहिर नहीं होने देती। आज उसके हाथ अपने आँसू पोंछने की कोशिश कर रहे थे परंतु सदैव की भांति आज भी वह पुनः नाकामयाब थी। अंत में हार कर उसने अपने कंधों से अपने आँसुओं को पोंछने की कोशिश की थी। उसके शरीर के अंदर की प्रत्येक रक्त कोशिकाओं ने आवेग में चलने की कोशिश की थी। मस्तिष्क ने उन्हें चलायमान करने का प्रयत्न किया, परंतु शारीरिक अवस्था ने उसे ध्वस्त कर दिया था। और अचानक आँसू उग्र रूप से बहने लगे थे। मालती उसे देखकर समझ गई, माँ जो थी। अमित को एक बाँह में लेकर उसने सुप्रिया को भी अपनी दूसरी बाँहों में समेट लिया था। आज सुप्रिया पहली बार ''हा, हा'' करके कुछ कह नहीं रही थी, सिर्फ रो रही थी। मालती ने तभी उसके सिर पर हाथ रखा था, मानो कह रही हो...
''बेटी मैं अभी ज़िंदा हूँ।''
अमित जिसकी उँचाई अभी माँ के सीने तक नहीं पहुँच पाई थी। उसके आँचल में छुप रहा था। मगर उसे आज अपने छोटे होने पर तकलीफ़ हुई थी। उसे पहली बार लगा कि उसे जल्दी से जल्दी बड़ा हो जाना चाहिए। उसे ख़वाबों में जीने का शौक नहीं था। और होता भी कैसे? सपनों को भी कोई धरातल चाहिए। और वो तो छोटी उम्र में ही अचानक अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत था। यह उसकी, अंदर की एक इच्छाशक्ति थी, प्रकृति के विरुद्ध लड़ने की चेतावनी थी, अपनी किस्मत के विरुद्ध जाने के लिए उतावलापन था। एक द्वँद्व था। जो यह बताना चाहता था, अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहता था। वह अपनी परेशानियों से परेशान नहीं था। हाँ, उसे दूर करना चाहता था। उसकी छोटी-सी बुद्धि ने उसे यह ज़रूर समझाया था कि उसके साथ बंधे हुए दो इंसानों के साथ, बंधन बांधने वाले ने ज़रूर नाइंसाफ़ी की है। उसे इस चीज़ का एहसास होने लगा था कि वह बहुत सारी मुश्किलों से घिरा हुआ एक ग़रीब बच्चा है, परंतु साथ ही फिर एक विश्वास उभरता कि वह इस परिस्थिति को ज़रूर परिवर्तित करेगा। उसे यह नहीं पता था कि यह परिवर्तन कैसा होगा, उस मंज़िल तक पहुंचने के लिए उसे किन-किन रास्तों में कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा? सिर्फ विश्वास था। बाकी भविष्य के गर्भ में क्या है वह तो अच्छों-अच्छों को नहीं पता।



 

 


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