भाई साहब, आपकी रचनात्मकता से मैं लाभांवित हूँ.. अधिक नहीं पढ़ पाया, बाद में आराम से पढूँगा, देखूँगा..  मॉरीशस में भी युवकों को लिखने की प्रेरणा दे रहे हैं .. इसी लक्ष्य से वेब ब्लॉग का निर्माण किया है, आप इस से जुड़ेंगे तो अति प्रसन्नता होगी.. हमें भी लिखने में परामर्श देते रहें.. धन्यवाद

- Vinaye Goodary

मेट्रोपोलिटन शहरों की भागती-दौडती आवोहवा को उंघते और अलसाते हुए जब जिंदगी सामना करते-करते थक-सी जाती हैं...तो उस वक़्त 'हौस्टल के पन्नों को'खोलकर देखना पड़ता हैं ..और उस पन्नें पर जो इबादत लिखा होता हैं.. शायद उसका नाम मनोज सिंह हैं.जो न सिर्फ हौस्टल के जरिये वयस्तता भरी जिंदगी को सहला कर- पुचकार कर तन-मन को झंझोर देती हैं, बल्कि हम जैसे नौजवानों के सामने इन्सान की इंसानियत,जिन्दगी की वास्तविकता,कर्तव्य की सार्थकता और मनुष्य की व्यवहारिकता के बीच स्वार्थ, लालच,राजनीती, दोस्ती, कटुता, प्रेम, जातिवाद, आरक्षण,रोमांस और अपनों व गैरों के बीच छुपे दर्द के साथ बेचैनी और उसकी मजबूरी या फिर बहानेबाजी को जीवंत रूप से दर्शाती हैं.लेखक मनोज सिंह को हम जैसे लाखों पाठकों की ओर से " हौस्टल के पन्नों से " नामक नॉवेल को प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद .. आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास हैं की मनोज सिंह के और भी रचनाएँ हमें भविष्य में पढ़ने को मिलेगी.. आपका एक पाठक -

- मनीष झा, जर्नलिस्ट, नवभारत टाइम्स, मुंबई.
 

 

 

 

 

 

 

 



 

 

   
 
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
   
                                       
 

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