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1.
अदिति ने अधखुली आँखों से देखा, सामने की दीवार पर टंगी गोल घड़ी
में, रात के 11 बज चुके थे। आज फिर अमित का इंतज़ार करते-करते वह
बिस्तर पर लेट चुकी थी। नींद का झोंका एक बार फिर अभी पलकों पर बोझ
बन ही पता कि तभी रेलवे पीबीएक्स का टेलीफ़ोन अपनी तेज़ आवाज़ में बज
उठा। थक हुआ मस्तिष्क अचानक सोते से जागा था... अदिति ने सोचा अमित
का ही होगा। आज फिर देर से आने का कोई न कोई नया बहाना ढूँढ़ रहा
होगा। उठने की हिम्मत न हुई तो लेटे-लेटे ही पास में टेबल पर पड़े
हुए फ़ोन के रिसीवर को उठाकर उसने धीरे से कहा था,
''हैलो।''
''मैं... डाक्टर अमित सक्सेना की बेटी बोल रही हूँ। आप कौन बोल रही
हैं?'' उधर की आवाज़ में घबराहट थी।
''बेटा, मैं अदिति आँटी।''
''अदिति आँटी बोल रही हैं...''
अब तक अदिति पूरे होश में आ चुकी थी, उठकर बैठ गयी।
''...आँटी आप जल्दी घर आ जाइए। पापा बाथरूम में गिर गये हैं। सीने
में उन्हें काफी तेज़ दर्द हुआ था। शायद उलटी करने की कोशिश में
बाथरूम की ओर जा रहे थे। मुझे उन्होंने आवाज़ भी लगाई थी। आँटी कुछ
कहना चाह रहे थे कि कहते-कहते ही मेरे सामने बाथरूम के दरवाज़े पर
गिर गये...'' आकांक्षा ने एक साँस में, रोते हुए सारी बातें बोल दी
थी।
''मम्मी कहाँ है बेटा?'' अदिति अचानक पूछ बैठी।
''मम्मी, हाँ वो... आँटी पहले आप जल्दी से आ जाइये।''
यह कहकर पूरी बात किए बिना आकांक्षा ने टेलीफ़ोन रख दिया था। अदिति
को लगा कि वह शायद बहुत बुरा सपना देखने जा रही है। हड़बड़ाकर,
उठकर खड़ी हो गई थी। हाथ अपने आप ही बिस्तर के सिरहाने पर लटके कॉल
बेल तक पहुंच गया था। घंटी बजाने के बाद उसने तुरंत अपना बैग उठाया
और ज़रूरी इंजेक्शन, दवाइयाँ और ब्लड प्रेशर मशीन (स्टिग्मोमेंनोमीटर)
साथ रखने लगी थी। कमरे से बाहर निकलने से ठीक पहले स्टेथिस्कोप गले
में लटकाया और किसी वार्ड ब्वॉय या सिस्टर के आने का इंतज़ार किए
बिना तुरंत दरवाज़े की ओर लपकी थी। मस्तिष्क पूरी तरह क्रियाशील हो
चुका था। वह समझ नहीं पा रही थी कि अचानक यह सब कैसे हुआ होगा।
ज़रूर कोई न कोई परेशानी है। कॉडियक पेन है। एमआई भी हो सकता है।
जैसे ही बाहर निकली सामने से सिस्टर ऑन ड्यूटी, घंटी सुनकर सिस्टर
रूम से निकल रही थी।
''जी मैडम।''
''सिस्टर, जल्दी से ड्राइवर को बुलाओ। मैं अपनी कार से डाक्टर अमित
सक्सेना के घर जा रही हूँ। आप एम्बुलेंस में वार्ड ब्वॉय के साथ
तुरंत उनके घर पहुंचिए। डाक्टर साहब को सीने में दर्द, कॉडियक पेन
हुआ है। वो भी बहुत तेज़। हो सकता है एमआई हो। बेहोश हो गये हैं।
साथ में ज़रूरी फ़र्स्ट एड और ईसीजी मशीन रख लेना। एम्बुलेंस में
आक्सीजन चैक कर लेना...''
यह बोलते-बोलते अदिति अपनी कार की ओर तेज़ी से बढ़ रही थी। बाहर
बरामदा एकदम सुनसान था। पार्किंग में पहुँची तो उसने देखा कार की
बगल में एम्बुलेंस खड़ी तो थी परंतु आसपास ड्राइवर नहीं था। ज़रूर
कहीं पास में ही सो रहा होगा... यह सोचते हुए उसने कार का दरवाज़ा
फुर्ती से खोला और बिना कोई व़क्त गँवाए हुए गाड़ी स्टार्ट करके
तेज़ी से हॉस्पिटल के गेट की ओर बढ़ गई थी। लोहे का विशाल फाटक खुला
हुआ था। अस्पताल परिसर से बाहर निकली तो देर रात और हल्की-सी ठंड
होने के कारण सामने का सारा मार्केट बंद हो चुका था। रास्ता
बिल्कुल सुनसान था और वह इंदिरा मार्केट से गुज़रते हुए रेलवे ब्रिज
क्रास करके अमित के घर की ओर चल पड़ी थी। जिस तेज़ी से कार की
रफ्तार बढ़ रही थी उसी तेज़ी से उसके दिमाग़ में बहुत सारे सवाल उठ
रहे थे और फिर उनके जवाब भी वह स्वयं ही निकालने की कोशिश करने लग
पड़ी थी। कुछ दिनों से उसने देखा था अमित बहुत ज़्यादा चुप और उदास
रहने लगा था। ऐसा लगता था कि अब उसे जीने की कोई खास इच्छा या
तमन्ना नहीं रह गई है। जीवन जैसे उसके लिए एक बोझ हो चुका है। उसने
पाया था कि कभी-कभी दिन में भी शराब की दुर्गंध उसके मुँह से आती
थी। कई बार उसने अपना हक़ जताते हुए उसे रोकने की कोशिश की थी। उसने
सदैव उसका पालन करने के लिए विश्वास भी दिलाया था। ...क्या हो गया
है? क्या यह सब निकिता...? वह कुछ समझ नहीं पाई थी। दिमाग़ में सवाल
पर सवाल उठ रहे थे और वह कब अमित के घर पहुँच गई, पता भी नहीं चला।
वैसे भी रेलवे के बंगले अस्पताल के पास ही थे। घर के बाहर रोड पर
गाड़ी रोक कर खिड़की से झांका तो देखती है कि बागीचे के बाहर
अनिरुद्ध गेट खोलकर उसका इंतज़ार ही कर रहा था। कार वह बंगले के
अंदर तक ले गई तो अनिरुद्ध पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया था,
''आँटी, जल्दी चलो।''
अदिति ने उतरकर अभी कार का दरवाज़ा बंद किया ही था कि आकांक्षा भी
अंदर से बाहर दौड़ती हुई आ गई थी। बैग लेकर वह उसके साथ अंदर की ओर
लपकी और अमित के बेडरूम की ओर बढ़ती इससे पहले आकांक्षा इशारे से
उसे दूसरी ओर ले गई थी। अदिति दूसरे छोर पर स्थित बेडरूम में पहुंची
तो देखा... अमित बेडरूम के अंदर के दरवाज़े पर, जो कि बाथरूम की ओर
खुलता है, ज़मीन पर गिरा हुआ है। बैग को बिस्तर पर रखकर अदिति ने
तुरंत ज़मीन पर बैठते हुए अमित का सिर अपनी गोदी में रखा और सबसे
पहले उसके हाथ की नब्ज देखी, वो धीमी मगर चल रही थी। आँखें अधखुली
और दर्द से भरी हुई थी। बेहोशी की हालत में मुँह से हल्का-सा झाग
निकल रहा था। छाती को सहलाने के बाद अमित का मुँह साफ़ करके उसने
तुरंत अपने मुँह से अमित को आक्सीजन देने की कोशिश की थी। इसके पहले
कि सिस्टर और वार्ड ब्वॉय पहुंचते, आकांक्षा की गोद में अमित का
सिर रखकर उसने उठकर इंजेक्शन निकाला और एनजाइम का आईवी देने के लिए
अमित के हाथों की नब्ज़ को ढूँढऩे लगी थी। अमित, उसने पाया काफी
कमज़ोर हो चुका था। शरीर सूखकर लकड़ी हो चुका था, ऐसा लग रहा था मानो
किसी पेड़ को महीनों से पानी न मिला हो। नब्ज़ को ढूँढऩे में उसे
काफी तकलीफ़ हुई थी। ब्लड प्रेशर चैक किया तो पाया वो बहुत ज़्यादा
गिर चुका था। अदिति ने एक लंबी साँस ली और फिर धीरे से अनिरुद्ध से
कहने लगी थी,
''बेटा, पापा को बिस्तर पर लेटाते हैं।''
अनिरुद्ध, 14 या 15 साल की उम्र होगी, ठीक-ठीक सेहत, परेशान और फटी
आँखों से सब कुछ देख रहा था। तुरंत उसने अदिति आँटी और आकांक्षा के
साथ मिल कर पापा को बिस्तर पर लिटाया था। अमित के मुंह में, जीभ पर
एसप्रिन की टेबलेट रखने के बाद, अदिति ने चारों ओर नज़र घुमायी, और
अगले ही पल समझ गई थी कि यह बच्चों का कमरा है। दो टेबलें, दोनों
पर किताबें बिखरी पड़ी थीं, देखकर लग रहा था कि बच्चे अपना काफी
समय, पढ़ाई में बिताते हैं। नहीं-नहीं शायद उनकी ज़िंदगी, खुशियाँ,
और ग़म, इसी कमरे में सिमट के रह गये हैं। तभी तो चारों दीवारें भरी
पड़ी हैं। जहाँ एक ओर पसंदीदा हीरो और हीरोइन की फोटो लगी हुई थी,
वहीं बड़े-बड़े दार्शनिक और नेताओं की फोटो भी चिपकाई गई थीं।
अच्छी-अच्छी कहावतें दिल को छू लेने के लिए काफी थीं। पलंग पर कपड़े,
ज़मीन पर जूते-चप्पल बिखरे पड़े थे। सब कुछ तो यहीं था। ...चारों ओर
नज़रें घुमाते हुए अदिति लगातार अमित की छाती को सहला रही थी और
बीच-बीच में मुँह से ऑक्सीजन दे देती। हर एक मिनट में कलाई की घड़ी
की ओर देखती, एम्बुलेंस का उसे बेसब्री से इंतज़ार था।
बाहर एम्बुलेंस की आवाज़ सुनकर अभी अदिति ने आकांक्षा से कहा ही था
कि जल्दी से वार्ड ब्वॉय को स्ट्रेचर के साथ अंदर बुला लो, तभी
देखती है कि अनिरुद्ध वार्ड ब्वॉय के साथ स्ट्रेचर लेकर अंदर
प्रवेश कर रहा था। अदिति ने बिना एक पल गंवाये हुए, अमित को
स्ट्रेचर पर लिटाया और साथ ही एम्बुलेंस की ओर लपकी थी। और फिर अपनी
कार वहीं छोडक़र वह एम्बुलेंस में ही अमित के पास बैठ गई थी।
आकांक्षा, अनिरुद्ध को माँ को उठाने के लिए घर पर छोडक़र, खुद अदिति
आँटी के साथ हो ली थी। एम्बुलेंस बंगले के बाहर निकलने लगी तो
अनिरुद्ध वहीं खड़ा रह गया था। आकांक्षा ने एक नज़र पीछे छूटते घर
की ओर डाली और फिर पिता की ओर देखने लगी थी। भावनाओं पर अनिश्चितता
का डर बढ़ने लगा तो उसने रोते हुए अदिति से धीरे से पूछा था,
''आँटी, क्या हुआ है पापा को? सब ठीक तो है न?''
''सब ठीक है, परेशान होने वाली कोई बात नहीं।''
अदिति ने आकांक्षा के हाथों को अपने हाथ में लेकर, ढाढ़स बंधाने की
कोशिश की थी। कुछ ही पल में अमित आई.सी.यू. के स्पेशल रूम में था।
तुरंत ऑक्सीजन लगाने के बाद, अदिति ने सिस्टर को सबसे पहले ई.सी.जी.
मशीन लगाने के लिए कहा था और खुद एक बार फिर ब्लड प्रेशर चैक करने
लगी थी, स्थिति गंभीर थी। और फिर ई.सी.जी. करते उसे इतना तो ज्ञान
हो ही चुका था कि अमित बहुत ही तीव्र मायोकॉडियल इनफरैक्शन, एक
तीव्र हार्ट अटैक से गुज़र चुका है। और इसीलिए उसने ग्लुकोज़ का
ड्रिप चढ़ाते हुए, उसमें नाइट्रोग्लिसिरिन और मॉरफिन भी मिला दिया
था। वह जानती थी कि आगे के चार-छह घंटे बड़े नाजुक हैं। कुछ भी हो
सकता है। इन सबको करते हुए आधा घंटा कहाँ बीत गया, पता ही नहीं चला।
परंतु इस आधा घंटा में, उसका दिमाग़, चारों ओर की विभिन्न बातों से
घिर चुका था। वह एक मिनट के लिए भी अमित से दूर नहीं हुई थी। उसने
अमित के सिर पर, बालों को सहलाते हुए, प्यार से अपना स्पर्श दिया
था। जिसमें प्यार, अपनापन सब कुछ था। परंतु उस स्पर्श और अपनेपन से
बेखबर अमित अभी तक बेहोश था। आकांक्षा की आँखों में नींद की जगह
सिर्फ आँसू थे। वो अपने पापा के पास ही लगातार खड़ी रही थी। उसे
समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब क्या करे। डाक्टर खुराना, वरिष्ठ
हार्ट स्पेशलिस्ट को टेलीफ़ोन पर बताने से पूर्व अदिति ने अमित की
पलकों को उठाकर आँखों में झाँका, पुतलियाँ स्थिर मगर दर्द में
डूबकर मानो कुछ कहने के लिए बेताब हो रही थीं।
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